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- भारतीय मसालों में से एक इलायची को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है। इलायची में बहुत से औषधीय गुण होते हैं, जिससे स्वास्थ्य में सुधार करने और बीमारियों से बचाव करने में मदद मिलती है। कई लोग खाना खाने के बाद इलायची का सेवन मुंह की बदबू से राहत के लिए करते हैं, लेकिन क्या इसका पाचन पर भी असर हो सकता है?पाचन के लिए इलायची चबाने के फायदेऔषधीय गुणों से भरपूर इलायची में बहुत से पोषक तत्व होते हैं। खाना खाने के बाद इलायची को खाने से मुंह की बदबू को दूर करने के साथ-साथ पाचन के लिए जरूरी एंजाइम्स को बढ़ावा देने, पाचन तंत्र को दुरुस्त करने, गैस, ब्लोटिंग, आंतों की सूजन और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देने में मदद मिल सकती है, जिससे पाचन प्रक्रिया में सुधार करने में मदद मिलती है।1. लार को मिलता है बढ़वाखाना खाने के बाद इलायची को चबाने से मुंह में लार बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिससे पाचन के लिए जरूरी एंजाइम्स को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। यह खाने को तोड़ने और पाचन को दुरुस्त करने में भी सहायक है।2. पाचन की प्रक्रिया में सुधारइलायची को पाचन के लिए फायदेमंद माना जाता है। इसका सेवन करने से पाचन प्रक्रिया और गैस्ट्रिक मोटिलिटी में सुधार करने में मदद मिलती है।3. गैस और पेट फूलने से मिलती है राहतखाना खाने के बाद कुछ लोगों को पेट में भारीपन, ब्लोटिंग और गैस होने जैसी समस्याएं हो सकती है। ऐसे में इलायची को चबाने से पाचन प्रक्रिया को दुरुस्त करने के साथ-साथ गैस, ब्लोटिंग और भारीपन जैसी समस्याओं से राहत देने में मदद मिल सकती है।4. आंतों में सूजन कम करेइलायची में अच्छी मात्रा में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं। खाना खाने के बाद इलायची को चबाने से आंतों की सूजन को कम करने, आंतों की प्रक्रिया में सुधार करने और मतली की समस्या से राहत देने में मदद मिलती है।5. एसिडिटी को शांत करेइलायची में मौजूद आयुर्वेदिक गुण एसिडिटी और सीने की जलन को शांत करने के साथ-साथ एसिड रिफ्लक्स से भी राहत मिलती है। इससे पेट की समस्याओं से राहत देने और स्वास्थ्य में सुधार करने में भी मदद मिलती है।क्या कहती है स्टडी?साल 2021 में Iran Journal Of Basic Medical Sciences में प्रकाशित नरेटिव रिव्यू के अनुसार, इलायची हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होती है। यह खासतौर पर मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी समस्याओं से लड़ने और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करती है। इलायची का सेवन करने से आंतों से लिपिड के अवशोषण कम करने, पाचन के लिए जरूरी एंजाइम्स को रोकने, मोटापे को नियंत्रित करने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।खाने के बाद कितनी इलायची खाना सही है?आयुर्वेदिक डॉ. चंचल शर्मा के अनुसार, पाचन प्रक्रिया में सुधार करने, मेटाबॉलिज्म में सुधार करने और मुंह की बदबू से राहत के लिए खाना खाने के बाद एक-दो इलायची को चबाना फायदेमंद होता है।डॉक्टर से सलाह कब लें?अगर आपको किसी इलायची से एलर्जी है, तो इसका सेवन करने से बचना चाहिए। इसके अलावा, पाचन संबंधी कोई बीमारी है या आप किसी खास बीमारी की दवा लेते हैं, तो नियमित रूप से ज्यादा मात्रा में इलायची लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।निष्कर्षखाने के बाद इलायची चबाना स्वास्थ्य के लिए कई तरीकों से फायदेमंद हो सकता है। इसको चबाने से लार के प्रोडक्शन को बढ़वा देने और मुंह में ताजगी देने में मदद मिलती है। लार बनने से पेट में पाचन के लिए जरूरी एंजाइम्स को बढ़ावा देने और पाचन प्रक्रिया में सुधार करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, इलायची को चबाने से पाचन तंत्र को दुरुस्त करने, मेटाबॉलिज्म में सुधार करने, आंतों की सूजन को कम करने, ब्लोटिंग या गैस, मतली और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देने में मदद मिलती है।ध्यान रहे, इलायची से किसी तरह की एलर्जी होने पर इसका सेवन करने से बचें। इसके अलावा, पाचन से जुड़ी बीमारी या किसी अन्य मेडिकल कंडीशन की स्थिति में इलायची का सेवन डॉक्टर की सलाह के साथ ही करें, साथ ही इलायची का अधिक सेवन करने से बचना चाहिए।
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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और नाइट लाइफ में खान-पान का सही तरह से ध्यान रखना बहुत जरूरी है। रात का खाना सिर्फ दिनभर की भूख मिटाने का जरिए नहीं है, बल्कि यह हमारी सेहत के लिए बहुत अहम होता है। हम अक्सर रात में क्या खाएं इस बारे में ही सोचते हैं, लेकिन कब और कितने बजे खाना चाहिए इस बात का ध्यान भी रखना बहुत जरूरी है। रात को सही समय पर खाना खाने से न सिर्फ पाचन बेहतर रहता है, बल्कि यह नींद और मानसिक स्वास्थ्य को भी अच्छा रखता है।
रात का खाना खाने का सही समय क्या है?रात का खाना खाने का सबसे अच्छा समय सूरज ढलने के तुंत बाद यानी शाम 6:30 बजे से रात 8:00 बजे के बीच होना चाहिए। आसान शब्दों में कहें तो सोने से कम से कम 3 घंटे पहले आपका डिनर पूरा हो जाना चाहिए। अगर आप रात 10:30 या 11 बजे सोते हैं, तो आपको हर हाल में 7:30 या 8:00 बजे तक अपना खाना खा लेना चाहिए।सोने से 3 घंटे पहले खाना क्यों जरूरी है?जब आप रात को खाना खाते हैं तो आपका शरीर उस भोजन को पचाने की प्रक्रिया शुरू करता है। भारी भोजन को पूरी तरह पचने में कम से कम 3 से 4 घंटे का समय लगता है। अगर आप खाना खाते ही सोने चले जाते हैं तो आपके शरीर की एनर्जी, जो रात में सेल्स को रिपेयर करने और दिमाग को आराम देने में लगनी चाहिए थी, सिर्फ पाचन क्रिया को ठीक करने में लगती है।साल 2021 में Nutrients जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, हेल्दी व्यक्ति को रात का खाना सोने से 3 घंटे पहले करने से ब्लड शुगर का लेवल कंट्रोल में रहता है, फैट बर्निंग बढ़ता है, इंसुलिन रेजिस्टेंस और खाली पेट इंसुलिन के लेवल को कम करने में भी मदद मिलती है।सही समय पर डिनर करने के फायदे1. एसिडिटी और ब्लोटिंग से राहतजब आप खाकर तुरंत लेट जाते हैं तो पेट का एसिड ऊपर भोजन नली की तरफ जाने लगता है। इसे मेडिकल की भाषा में गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) या एसिड रिफ्लक्स भी कहते हैं। सही समय पर खाना खाने से भोजन पेट से आगे बढ़ जाता है, जिससे सीने में जलन, पेट फूलना और खट्टी डकारों की समस्या नहीं होती है।2. ब्लड शुगर और इंसुलिन कंट्रोलरात के समय हमारे शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी कम हो जाती है। देर रात कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन करने से ब्लड शुगर लेवल अचानक बढ़ता है। जो मरीज डायबिटीज से पीड़ित हैं या प्री-डायबिटीक हैं, उनके लिए 8 बजे से पहले खाना खा लेना जरूरी है।3. वजन और फैट मैनेजमेंटरात में हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। अगर हम देर से भारी खाना खाते हैं तो शरीर उस कैलोरी का इस्तेमाल नहीं कर पाता है और वह फैट के रूप में जमा होने लगती है, खासकर पेट के आसपास। समय पर खाने से वजन कंट्रोल में रखना आसान हो जाता है।4. गहरी और अच्छी नींदजब आपका पेट भोजन पचाने के लिए लगातार मेहनत कर रहा होता है तो आपकी नींद बार-बार टूट जाती है। समय पर डिनर करने से खाना अच्छी तरह पच जाता है, जिससे शरीर आराम की स्थिति में चली जाती है और आपको अच्छी नींद आती है।5. दिल की सेहत के लिए फायदेमंददेर रात भारी भोजन करने से रात के समय ब्लड प्रेशर और ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल बढ़ सकता है। शाम को हल्का और समय पर भोजन करने से दिल पर कम प्रेशर पड़ता है और दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।खाने में देर हो जाए तो क्या करना चाहिए?आजकल की व्यस्त लाइफस्टाइल और शिफ्ट ड्यूटी के कारण हर किसी के लिए रात 8 बजे तक भोजन करना संभव नहीं होता है। अगर किसी दिन आपको देर हो जाती है तो इन बातों का ध्यान रखें:-हल्का भोजन करें: देर रात कभी भी भारी, तला-भुना या ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन करने से बचें। देर रात खाने में खिचड़ी, सूप, उबली सब्जियां या दलिया शामिल करें।-वॉक जरूर करें: रात को खाना खाने के तुरंत बाद सोने से बचना चाहिए। कम से कम 15 से 20 मिनट तक हल्की गति से टहलें।-पानी का ध्यान रखें: खाने के तुरंत बाद ज्यादा पानी पीने से बचना चाहिए। गुनगुना पानी थोड़ी देर बाद पिएं।