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सबसे छोटे 'नेत्रदाता' के नाम पर नेत्रबैंक का नाम रखने की योजना अब भी अधर में

देहरादून. डेढ़ दशक पहले सांस की बीमारी के कारण दम तोड़ने वाले महज सात दिन के शिशु के माता—पिता ने उसकी आंखे दो नेत्रहीन बच्चों के जीवन को रोशन करने के लिए दान कर दी थीं लेकिन कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के खिलाफ देश की लड़ाई में बच्चे का योगदान अब तक अनसुना है। संभवत: सबसे कम उम्र के अंगदाता उत्तराखंड के रहने वाले अर्जुन को अपनी आंखे दान किए 16 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन एक नेत्र बैंक का नाम उसके नाम पर रखने का प्रस्ताव अब तक हकीकत का रूप नहीं ले पाया है। उत्तराखंड के पूर्व राज्यपाल के के पॉल ने आठ साल पहले देहरादून के गांधी शताब्दी नेत्र अस्पताल में प्रस्तावित नेत्र बैंक का नाम बच्चे के नाम पर रखने पर अपनी सहमति दी थी। इस संबंध में 2015 में तत्कालीन मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने स्वास्थ्य महानिदेशालय को लिखे एक पत्र में स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्यपाल ने अस्पताल में प्रस्तावित नेत्र बैंक का नाम अर्जुन के नाम पर रखने की सहमति दे दी है । उधम सिंह नगर जिले के गदरपुर में रहने वाले बच्चे के पिता संदीप चावला ने बताया कि कुछ साल पहले राज्य में एक नेत्र बैंक का नाम अर्जुन के नाम पर रखने की कार्यवाही शुरू हुई थी लेकिन वह मंजिल तक नहीं पहुंच पाई । उन्होंने कहा कि तब से उत्तराखंड में दो सरकारें और चार मुख्यमंत्री आ चुके हैं लेकिन अस्पताल में प्रस्तावित नेत्र बैंक ही अस्तित्व में नहीं आ पाया । चावला ने कहा, “अर्जुन हमारा पहला बच्चा था। उनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसे खो देना बेहद दर्दनाक था। लेकिन नेत्रदान अभियान में सक्रिय रूप से शामिल होने के कारण हमने उस मुश्किल घड़ी में भी हमने उसकी आंखें किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान करने का फैसला किया।' उन्होंने बताया कि अर्जुन की आंखों से दो दृष्टिहीन बच्चों की दुनिया रोशन होने की बात उजागर होने के बाद इसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया क्योंकि इतने छोटे शिशु द्वारा अंगदान करने की बात इससे पहले किसी ने नहीं सुनी थी। चावला ने कहा कि लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने भी अर्जुन को सबसे कम उम्र का नेत्रदाता बताया है । शिशु के पिता के पास ऐसे कई दस्तावेज हैं जिनमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने राज्य में एक नेत्र बैंक स्थापित करने और उसका नामकरण अर्जुन के नाम पर करने की सिफारिश की है। चावला ने कहा, “हालांकि, वे सभी दस्तावेज अब सरकारी फाइलों में दबे हुए हैं । खटीमा पंजाबी सभा ने इस मामले को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समक्ष भी उठाया था लेकिन शायद उन्हें भी यह ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं लगा।' इस संबंध में संपर्क किए जाने पर कोरोनेशन अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक शिखा जंगपांगी ने कहा कि गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय में एक नेत्र बैंक स्थापित करने का प्रयास किया गया था लेकिन कुछ समस्याएं आ गयीं। उन्होंने कहा कि यह अस्पताल नेत्र बैंक के लिए निर्धारित तकनीकी मापदंडों को पूरा नहीं करता है ।

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