-कैफीन से बचें: देर रात चाय, कॉफी या सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने से बचें, क्योंकि यह पाचन और नींद दोनों को प्रभावित करती हैं।देर रात भूख लगे तो क्या खाएं?देर रात तेज भूख लगने पर हल्के, कम कैलोरी वाले और आसानी से पचने वाले फूड्स का सेवन करना चाहिए, जिसमें भुने मखाने, एक गिलास गुनगुना दूध या थोड़े से ड्राई फ्रूट्स शामिल हैं।निष्कर्षरात में 8 बजे से पहले भोजन करना सेहत के लिए फायदेमंद होता है। शुरुआत में 2 -3 दिन आपको मुश्किल हो सकती है, लेकिन धीरे-धीरे सही समय पर खाने की आदत हो जाती है। सही समय पर खाना खाने से शरीर को एनर्जी मिलती है, पाचन बेहतर रहता है और नींद भी बेहतर होती है। - पिछले कुछ समय से इंटरनेट पर अमरूद के पत्तों के के फायदों पर काफी चर्चा हाे रही है क्योंकि इनमें कई गुण मौजूद होते हैं जो सेहत को बेहतर बनाने का काम करते हैं। खासकर, इसे ब्लड शुगर लेवल घटाने के लिए असरदार माना जाता है। कुछ स्टडीज में अमरूद के पत्तों के बायोएक्टिव कंपाउंड्स पर संभावित एंटीडायबिटिक प्रभावों का अध्ययन किया गया है। हालांकि, एक सवाल मन में आता है कि क्या वाकई अमरूद के पत्ते शुगर लेवल घटा सकते हैं? आइए एक्सपर्ट से समझते हैं इस सवाल का सही जवाब।अमरूद के पत्ते इंसुलिन को मैनेज करने में सहायक माने जाते हैं क्योंकि इनमें फ्लेवोनॉयड्स, पॉलीफेनॉल्स और टैनिन जैसे तत्व पाए जाते हैं जो ब्लड शुगर लेवल को सपोर्ट करते हैं। अमरूद के पत्तों में एंटी ऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं। यह आंतों में कार्ब्स के पाचन और ग्लूकोज के एब्जॉर्ब होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे भोजन के बाद शुगर स्पाइक से बचने में मदद मिल सकती है।साल 2010 में Nutrition & Metabolism में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, अमरूद की पत्तों के अर्क में अल्फा-एमाइलेज, माल्टेज, सुक्रेज जैसे कंपाउंड्स पाए जाते हैं जो शुगर स्पाइक से बचने में मदद कर सकते हैं। साथ ही स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज वाले मरीजों में अमरूद की पत्ती की चाय का सेवन करने से पोस्ट मील शुगर लेवल में सुधार देखा गया। शुगर लेवल 160 से 143 mg/dL तक घट गया।अमरूद के पत्ते की चाय बनाकर पी सकते हैंअमरूद के पत्ते का सेवन बेहद आसान है। इसे चाय या काढ़ा के रूप में सेवन किया जा सकता है--4 से 5 अमरूद के पत्ते लें।-इसे गर्म पानी में 5 मिनट तक उबालें।-जब पानी आधा रह जाए, तो पानी को गिलास में भर लें।-इसे दिन में एक से दो बार पी सकते हैं।-डायबिटीज में दवा का विकल्प नहीं है अमरूद के पत्ते''किसी आयुर्वेदिक संस्था ने अभी तक डायबिटीज में ब्लड शुगर मैनेजमेंट के लिए अमरूद के पत्तों के इस्तेमाल पर मुहर नहीं लगाई है इसलिए अगर आप डायबिटिक मरीज हैं और सोच रहे हैं कि दवा के बगैर, केवल अमरूद के पत्तों के सेवन से शुगर लेवल कंट्रोल होगा, तो इस मिथ से बचें।'' अमरूद के पत्तों को डायबिटीज की दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए। अध्ययनों में ब्लड शुगर पर संभावित लाभ दिखा है, लेकिन फिलहाल सीमित स्टडीज मौजूद हैं इसलिए इसे दवा से रिप्लेस नहीं किया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति इसे शुगर कंट्रोल के लिए ले रहा है, तो ब्लड शुगर की नियमित जांच करें और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं खुद से बंद या कम न करें।कार्ब पचाने वाले एंजाइमों की गतिविधि घटती हैसाल 2025 में General Nursing Science Journal में प्रकाशित एक स्टडी रिव्यू के मुताबिक, अमरूद के पत्ते सहायक उपचार के रूप में ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। यह कार्ब्स को पचाने वाले कुछ एंजाइमों की गतिविधि को कम कर सकते हैं, जिससे ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है।फ्री रैडिकल्स से बचावसाल 2019 में Molecules में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया कि अमरूद के पत्तों की मदद से फ्री रैडिकल्स से लड़ने में मदद मिलती है। साथ ही, इससे लिवर, किडनी और पैंक्रियाज को होने वाले नुकसान को कम करने में भी मदद मिली। हालांकि, यह एक पशु आधारित स्टडी है।सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हैं अमरूद के पत्ते?-जब हम अमरूद के पत्तों का सेवन करते हैं, तो वे पेट में जाकर हानिकारक जर्म्स को खत्म करने में मदद करते हैं। साथ ही इन पत्तों का सेवन करने से कब्ज की समस्या भी दूर होती है।-हार्ट हेल्थ के लिए भी ये फायदेमंद माने जाते हैं। अमरूद के पत्ते बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करके, गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करते हैं।-इन पत्तों का सेवन करने से मेटाबॉलिज्म को मजबूत बनाने में भी मदद मिल सकती है जिससे वेट लॉस करना आसान हो जाता है।-त्वचा के लिए भी अमरूद के पत्ते फायदेमंद माने जाते हैं। इसे पीसकर त्वचा पर लगाने से मुंहासे या स्किन इरिटेशन से राहत मिल सकती है।किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?-अगर व्यक्ति को लो शुगर लेवल की समस्या है, तो अमरूद के पत्तों का सेवन करने से बचें।-गर्भवती महिलाओं को भी अमरूद के पत्तों से परहेज करना चाहिए।-बच्चों को भी अमरूद के पत्तों की चाय या काढ़ा देने की सलाह नहीं दी जाती है।-अगर किसी व्यक्ति को लिवर, किडनी या अन्य गंभीर बीमारी है या वह डॉक्टर की सलाह के बगैर इन पत्तों का सेवन न करे।ज्यादा मात्रा लेने से लो ब्लड शुगर की समस्याअमरूद के पत्तों का जरूरत से ज्यादा सेवन से ब्लड शुगर लेवल गिर सकता है, अगर लो शुगर लेवल की शिकायत रहती है, तो इससे सेहत बिगड़ सकती है इसलिए दिनभर में 4 से 5 पत्तों से ज्यादा सेवन न करें। अधिक मात्रा में लेने से पेट दर्द, मतली या अन्य पाचन समस्याएं भी हो सकती हैं।निष्कर्ष:ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए अमरूद के पत्तों का सेवन स्टडीज में फायदेमंद बताया गया है क्योंकि इससे शुगर स्पाइक से बचाव होता है और इसमें मौजूद तत्व जैसे फ्लेवोनॉयड्स, पॉलीफेनॉल्स और टैनिन, शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। हालांकि, इसे डायबिटीज के इलाज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे डाइट में शामिल कर सकते हैं अमरूद के पत्तों का काढ़ा या चाय बनाकर सेवन किया जा सकता है। अगर व्यक्ति पहले से लो ब्लड शुगर का मरीज है, तो अमरूद के पत्तों का सेवन करने से से पहले डॉक्टर से सलाह लें। गर्भवती महिलाओं और बच्चों को इसके सेवन से बचना चाहिए।
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शरीर को फिट और तंदुरुस्त रखने के लिए प्रोटीन सबसे जरूरी पोषक तत्वों में से एक है। प्रोटीन सिर्फ मसल्स बनाने के काम नहीं आता। ये हमारी हड्डियों को मजबूत बनाता है और साथ ही त्वचा और बालों को हेल्दी और चमकदार रखने में भी मदद करता है। अगर शरीर में प्रोटीन कम हो जाए तो सबसे पहले मांसपेशियां और हड्डियां कमजोर पड़ने लगती हैं। दिनभर थकान और कमजोरी महसूस होती है। इसके अलावा बाल झड़ने लगते हैं और त्वचा बेजान हो जाती है।इसलिए ये जरूरी है कि हम अपनी डाइट में रोजाना पर्याप्त प्रोटीन लें। अगर आपको लगता है कि आपके शरीर में प्रोटीन की कमी है, तो घबराइए मत। इसे पूरा करने का एक आसान तरीका है - सीड्स। चिकन, पनीर के अलावा कुछ सीड्स भी प्रचुर मात्रा में प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। आज हम इसी के बारे में बात करेंगे।
तिलशरीर में प्रोटीन की पूर्ति के लिए आप तिल को भी अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। तिल प्रोटीन का अच्छा स्रोत होने के साथ-साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है। इसके नियमित लेकिन सीमित सेवन से हड्डियां और जोड़ मजबूत होते हैं, साथ ही मांसपेशियों को आराम मिलता है।ध्यान दें कि तिल की तासीर गर्म होती है। इसलिए इसका अधिक सेवन करने से बचें। रोज 1 छोटा चम्मच तिल लेना शरीर के लिए पर्याप्त और सुरक्षित है।चिया सीड्सअगर आप शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करना चाहते हैं, तो चिया सीड्स आपके लिए एक बेहतरीन सुपरफूड साबित हो सकते हैं। चिया सीड्स प्रोटीन से भरपूर होने के साथ-साथ ओमेगा-3 फैटी एसिड, कैल्शियम और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स का भी खजाना हैं। चिया सीड्स फाइबर की वजह से पेट को लंबे समय तक भरा रखता है, जिससे वजन कंट्रोल में मदद मिलती है। यह बीज शरीर को जरूरी पोषक तत्व देकर दिनभर एनर्जी देने का काम करते हैं।कद्दू के बीजशरीर में प्रोटीन की पूर्ति के लिए कद्दू के बीज एक शानदार विकल्प हैं। कद्दू के बीज प्रोटीन के साथ-साथ जिंक, आयरन और मैग्नीशियम जैसे महत्वपूर्ण मिनरल्स से भी भरपूर होते हैं। ये मिनरल्स मांसपेशियों की रिकवरी और मजबूती में अहम भूमिका निभाते हैं।इसके नियमित सेवन से शरीर में ऊर्जा का स्तर बना रहता है और थकान व कमजोरी की समस्या कम होती है।आप इन्हें हल्का रोस्ट करके स्नैक के रूप में या दही, सलाद में मिलाकर खा सकते हैं।सूरजमुखी के बीजप्रोटीन की कमी पूरी करने के साथ-साथ त्वचा और बालों की सेहत सुधारनी है तो सूरजमुखी के बीज डाइट में शामिल करें। सूरजमुखी के बीज प्रोटीन और कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत हैं। प्रोटीन मांसपेशियों की मरम्मत करता है, वहीं कैल्शियम और विटामिन E त्वचा को जवां और बालों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।इसलिए अगर आप अंदर से हेल्दी और बाहर से खूबसूरत दिखना चाहते हैं, तो रोजाना मुट्ठी भर सूरजमुखी के बीज का सेवन फायदेमंद रहेगा।अलसी के बीजशरीर में प्रोटीन की कमी है तो अलसी के बीज जरूर ट्राई करें। अलसी सिर्फ प्रोटीन का सोर्स नहीं है, इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड भी भरपूर होता है जो दिल और दिमाग के लिए बहुत अच्छा है। सबसे पहले अलसी को हल्का भून लें। फिर मिक्सी में पीसकर पाउडर बना लें। रोज रात को सोने से पहले 1 गिलास गुनगुने दूध में 1 चम्मच अलसी पाउडर डालकर पी लें। इससे प्रोटीन की कमी भी पूरी होगी और नींद भी अच्छी आएगी। - मानसून के मौसम में गर्मी से राहत तो जरूर मिलती है, लेकिन इस दौरान बढ़ी हुई नमी और तापमान में बदलाव के कारण त्वचा बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है। इस मौसम में स्किन कभी चिपचिपी और ऑयली महसूस होती है, तो कभी बहुत ज्यादा ड्राई और बेजान नजर आ सकती है। इसलिए बारिश के मौसम में कभी-कभार तेल मालिश यानी अभ्यंग करते समय सही तेल और सही रूटीन का चुनाव करना जरूरी है।आयुर्वेद में अभ्यंग का मतलब शरीर पर तेल लगाकर मालिश करना है। इसे शरीर को पोषण देने, आराम पहुंचाने और त्वचा की देखभाल के लिए अपनाया जाता है। हालांकि हेयर और स्किन केयर एक्सपर्ट शहनाज हुसैन बताती हैं कि मानसून में हर व्यक्ति की त्वचा एक जैसी नहीं होती, इसलिए तेल की मात्रा और इस्तेमाल की आवृत्ति त्वचा की जरूरत के अनुसार तय करनी चाहिए। आइए जानते हैं कि चेहरे पर तेल लगाने का सही तरीका क्या है।मानसून में अभ्यंग क्यों फायदेमंद माना जाता है?आयुर्वेद के अनुसार “मानसून में वात दोष बढ़ सकता है, जिससे शरीर में रूखापन और अकड़न जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। ऐसे में हल्के हाथों से की गई तेल मालिश त्वचा को मुलायम रखने और शरीर को आराम देने में मदद कर सकती है।"अभ्यंग के क्या फायदे हैं?-स्किन को नमी देकर मुलायम रखने में मदद करता है।-ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा मिल सकता है।-मांसपेशियों और जोड़ों की अकड़न से आराम मिल सकता है।-शरीर को रिलैक्स करने में मदद करता है।-स्ट्रेस कम करने और अच्छी नींद को बढ़ावा देने में फायदेमंद हो सकता है।-त्वचा की नेचुरल नमी और स्किन बैरियर को बनाए रखने में मदद कर सकता है।मानसून में चेहरे पर तेल की मालिश कब करें?एक्सपर्ट बताती हैं कि आप अपने चेहरे पर कब तेल लगा रहे हैं, यह बहुत ही ज्यादा जरूरी है। तेल लगाते समय आप इन बातों का ध्यान रखें--नहाने से करीब 20-30 मिनट पहले शरीर पर तेल लगाएं।-तेल को बहुत गर्म करने के बजाय हल्का गुनगुना करें।-मालिश के बाद कुछ समय घर के अंदर रहें, खासकर अगर मौसम ठंडा या बहुत नम हो।-मालिश के बाद गुनगुने पानी से नहाकर एक्सट्रा ऑयल साफ कर लें।-नहाने के बाद शरीर को अच्छी तरह सुखाएं और साफ, सूखे कपड़े पहनें।मानसून में कौन से तेल चुनें?बारिश के मौसम में त्वचा पहले से ही पसीने और नमी के संपर्क में रहती है। ऐसे में सही तेल का चुनाव करना बहुत ही ज्यादा जरूरी हो जाता है। एक्सपर्ट बताती हैं कि त्वचा की जरूरत के अनुसार अपेक्षाकृत हल्के तेलों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे-तिल का तेलनारियल का तेलसूरजमुखी का तेलबादाम का तेलनीम का तेलबेसिल ऑयलमंजिष्ठा युक्त हर्बल तेलत्वचा पर तेल का इस्तेमाल करने के दौरान अगर किसी भी तेल से एलर्जी या जलन होती है, तो उसका इस्तेमाल बंद कर दें। चेहरे पर तेल लगाने से पहले सावधानी बरतें, खासकर अगर आपकी त्वचा ऑयली या मुंहासों वाली है।किन लोगों को भारी तेलों से बचना चाहिए?मानसून में हर व्यक्ति के लिए हेवी ऑयल लगाना फायदेमंद नहीं हो सकता है। त्वचा पर बहुत ज्यादा तेल लगाने से चिपचिपाहट और असहजता बढ़ सकती है। अगर आप तेल लगाने की सोच रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें जैसे-त्वचा बहुत ज्यादा ऑयली है।बार-बार मुंहासे या दाने निकलते हों।त्वचा पर फंगल इंफेक्शन या रैशेज हों।बहुत ज्यादा पसीना आता हो।अगर आप बहुत अधिक नमी वाले वातावरण में रहते हों। ऐसी स्थिति में अगर आप अभ्यंग करना चाहते हैं, तो हल्के तेल की कम मात्रा इस्तेमाल करें और मालिश के बाद त्वचा को अच्छी तरह साफ और सूखा रखें।मानसून में अभ्यंग करते समय रखें इन बातों का ध्यानअभ्यंग को अपनी दिनचर्या में शामिल करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर त्वचा एक जैसी नहीं होती। किसी व्यक्ति के लिए तेल मालिश आरामदायक हो सकती है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति में इससे चिपचिपाहट, मुंहासे या त्वचा संबंधी समस्या बढ़ सकती है।इसलिए मानसून में तेल का चुनाव, उसकी मात्रा और इस्तेमाल की आवृत्ति त्वचा के प्रकार के अनुसार तय करें। अगर त्वचा पर लगातार खुजली, लालिमा, दाने, फंगल इंफेक्शन या जलन हो रही है, तो तेल लगाकर समस्या को दबाने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
- प्रोटीन शरीर के लिए बहुत जरूरी होता है। यह मांसपेशियों, त्वचा, नाखून और बालों के लिए भी जरूरी होता है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन का सेवन करना जरूरी होता है। हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन सबसे जरूरी पोषक तत्वों में से एक है। अक्सर लोग प्रोटीन को सिर्फ जिम जाने वालों या बॉडी बनाने वालों के लिए जरूरी मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हर उम्र के व्यक्ति को प्रोटीन की जरूरत होती है। बच्चों की ग्रोथ से लेकर मांसपेशियों की मरम्मत, इम्यूनिटी मजबूत करने और हार्मोन बनाने तक, शरीर के लगभग हर अहम काम में प्रोटीन की भूमिका होती है। ऐसे में अगर शरीर में इसकी कमी हो जाए तो कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।प्रोटीन क्या है?प्रोटीन अमीनो एसिड (Amino Acids) से मिलकर बना एक जरूरी पोषक तत्व है। शरीर इन्हीं अमीनो एसिड का इस्तेमाल नई कोशिकाएं बनाने, मांसपेशियों की मरम्मत करने और एंजाइम-हार्मोन बनाने के लिए करता है। शरीर कुछ अमीनो एसिड खुद बना लेता है, लेकिन 9 जरूरी अमीनो एसिड ऐसे हैं जो केवल भोजन से ही मिलते हैं।शरीर के लिए प्रोटीन क्यों जरूरी है?शरीर के लिए प्रोटीन बहुत जरूरी होता है। प्रोटीन मांसपेशियों, त्वचा, बाल और ऊतकों के लिए जरूरी माना जाता है।1. मांसपेशियों को मजबूत बनाता है प्रोटीनNIH के अनुसार, प्रोटीन मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए बहुत जरूरी होता है। यह मांसपेशियों की ग्रोथ और मरम्मत में अहम भूमिका निभाता है। एक्सरसाइज के बाद मसल्स को रिकवरी के लिए प्रोटीन की जरूर होती है। इसलिए जिम या वर्कआउट के बाद प्रोटीन से भरपूर डाइट जरूर लें।3. त्वचा, बाल और नाखून के लिए जरूरी है प्रोटीनNIH के अनुसार, मांसपेशियों के साथ-साथ त्वचा, बाल और नाखूनों के लिए भी प्रोटीन जरूर होता है। कोलेजन और केराटिन जैसे प्रोटीन त्वचा, बाल और नाखून को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। इसकी कमी से बाल झड़ना, नाखून कमजोर होना और त्वचा बेजान दिख सकती है।2. इम्यूनिटी मजबूत करता है प्रोटीनविश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रोटीन शरीर में संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबॉडी बनाने के लिए भी जरूरी होता है। जब शरीर में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है, तो रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है। इसकी कमी से इम्यूनिटी भी कमजोर पड़ सकती है।4. शरीर के ऊतकों की मरम्मत करता है प्रोटीनNIH के अनुसार, शरीर के ऊतकों को रिपेयर करने के लिए भी प्रोटीन की जरूरत पड़ती है। किसी भी चोट, सर्जरी या बीमारी के बाद शरीर के ऊतकों की मरम्मत के लिए पर्याप्त प्रोटीन की आवश्यकता होती है।प्रोटीन के सोर्स क्या हैं?विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रोटीन की पूर्ति के लिए आप अपनी डाइट में राजमा और दाल जरूर शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, चना, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, अंडा, मछली, चिकन, बादाम, मूंगफली, चिया सीड्स, कद्दू के बीज और सूरजमुखी के बीज आदि शामिल कर सकते हैं।शरीर में प्रोटीन की कमी के लक्षण क्या हैं?जब शरीर में प्रोटीन की कमी होती है, तो कई तरह के लक्षण नजर आने लगते हैं। जैसे-- मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं।-प्रोटीन की कमी होने पर व्यक्ति बार-बार बीमार पड़ सकता है।-घाव भरने में देरी हो सकती है।-प्रोटीन की कमी से बाल झड़ने की समस्या हो सकती है।-इसकी कमी होने पर नाखून टूट सकते हैं।-प्रोटीन की कमी से शरीर में सूजन आ सकती है।-लगातार थकान और कमजोरी बनी रह सकती है।
- वात, पित्त और कफ ये तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर और स्वास्थ्य से बेहद करीब से जुड़े होते हैं, जिन्हें त्रिदोष कहा जाता है। आयुर्वेद कहता है कि इनका सही संतुलन होना बहुत जरूरी है और अगर किसी कारण से उनका संतुलन बिगड़ जाता है तो स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है। इनमें से हर दोष का संतुलन बिगड़ने से स्वास्त्य से जुड़ी अलग-अलग समस्याएं होने लगती हैं। जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर कुछ संकेतों के माध्यम से अपनी स्थिति व्यक्त कर सकता है। इन संकेतों को समझकर आहार और जीवनशैली में उचित बदलाव करना स्वास्थ्य-संतुलन बनाए रखने में सहायक माना जाता है। इस लेख में हम इसी बारे में कुछ खास जानकारियां लेने वाले हैं।वात दोष क्या है और इसका असंतुलनवात दोष हमारे शरीर के तीनों दोषों में से एक है, जिसका संबंध शरीर की गति, संचार और तंत्रिकाओं से होता है। जब किसी कारण से वात दोष का संतुलन बिगड़ता है, तो उससे कुछ समस्याएं पैदा होने लगती हैं जैसे-त्वचा में रूखापन-गैस बनना या पेट फूलना-कब्ज की समस्या-शरीर में दर्द या अकड़न रहना-बेचैनी व नींद में कमी-वात दोष को मैनेज कैसे करेंवात दोष के असंतुलन से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए इसे नियमित रखना बेहद जरूरी है। इसे संतुलित रखने के लिए नियमित दिनचर्या को सही बनाए रखना जरूरी है जैसे --पर्याप्त आराम करना-गर्म एवं ताजा भोजन करना-ज्यादा ठंडी चीजें न खाना या पीना-ज्यादा उपवास न रखना-योग व प्राणायाम करनाइसके अलावा अगर आपको स्वास्थ्य से जुड़ी ज्यादा समस्याएं हो रही हैं, तो उसके लिए समय रहते किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉक्टर से दिखाया जा सकता है। आयुर्वेद के चिकित्सक आपके स्वास्थ्य की जांच करेंगे और आपके शरीर की जरूरत के अनुसार आपको औषधियां देंगे।पित्त दोष क्या है और इसका असंतुलनआयुर्वेद के अनुसार अगर आप बीमार पड़ने से बचना चाहते हैं, तो पित्त दोष संतुलन होना जरूरी है। पित्त दोष का संबंध मुख्य रूप से पाचन क्रिया, चयापचय (मेटाबॉलिज्म) क्रिया और शरीर के तापमान से होता है। इसलिए जब किसी व्यक्ति का पित्त दोष प्रभावित होता है तो उसे ज्यादा गर्मी लगती है, बार-बार एसिडिटी, ज्यादा प्यास लगना, ज्यादा पसीना आना, त्वचा में लालिमा और ज्यादा गुस्सा आना आदि लक्षण देखे जा सकते हैं।पित्त दोष को मैनेज कैसे करेंपित्त दोष असंतुलन से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए इसको मैनेज करना बेहद जरूरी है। इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है --अत्यधिक तीखे, तले-भुने और बहुत गर्म भोजन का सेवन न करें-रोजाना नियमित रूप से पर्याप्त पानी पीएं-तीनों समय का खाना सही समय पर ही करें-बहुत ज्यादा तापमान में न रहें-शरीर में तनाव न बढ़ने दें-ज्यादा गर्म न खाएं बल्कि ठंडा खाना खाएं-नियमित रूप से संतुलित आहार लें-रोजाना पर्याप्त नींद लेना बेहद जरूरी है।कफ दोष और इसका असंतुलनशरीर को बीमारियों से बचाने के लिए कफ दोष को संतुलित रखना भी बेहद जरूरी है। आयुर्वेद मानता है कि अगर किसी कारण से शरीर में कफ दोष असंतुलित हो जाता है, तो इससे स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है जिनमें निम्न शामिल है --एनर्जी की कमी व कमजोरी महसूस होना-जरूरत से ज्यादा नींद आना व सुस्ती रहना-पर्याप्त भूख न लगना-कफ या बलगम ज्यादा बनना-शरीर का वजन तेजी से बढ़ना-कफ दोष को मैनेज कैसे करेंजरूरत से ज्यादा कफ होना आमतौर पर स्वास्थ्य से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है और इन समस्याओं से बचने के लिए कफ दोष का संतुलित रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए --हल्का व आसानी से पचने वाला आहार खाएं-दिन में सोने की आदत न डालें-मीठे और तेल वाले भोजन का सेवन कम से कम करें-नियमित रूप से हल्दी एक्सरसाइज करें-दोष संतुलन को समझना क्यों जरूरी?स्वास्थ्य से जुड़ी कोई भी समस्या या लक्षण कई अलग-अलग कारणों से विकसित हो सकते हैं और इसलिए केवल गैस, जलन, सुस्ती या किसी अन्य एक लक्षण के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन-सा दोष निश्चित रूप से बढ़ा हुआ है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में प्रकृति, विकृति, आहार, दिनचर्या, ऋतु, आयु और अन्य लक्षणों का समग्र मूल्यांकन किया जाता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप दोषों के असंतुलन के बारे में जरूरी जानकारी रखें।
- डायबिटीज शरीर को कई तरह से नुकसान पहुंचाती है जिनमें से एक नुकसान है हड्डियों की बीमारी होना या हड्डियों का समय से पहले कमजोर होना। कई बार आपने नोटिस किया होगा कि कुछ लोग 30 या 40 की उम्र में आते-आते हड्डियों के दर्द या गंभीर बीमारी का शिकार हो जाते हैं। दरअसल इसके पीछे डायबिटीज हो सकती है। डायबिटीज हड्डियों की मजबूती को प्रभावित करती है। स्टडी कहती है कि जिन लोगों को टाइप 2 डायबिटीज होता है उनमें बोन मिनरल डेंसिटी सामान्य होने के बाद भी हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। आगे जानेंगे कि डायबिटीज हड्डियों की सेहत को क्यों और कैसे खराब कर सकती है?डायबिटिक मरीजों में हड्डियों की समस्या क्यों होती है?जब शुगर लेवल लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो शरीर के टिशूज में कई तरह के बदलाव होते हैं जिसका असर हड्डियों की संरचना पर पड़ सकता है। साथ ही लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर लेवल से हड्डियों में मौजूद कोलेजन भी प्रभावित हो सकता है जिससे हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध भी हड्डियों पर बुरा असर डालती है। साल 2024 में Metabolism Open में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, अगर ब्लड शुगर लेवल लंबे समय तक बढ़ा हुआ है, तो इंसुलिन रेजिस्टेंस और सूजन से हड्डियां प्रभावित हो सकती हैं। इससे हड्डियों की संरचना और गुणवत्ता पर बुरा असर होता है और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ सकता है।क्रॉनिक डायबिटीज से हड्डियां हो सकती हैं कमजोरसाल 2025 में Diabetology में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, क्रॉनिक डायबिटीज यानी जिन लोगों को लंबे समय से डायबिटीज है और शुगर लेवल कंट्रोल में नहीं है, उनमें हड्डियों की समस्याएं होने का खतरा ज्यादा होता है। क्रॉनिक डायबिटीज के कारण हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।डायबिटीज में हड्डियों से जुड़ी कॉमन समस्याएं1. फ्रोजन शोल्डरडायबिटिक मरीजों में होने वाली कॉमन समस्या में से एक है फ्रोजन शोल्डर। इसमें कंधे के कैप्सूल में शुगर मॉलिक्यूल्स जमा हो जाते हैं। इससे शोल्डर की मोबिलिटी कम हो जाती है जिसके कारण हाथ उठाने में तकलीफ होती है। इससे बचने के लिए शुगर को कंट्रोल करना जरूरी है। मोबिलिटी बढ़ाने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है।2. पेरिफेरल न्यूरोपैथीशुगर लेवल जब कंट्रोल में नहीं होता है, तो नसों पर इसका बुरा असर पड़ता है जिसके कारण झुनझुनी महसूस होती है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी से बचाव के लिए सिंकाई या दवाओं का सहारा लेने के बजाय जांच कराएं और शुगर की दवाएं लें।3. हाथ और पैरों में सूजनहाई शुगर लेवल के कारण हाथ और पैरों की उंगलियों में सूजन हो जाती है जिसके कारण हाथ या पैर की उंगलियां स्टिफ हो जाती हैं और दिनचर्या प्रभावित होती है।4. चारकोट न्यूरोपैथीपैरों के ज्वॉइंट में होने वाली कॉमन समस्या है चारकोट न्यूरोपैथी (Charcot Neuroarthropathy)। यह डायबिटिक मरीजों में अधिक देखी जाती है। जब शुगर लेवल बढ़ता है, तो ज्वॉइंट्स पर इसका बुरा प्रभाव देखने को मिलता है।5. ऑस्टियोपोरोसिसडायबिटिक मरीजों में अक्सर हड्डियों के जल्दी-जल्दी घिसने की समस्या देखी जाती है। इसके कारण हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द होता है।ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना जरूरी है-डायबिटीज में हड्डियों की समस्याओं से बचने के लिए ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना जरूरी है। शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए नियमित जांच कराएं और शुगर लेवल मॉनिटर करें।-डायबिटीज है, तो दवाओं का सेवन समय पर करें।-भोजन में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम को शामिल करें।-नियमित एक्सरसाइज जरूरी है। वॉकिंग या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग एक्सरसाइज करें। इससे मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत होंगी।-धूम्रपान और अल्कोहल के सेवन से बचें। इससे ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है।-पैरों की सेंसिटिविटी कम होने पर ध्यान दें और तुरंत चेकअप करांए।डॉक्टर से संपर्क कब करें?-अगर बार-बार हड्डियों या जोड़ों में दर्द हो।-पैरों में सुन्नपन या झनझनाहट महसूस हो।-बार-बार फ्रैक्चर होना।-चलने या हाथ-पैरों से काम करने में तकलीफ होना।निष्कर्ष:फ्रोजन शोल्डर, पेरिफेरल न्यूरोपैथी, हाथ और पैरों में सूजन, चारकोट न्यूरोपैथी और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी कंडीशन डायबिटीज में मरीजों में ज्यादा कॉमन होती हैं। डायबिटीज में हाई शुगर लेवल, कोलेजन पर असर, इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध से हड्डियों पर बुरा असर पड़ता है। हड्डियों में दर्द, सूजन, सुन्नपन या झनझनाहट महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। बचाव के लिए समय-समय पर शुगर जांच कराएं और ब्लड शुगर लेवल को मॉनिटर करें। पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम लें और एक्सरसाज को प्राथमिकता दें। डायबिटीज में धूम्रपान और अल्कोहल से पूरी तरह परहेज करें।
- जब भी हमें दांत में दर्द या फिर सिरदर्द की परेशानी होती है, तो सबसे पहले हमारी दादी-नानी लौंग की चाय या फिर लौंग का तेल लगाने की सलाह दे देती हैं। हम में से कई लोगों ने इन घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल भी किया होगा। आयुर्वेद से लेकर घरेलू नुस्खों तक, लौंग को प्राकृतिक दर्द निवारक के रूप में जाना जाता है। इसमें मौजूद यूजेनॉल नामक सक्रिय तत्व में दर्द और सूजन को कम करने वाले गुण पाए जाते हैं। लेकिन क्या सच में लौंग दर्द को कम करने में प्रभावी है? क्या सच में लौंग किसी बीमारी का इलाज कर सकती है।लौंग में कौन-कौन से गुण पाए जाते हैं?लौंग में कई तरह के गुण पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं। आइए जानते हैं इसके गुणों के बारे में-लौंग में पाए जाने वाले तत्व मुख्य गुण और फायदेयूजेनॉल (Eugenol)- दर्द कम करने (Analgesic), सूजन कम करने (Anti-inflammatory), एंटीसेप्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुणबीटा-कैरियोफिलीन (Beta-Caryophyllene) -सूजन कम करने और दर्द से राहत दिलाने में सहायकफ्लेवोनॉयड्स (Flavonoids) -एंटीऑक्सीडेंट, कोशिकाओं को फ्री-रेडिकल्स से बचाने में मददटैनिन (Tannins) -एंटीबैक्टीरियल और घाव भरने में सहायक गुणगैलिक एसिड (Gallic Acid) -एंटीऑक्सीडेंट और सूजन कम करने वाले गुणओलियानोलिक एसिड (Oleanolic Acid)- लिवर की सुरक्षा और सूजन कम करने में संभावित भूमिकाविटामिन C (कम मात्रा में) -इम्यूनिटी को सपोर्ट करने और एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्यमैंगनीज (Manganese) -हड्डियों के स्वास्थ्य, मेटाबॉलिज्म और एंटीऑक्सीडेंट एंजाइमों के लिए जरूरीफाइबर- पाचन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददलौंग के फायदे क्या हैं?अगर आप नियमित रूप से लौंग का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे कई तरह के फायदे हो सकते हैं, जैसे-1. दांतों में दर्द और मसूड़ों की सूजन से दिलाए राहतNCBI में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, दांतों के दर्द से राहत पाने के लिए लौंग का इस्तेमाल किया जा सकता है। दरअसल, लौंग में यूजेनॉल नामक प्राकृतिक दर्द निवारक और एंटीसेप्टिक गुणों वाला यौगिक है, जो दर्द और सूजन को कम करने में मदद कर सकता है। यही कारण है कि कई डेंटल प्रोडक्ट्स और दंत चिकित्सा में भी यूजेनॉल का उपयोग किया जाता है।2. सूजन कम करने में मददगाररिपोर्ट के अनुसार, लौंग में मौजूद यूजेनॉल और अन्य पॉलीफेनॉल्स शरीर में सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। कुछ प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों में पाया गया है कि यूजेनॉल जैसे यौगिक सूजन पैदा करने वाले रसायनों की गतिविधि को कम कर सकते हैं। हालांकि, इंसानों पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।3. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूरलौंग को सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट स्रोतों में से एक माना जाता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर में बनने वाले फ्री-रेडिकल्स को कम करने में मदद करते हैं, जिससे कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायता मिल सकती है।4. पाचन-तंत्र के लिए है फायदेमंदपारंपरिक चिकित्सा में लौंग का उपयोग गैस, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याओं में किया जाता रहा है। लौंग पाचन एंजाइमों के स्राव को बढ़ावा देने और पाचन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। हालांकि, इस विषय पर बड़े क्लीनिकल ट्रायल अभी सीमित हैं।5. संक्रमण के जोखिम को कम करने में सहायकलौंग में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण पाए गए हैं। लौंग के तेल में मौजूद गुण कुछ बैक्टीरिया और फंगस की वृद्धि को रोकने में प्रभावी हो सकता है। हालांकि, इसे किसी संक्रमण का इलाज मानकर स्वयं दवा की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।6. लिवर की सेहत को कर सकती है सपोर्टकुछ पशु अध्ययनों में पाया गया है कि लौंग में मौजूद यूजेनॉल ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करके लिवर को नुकसान से बचाने में मदद कर सकता है। हालांकि, इंसानों में इसके प्रभाव की पुष्टि के लिए और अधिक शोध की जरूरत है।क्या लौंग से दर्द कम हो सकता है?लौंग का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से किया जाता रहा है। इसमें यूजेनॉल नामक सक्रिय तत्व पाया जाता है, जो हल्के दर्द और सूजन को कम करने में मदद कर सकता है। अगर शरीर के किसी हिस्से में हल्का दर्द हो, तो लौंग का सीमित मात्रा में सेवन या इसका उचित उपयोग कुछ समय के लिए आराम दे सकता है। हालांकि, इसका प्रभाव हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकता है और यह दर्द के मूल कारण का इलाज नहीं करता है। अगर दर्द चोट, संक्रमण, गठिया, नसों की समस्या या किसी गंभीर बीमारी के कारण हो, तो केवल लौंग पर निर्भर रहना सही नहीं है। लौंग किसी बीमारी का इलाज नहीं है। लौंग का अधिक मात्रा में सेवन करना या लौंग के तेल का गलत उपयोग कुछ लोगों में जलन, एलर्जी या अन्य दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकता है।लौंग का इस्तेमाल करने के नुकसान क्या हैं?लौंग स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद है, लेकिन कुछ स्थितियों में इसके नुकसान भी हो सकते हैं, जैसे--लिवर को पहुंचा सकता है नुकसान : लौंग में मौजूद यूजेनॉल की अधिकता लिवर पर विषैला प्रभाव डाल सकता है। खासकर लौंग के तेल का अधिक सेवन लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है।-ब्लीडिंग का खतरा : यूजेनॉल में खून को पतला करने वाले गुण हो सकते हैं। ऐसे में जो लोग ब्लड थिनर दवाएं ले रहे हैं या जिनकी सर्जरी होने वाली है, उन्हें लौंग या लौंग के तेल का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।-मुंह और पेट में हो सकती है जलन : लौंग या विशेष रूप से लौंग के तेल का सीधे इस्तेमाल करने से मुंह, मसूड़ों, गले या पेट में जलन, छाले और इरिटेशन हो सकती है। बिना डॉक्टर की सलाह के इसे सीधे त्वचा या मसूड़ों पर लगाना उचित नहीं है।-ब्लड शुगर हो सकती है कम : कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि लौंग ब्लड शुगर को कम करने में मदद कर सकती है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति डायबिटीज की दवाएं या इंसुलिन ले रहा है, तो अधिक मात्रा में लौंग का सेवन ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा कम (Hypoglycemia) कर सकता है।लौंग का सेवन कैसे किया जा सकता है?लौंग का इस्तेमाल मसालों के अलावा कई अन्य तरह से किया जा सकता है, जैसे-साबुत लौंग चबाकर : दांत दर्द या मुंह की दुर्गंध से राहत पाने के लिए 1-2 साबुत लौंग धीरे-धीरे चबाई जा सकती है। इससे लौंग में मौजूद यूजेनॉल निकलता है, जो दर्द और बैक्टीरिया को कम करने में मदद कर सकता है।लौंग की चाय : आप लौंग के फायदे लेने के लिए इसकी चाय बनाकर पी सकते हैं। इसके लिए 1-2 लौंग को पानी में 5-10 मिनट तक उबालकर हर्बल टी बना लें। स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें अदरक, दालचीनी या शहद मिलाया जा सकता है। सर्दी-जुकाम या गले में खराश के दौरान कई लोग इसका सेवन करते हैं।लौंग का पाउडर : लौंग को पीसकर उसका पाउडर बनाया जा सकता है। इसकी थोड़ी-सी मात्रा को गुनगुने पानी, हर्बल चाय या कुछ डिशेज में मिलाकर लिया जा सकता है।लौंग का तेल : लौंग के तेल का इस्तेमाल मुख्य रूप से दांत दर्द या मसूड़ों की समस्या में किया जाता है। लेकिन इसे सीधे मुंह या त्वचा पर नहीं लगाना चाहिए। हमेशा किसी कैरियर ऑयल, जैसे- नारियल या जैतून के तेल में मिलाकर और डॉक्टर या डेंटिस्ट की सलाह के अनुसार ही इस्तेमाल करें।लौंग पर क्या कहती है रिसर्च?NCBI पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक, लौंग में यूजेनॉल नामक प्रमुख बायोएक्टिव यौगिक पाया जाता है, जो इसके दर्द निवारक, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और रोगाणुरोधी गुणों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। कई लैब और प्रीक्लिनिकल अध्ययनों में यूजेनॉल को फ्री-रेडिकल्स से होने वाले नुकसान को कम करने, सूजन घटाने और कुछ बैक्टीरिया व फंगस की वृद्धि को रोकने में प्रभावी पाया गया है। हालांकि, इन अध्ययनों का बड़ा हिस्सा प्रयोगशाला या पशुओं पर किया गया है।रिसर्चर्स का कहना है कि लौंग के संभावित स्वास्थ्य लाभों की पुष्टि के लिए अभी बड़े स्तर पर मानवों पर क्लीनिकल ट्रायल की आवश्यकता है। मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं कहते कि लौंग किसी बीमारी का इलाज है। इसलिए इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर सीमित मात्रा में ही सेवन करना चाहिए। इसके अलावा, अधिक मात्रा में लौंग या लौंग के तेल का सेवन नुकसानदायक भी हो सकता है, इसलिए औषधीय उपयोग से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।लौंग पर डाइटिशियन की राय क्या है?लौंग एक ऐसा मसाला है, जिसमें यूजेनॉल, एंटीऑक्सीडेंट और अन्य बायोएक्टिव यौगिक पाए जाते हैं। सीमित मात्रा में इसका सेवन पाचन को बेहतर बनाने, सूजन कम करने और शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसे किसी बीमारी के इलाज या दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। रोजमर्रा के खाने लौंग को अगर आप मसालों के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो 1 से 2 लौंग का ही इस्तेमाल करें। लेकिन ध्यान रखें कि डायबिटीज, लिवर की बीमारी, ब्लड थिनर दवाएं लेने वाले लोगों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को लौंग या लौंग के तेल इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। अगर ऐसे लोग लौंग का इस्तेमाल करते हैं, तो एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।आयुर्वेद में लौंग का क्या है महत्व?आयुर्वेद की दृष्टि में लौंग सिर्फ स्वाद और सुगंध बढ़ाने वाला मसाला नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण औषधीय द्रव्य है। आयुर्वेद में इसके कटु, तिक्त एवं कषाय रस, उष्ण वीर्य तथा कफ-वात शामक गुणों का वर्णन मिलता है। माना जाता है कि यह पाचन शक्ति को बेहतर बनाने, शरीर के दोषों का संतुलन बनाए रखने और समग्र स्वास्थ्य का समर्थन करने में सहायक हो सकती है।आयुर्वेदिक ग्रंथों में लौंग को दीपन, पाचन, कृमिघ्न, वेदनास्थापक और मुखशोधक गुणों वाली औषधि बताया गया है। पारंपरिक रूप से इसका उपयोग अपच, गैस, भूख न लगना, दांत और मसूड़ों की समस्याएं, मुंह की दुर्गंध तथा गले से जुड़ी कुछ परेशानियों में किया जाता रहा है। आधुनिक शोधों के अनुसार, लौंग में पाया जाने वाला यूजेनॉल (Eugenol) जीवाणुरोधी, सूजनरोधी और दर्दनिवारक गुणों के लिए जाना जाता है, जिससे इसके कई पारंपरिक उपयोगों को वैज्ञानिक आधार भी मिलता है।एक दिन में कितनी मात्रा में लौंग खा सकते हैं?डॉक्टर का कहना है कि आमतौर पर 1-2 साबुत लौंग या भोजन में मसाले के रूप में इस्तेमाल की गई मात्रा अधिकांश स्वस्थ लोगों के लिए पर्याप्त मानी जाती है। अगर आप लौंग का सेवन किसी स्वास्थ्य समस्या के लिए नियमित रूप से करना चाहते हैं, तो पहले डॉक्टर या डाइटीशियन से सलाह लेना बेहतर हो सकता है।
- आज के समय में ज्यादातर लोग ब्लड प्रेशर की समस्या से परेशान रहते हैं, लेकिन इसमें भी ज्यादातर लोग हाई ब्लड प्रेशर की बात करते हैं, लो ब्लड प्रेशर पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि लो ब्लड प्रेशर के कारण भी लोगों को स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लो ब्लड प्रेशर यानी हाइपोटेंशन की स्थिति में ब्लड प्रेशर नॉर्मल से कम हो जाता है, तो खून पर्याप्त मात्रा में शरीर के जरूरी अंगों तक नहीं पहुंच पाता है। इसके कारण लोगों को चक्कर, कमजोर, धुंधला दिखने, थकान और बेहोशी आने जैसी समस्याएं होती हैं।लो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए क्या खाएं?लो ब्लड प्रेशर की समस्या से राहत के लिए सीमित नमक लें, नारियल पानी पिएं, केला, चुकंदर, दही, ड्राई फ्रूट्स जैसे फूड्स को डाइट में शामिल करें। इसके अलावा, लो ब्लड प्रेशर में पोटेशियम, फोलेट और विटामिन बी12 युक्त फूड्स को शामिल करना भी फायदेमंद होता है। इनका सेवन करने से ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। साल 2025 में Journal Of Clinical Medicine में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, लो ब्लड प्रेशर की समस्या में खान-पान में नमक की मात्रा , कॉफी, अधिक लिक्विड (फ्लुइड्स), कॉफी, पोटेशियम युक्त फूड, थोड़ी कैलोरीज और कुछ शारीरिक एक्टिविटीज को करना फायदेमंद होता है।1. सही मात्रा में नमक लेंलो ब्लड प्रेशर वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह अनुसार ही लिमिट से थोड़ा ज्यादा नमक का सेवन करना फायदेमंद होता है। नमय में सोडियम क्लोराइड होता है, जिससे शरीर में वॉटर बैलेंस करने में मदद मिलती है और ब्लड प्रेशर का स्तर बढ़ता है, लेकिन इसका अधिक सेवन न करें। जरूरत से ज्यादा नमक का सेवन करने से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है।2. नारियल पानी या पानी पिएंशरीर में पानी की कमी होना लो ब्लड प्रेशर के सबसे आम कारणों में से एक है। ऐसे में लो ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए शरीर को हाइड्रेट रखना जरूरी हो जाता है। इसके लिए डाइट में नारियल पानी या पानी में चुटकीभर नमक को डालकर इसका सेवन किया जा सकता है। बता दें, नारियल पानी में अच्छी मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट और पोटेशियम जैसे पोषक तत्व होते हैं।ऐसा करने से शरीर में ब्लड के वॉल्यूम को बेहतर करने और शरीर में पानी की कमी को दूर करने में मदद मिलती है या बचाव करने में मदद मिलती है।3. ब्लैक कॉफी पिएंलो ब्लड प्रेशर की स्थिति में कैफीन युक्त ब्लैक कॉफी का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसका सेवन करने से शरीर में ब्लड प्रेशर के स्तर को बढ़ाने में मदद मिलती है। जिससे कार्डियोवेस्कुलर सिस्टम को बेहतर करने में मदद मिलती है। ध्यान रहे, इसके लिए ब्लैक कॉफी का सेवन करें। इसका सेवन बिना चीनी के करने से स्वास्थ्य को अधिक लाभ मिलते हैं। इसके अलावा, ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए डार्क चॉकलेट, कोको या चाय का सेवन किया जा सकता है।साल 2021 में Journal of Functional Foods में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, कैफीन युक्त ड्रिंक्स का सेवन करने से थोड़े समय के लिए ब्लड प्रेशर बढ़ता है।4. अंडेलो ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए लोगों को फोलेट और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्वों से युक्त फूड्स को डाइट में शामिल करने की सलाह दी जाती है। ऐसे में इसके लिए अंडे को डाइट में शामिल करना फायदेमंद होता है। अंडे में अच्छी मात्रा में फोलेट, प्रोटीन और विटामिन बी12 होता है। इसका सेवन करने से लो ब्लड प्रेशर को बेहतर करने और स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिलती है।5. किशमिश खाएंलो ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए डाइट में रातभर पानी में भिगोई हुई किशमिश को भी शामिल किया जा सकता है। इनमें अच्छी मात्रा में आयरन और कई अन्य पोषक तत्व होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर को एनर्जी देने, ब्लड प्रेशर के स्तर को बढ़ाने और कमजोरी को दूर करने में मदद मिलती है।6. दालें खाएंलो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए दालों को भी डाइट में शामिल किया जा सकता है। दालों में अच्छी मात्रा में आयरन और फोलेट के गुण होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर में खून की कमी को दूर करने और लो बीपी को बढ़ाने में मदद मिलती है।7. मछली खाएंमछली में अच्छी मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड, सोडियम और प्रोटीन जैसे पोषक तत्व होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर में ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित करने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद मिल सकती है। ध्यान रहे, इसका सेवन डॉक्टर की सलाह अनुसार ही करें।8. ब्रोकली खाएंलो बीपी से राहत के लिए डाइट में ब्रोकली को भी शामिल किया जा सकता है। इसमें अच्छी मात्रा में आयरन, फोलेट और प्रोटीन जैसे पोषक तत्व होते हैं। इसके अलावा, ब्लड प्रेशर के स्तर को बढ़ाने के लिए डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियों को भी शामिल किया जा सकता है।9. खट्टे फल खाएंखट्टे फलों में टायरामाइन नामक अमीनो एसिड होता है, जो खट्टे फलों से मिलता है, साथ ही इनमें अच्छी मात्रा में फोलेट होता है। ऐसे में लो ब्लड प्रेशर की स्थिति में सुधार करने के लिए डाइट में संतरे, नींबू, अंगूरों और पाइनएप्पल को डाइट में शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा, स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए एवोकाडो और केले जैसे फूड्स को लेना भी फायदेमंद है।10. चीज़ खाएंलो ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए चीज़ का सेवन करना भी फायदेमंद होता है। इसमें टायरामाइन नामक कंपाउड होता है, जो पार्मेजान, फेटा और चेडर चीज़ में भी होता है। ऐसे में इनका सेवन करने से ब्लड प्रेशर के स्तर को बढ़ाने में मदद मिलती है। लो ब्लड प्रेशर की समस्या से राहत के लिए डाइट में विटामिन बी12 और फोलेट जैसे पोषक तत्वों से युक्त एनीमल मीट, फोर्टिफाइड सीरियल, बीन्स और खट्टे फल फायदेमंद होते हैं।डॉक्टर से कब मिलें?अगर किसी व्यक्ति को लगातार कमजोर रहने, चक्कर आने, धुंधला दिखने, दिल की धड़कन के तेज होने और बेहोशी आने की समस्या महसूस होती है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें, ताकिन इन परेशानियों के असल कारण का पता लगाया जा सके और समय से इलाज मिल सके।
- डायबिटीज के मरीजों को अपनी डाइट में ऐसी रोटी शामिल करनी चाहिए, जो ब्लड शुगर को स्पाइक होने से रोक सके। नॉर्मल गेहूं की रोटी की तुलना में कुछ अनाज से तैयार रोटी ब्लड शुगर को शरीर में धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। अगर सही आटे से बनी रोटी को संतुलित और सही मात्रा में खाया जाए तो यह ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल रखने के साथ-साथ लंबे समय तक पेट को भरा रखने में मदद करती है। गेहूं की रोटी के स्थान पर रागी, जौ और चना से तैयार रोटी का सेवन डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है। इसलिए, आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि डायबिटीज के मरीजों के लिए सबसे अच्छी रोटियां कौन-सी हैं?डायबिटीज के मरीज गेहूं के स्थान पर रागी, जौ, मल्टीग्रेन आटे की रोटी शामिल कर सकते हैं। आइए जानते हैं इन्हें खाने के फायदों के बारे में-1. रागी की रोटीरागी फाइबर, कैल्शियम और आयरन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम माना जाता है, जिससे इसे खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता है। रागी में मौजूद फाइबर आपके पाचन क्रिया को धीमा करता है और लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता है। यह वजन कंट्रोल करने में भी मदद कर सकता है, जो डायबिटीज मरीजों के लिए फायदेमंद है।साल 2025 में Rehman Journal of Health Sciences में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, रागी का आटा डायबिटीज में ग्लाइसेमिक कंट्रोल में सुधार करने का एक सुरक्षित तरीका है। इसमें फाइबर, प्रोटीन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं, जो डायबिटीज को मैनेज करते हैं।कैसे खाएं?रागी के आटे में थोड़ी मात्रा में गेहूं या चना आटा मिलकर इसकी रोटी बनाएं। इस रोटी को दाल, हरी सब्जी या लो-फैट दही के साथ खाएं।2. जौ की रोटीसाल 2025 में Scientific Reports के जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, जौ फाइबर का एक अच्छा स्रोत है। जौ में मौजूद बीटा-ग्लूकन घुलनशील फाइबर पाचन तंत्र में शुगर के अवशोषण को कम कर सकता है। जौ का इस्तेमाल करने से ब्लड शुगर कम करने वाले संभावित एजेंट होते हैं, जो खाना खाने के बाद बढ़ने वाले ब्लड शुगर को कम करने में मदद कर सकता है।कैसे खाएं?जौ के आटे में थोड़ा गेहूं का आटा मिलाकर रोटी बनाएं। इसके बाद इसे दाल, पनीर या हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ खाएं।3. चना की रोटीचना प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होता है। यह धीरे-धीरे पचता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल ज्यादा बढ़ने की संभावना कम होने लगती है। साथ ही, प्रोटीन की अच्छी मात्रा होने के कारण मांसपेशियों के स्वास्थ्य और लंबे समय तक पेट को भरा महसूस कराने में मदद करता है।कैसे खाएं?बेसन में थोड़ी मात्रा में गेहूं या जौ का आटा मिलाकर रोटी तैयार कर लें। इस रोटी को दही, सलाद और हरी सब्जियों के साथ खाएं। तली हुई सब्जियों के स्थान पर कम तेल वाली सब्जियां चुनें।4. मल्टीग्रेन रोटीमल्टीग्रेन रोटी कई तरह के अनाज जैसे गेहूं, जौ, रागी, चना, ज्वार और बाजरा को मिलाकर तैयार किया जाता है। इससे शरीर को फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स जैसे पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि बाजार में मिलने वाले सभी मल्टीग्रेन आटे एक जैसे नहीं होते हैं। इसलिए, ऐसा मल्टीग्रेन आटे चुनें, जिसमें साबुत अनाज ज्यादा हों और रिफाइंड आटा कम हों।कैसे खाएं?मल्टीग्रेन आटे की 1 या 2 रोटी को सब्जी या दाल के साथ मिलकर खाएं। खाने में सलाद जरूर शामिल करें। ज्यादा तेल, घी या बटर का इस्तेमाल करने से बचें।5. ओट्स की रोटीओट्स में बीटा-ग्लूकन नाम का घुलनशील फाइबर पाया जाता है, जो ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल दोनों को कंट्रोल रखने में मदद कर सकता है। ओट्स की रोटी पाचन को बेहतर बनाने और लंबे समय तक एनर्जी बनाए रखने में मदद कर सकती है।कैसे खाएं?ओट्स के आटे में गेहूं या चना आटा मिलाकर रोटी तैयार करें। इसे दाल, अंकुरित सलाद या कम फैट वाले पनीर के साथ खाएं। नाश्ते या दोपहर के भोजन में आप इस रोटी को शामिल कर सकते हैं।शुगर में कितनी रोटी खानी चाहिए?डायबिटीज के मरीजों को एक बार में 1 से 2 रोटी खानी चाहिए। दिनभर में कुल 4 से 6 रोटी से ज्यादा नहीं खानी चाहिए। यह मात्रा व्यक्ति की शारीरिक गतिविधि, उम्र और वजन पर निर्भर करती है।शुगर में सबसे ज्यादा क्या खाना चाहिए?डायबिटीज के मरीजों को सबसे ज्यादा हरी पत्तेदार सब्जियां, फाइबर से भरपूर साबुत अनाज और प्रोटीन से भरपूर चीजों का सेवन करना चाहिए। ये चीजें ब्लड में शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देती हैं।
- विटामिन K वसा में घुलनशील (Fat-soluble) विटामिन है। यह शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों में से एक है। विटामिन K कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, लेकिन इसकी जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट भी लिया जा सकता है। विटामिन K, मुख्य रूप से 2 प्रकार का होता है- फाइलोक्विनोन (Vitamin K1) और मेनाक्विनोन (Vitamin K2)। विटामिन K1 मुख्य रूप से हरी पत्तेदार सब्जियों, जैसे- पालक, मेथी, सरसों, केल और ब्रोकली आदि में पाया जाता है। वहीं, विटामिन K2 मुख्य रूप से फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों और कुछ पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। इसके अलावा, आंतों में मौजूद गुड बैक्टीरिया भी विटामिन K2 का उत्पादन करते हैं।शरीर में विटामिन K क्या काम करता है?National Institute of Health (NIH) के अनुसार, विटामिन K शरीर में कोएंजाइम के रूप में काम करता है। यह कई एंजाइमों को एक्टिव करता है, जो जरूरी प्रोटीन बनाने में मदद करते हैं। ये प्रोटीन मुख्य रूप से इन कार्यों के लिए जिम्मेदार होते हैं--खून का थक्का (Blood Clot) बनने में मदद करता है विटामिन K-विटामिन K हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है।-यह कैल्शियम के सही उपयोग में सहायता करता है-विटामिन K कई शारीरिक प्रक्रियाओं को सुचारु रूप से चलाने का कार्य करता हैविटामिन K के सोर्स क्या हैं?आरोग्य डाइट और न्यूट्रिशन क्लीनिक के अनुसार, फाइलोक्विनोन (विटामिन K1) के प्रमुख सोर्स में हरी पत्तेदार सब्जियां, वेजिटेबल ऑयल और कुछ फल शामिल हैं। सोयाबीन तेल और कैनोला तेल में भी विटामिन K पाया जाता है।हर दिन विटामिन K की कितनी जरूरत होती है?NIH के अनुसार, विटामिन K की दैनिक जरूरत उम्र, लिंग, प्रेग्नेंसी और स्तनपान के अनुसार अलग-अलग होती है। हालांकि, विटामिन K के लिए अभी पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण Recommended Dietary Allowance (RDA) निर्धारित नहीं की गई है। इसकी जगह Adequate Intake (AI) तय की गई है। AI वह मात्रा है, जिसे ज्यादातर स्वस्थ लोगों की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जाता है।विटामिन K की कमी के क्या लक्षण हैं?विटामिन K की कमी होने पर शरीर में खून का थक्का (Blood Clot) बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। ऐसे में अगर शरीर में विटामिन K की कमी होती है, तो चोट लगने पर खून देर तक बह सकता है और शरीर से आसानी से रक्तस्त्राव हो सकता है। इसकी कमी होने पर कई लक्षण नजर आ सकते हैं--चोट लगने पर लंबे समय तक खून बहना-मामूली चोट पर भी आसानी से नीले निशान पड़ जाना-महिलाओं में सामान्य से अधिक मासिक धर्म रक्तस्राव-गंभीर मामलों में शरीर के अंदर रक्तस्राव-नाक से बार-बार खून आना-मसूड़ों से बार-बार खून आना-मल या पेशाब में खून आनाकिन लोगों में रहता है विटामिन K की कमी का ज्यादा खतरा?-जो लोग लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन करते हैं, उनमें इसका खतरा ज्यादा हो सकता है।-सीलिएक रोग, क्रोहन रोग या सिस्टिक फाइब्रोसिस के मरीजों में भी विटामिन के की कमी पाई जा सकती है।-लिवर की गंभीर बीमारी वाले लोगों में विटामिन के कम पाया जा सकता है।-लंबे समय तक बहुत कम वसा वाला आहार लेने वाले लोगों में विटामिन K कम हो सकता है।-नवजात शिशुओं में विटामिन K की मात्रा कम पाई जा सकती है।
- क्या आप भी मॉनसून में पालक, गोभी जैसी सब्जियां खाते हैं? यह आपको बीमार बना सकती हैं। कई बार मॉनसून में गलत सब्जियों को खाने के कारण तबीयत खराब हो जाती है। जिन सब्जियों को हम शौक से गर्मियों में खाते हैं, उसे मॉनसून आने पर भी खाया जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। मॉनसून में गलत सब्जियों का सेवन करने से अपच, गैस, डायरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। जानें अच्छी सेहत के लिए मॉनसून में कौन सी सब्जियां खाएं और किन सब्जियों से परहेज करें?मॉनसून में खाएं ये सब्जियां1. करेला-उमस और नमी वाले मौसम में एक्ने, स्किन एलर्जी बढ़ने का खतरा रहता है। ऐसे में करेला खाना फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद विटामिन ए, सी, फाइबर त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।-करेला खाने से इम्यूनिटी को बढ़ाया जा सकता है।-करेला ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करता है।-इसे खाकर दिनभर एनर्जी बनी रहती है। हफ्ते में एक बार करेला खा सकते हैं।2. लौकी-मॉनसून में चिपचिपा मौसम होता है। ऐसे में शरीर में पानी की कमी से डिहाइड्रेशन हो सकता है। इससे बचने के लिए लौकी का सेवन फायदेमंद है क्योंकि इसमें वॉटर कटेंट ज्यादा होता है।-लौकी हल्की होती है इसलिए पाचन तंत्र पर दबाव नहीं डालती।-मॉनसून में लौकी का गर्म सूप पिएं या हल्के मसालों के साथ सब्जी बनाकर खाएंगे, तो पाचन स्वस्थ रहेगा।3. परवलबारिश के मौसम में कई लोगों को अपच और पेट से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं जिसे दूर करने के लिए परवल का सेवन कर सकते हैं। परवल आसानी से पचने वाली सब्जियों में शामिल है। परवल बाजार में आसानी से मिलती है और इससे पेट में भारीपन और अन्य पाचन समस्याओं को दूर करने में मदद मिलती है।4. कद्दू-कद्दू में विटामिन्स, मिनरल्स और कई पोषक तत्व होते हैं जो शरीर को एनर्जी देते हैं।-यह पेट के एसिड को कंट्रोल करने में मदद करता है जिससे मॉनसून में हार्टबर्न और एसिडिटी से राहत मिलती है।-कद्दू में विटामिन ए और सी मौजूद होते हैं जो मॉनसून में इम्यूनिटी को सपोर्ट करते हैं।5. तोरई-तोरई की तासीर ठंडी होती है।-बच्चे हों या बुजुर्ग सभी इसे आसानी से पचा सकते हैं।-बाहर का तापमान और नमी लगातार बदलने से मॉनसून में गैस और एसिडिटी होती है। इससे राहत के लिए तोरई का सेवन फायदेमंद है।-इसमें मौजूद फाइबर कब्ज से राहत दिलाता है।6. टिंडा-उमस और नमी वाले मौसम में टिंडा खाना फायदेमंद होता है।-इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं जो स्किन इंफेक्शन से बचाते हैं।-इसमें कैलोरी कम होती है जिससे वेट मैनेजमेंट में मदद मिलती है और इसे खाने से पेट के भारीपन से राहत मिलती है।7. ग्वार की फली-ग्वार की फली में फाइबर और प्रोटीन जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं।-इसमें फाइबर ज्यादा होता है इसलिए यह कब्ज से राहत देने में मदद करती है।-सुस्ती और कमजोरी दूर करने के लिए यह फायदेमंद है।-यह हड्डियों और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करती है।-ग्वार की फली से सूखी भुजिया या सब्जी बनाकर मॉनसून में खाई जा सकती है।हरी पत्तेदार सब्जियों से बढ़ सकता है गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शनमॉनसून में कुछ सब्जियों से परहेज भी जरूरी है क्योंकि इनमें मौजूद नमी से सेहत खराब हो सकती है। हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पत्तागोभी, पालक वगैरह का सेवन करने से बचें। इन सब्जियों की पत्तियों में नमी होती है जिससे जीवाणु फैल सकते हैं और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियों से परहेज करेंकई सब्जियां जमीन के नीचे उगती हैं जैसे गाजर, चुकंदर, मूली वगैरह। मॉनसून में मिट्टी में नमी के कारण ये सब्जियां ज्यादा नमी सोख लेती हैं जिससे पेट में इंफेक्शन हाे सकता है इसलिए मॉनसून में इनसे भी परहेज करें। फूलगोभी और ब्रोकली में फ्लोरेट्स होते हैं जिसके नीचे नमी ज्यादा होती है इसलिए इनके सेवन से भी बचना चाहिए।कच्ची सब्जियों को खाने से बचेंकच्चा मक्का खाने से बचें और इसी तरह मटर में भी नमी होती है और उसमें फफूंद हो सकता है। मटर या मक्के को पकाना जरूरी है इसलिए मॉनसून में इन्हें कच्चा खाने से बचें। सब्जियों को हमेशा पकाकर खाएं। कुछ कच्ची सब्जियों में बैक्टीरिया हो सकते हैं जिससे अपच, पेट में गैस, पेट दर्द और डायरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं।अंकुरित चना या दाल भी कम खाएंमॉनसून में अंकुरित चना या दाल भी नहीं खाना चाहिए। कच्चे स्प्राउट्स में बैक्टीरिया हो सकते हैं। इसे उबालने से पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं इसलिए मॉनसून में इनका सेवन कम करें।ग्रीन हर्ब्स का सेवन कम करेंहमें लगता है ग्रीन हर्ब्स का सेवन सुरक्षित है, लेकिन मॉनसून में इनसे भी बचना चाहिए। धनिया पत्तियों का सेवन भी मॉनसून में ज्यादा नहीं करना चाहिए। मेथी, पुदीना से भी परहेज करें। इनका सेवन करने से पहले अच्छी तरह से धोना न भूलें।
- मानसून में नमी बढ़ने, पानी के जमाव और वातावरण में बैक्टीरिया व वायरस के बढ़ने से आंखों से जुड़ी परेशानियां भी तेजी से बढ़ सकती हैं। इस मौसम में आंखों में लालिमा, जलन, खुजली, पानी आना, सूजन और संक्रमण जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं।कई बार लोग आंखों में होने वाली छोटी परेशानी को नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर गंभीर समस्या का कारण बन सकती है। ऐसे में जरूरी है कि मानसून के दौरान आंखों की सही देखभाल की जाए और कुछ आसान सावधानियां अपनाई जाएं। इस लेख में जानेंगे कि बारिश में आंखों को सुरक्षित रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।बारिश के मौसम में आंखों की देखभाल क्यों जरूरी है?मानसून में वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिससे बैक्टीरिया, वायरस और फंगस तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसका सीधा असर आंखों की सेहत पर पड़ सकता है। आंखें शरीर का बेहद संवेदनशील हिस्सा होती हैं, इसलिए थोड़ी-सी लापरवाही भी संक्रमण और जलन जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है।बारिश में आंखों से जुड़ी आम समस्याएं---आंखों में संक्रमणमानसून में कंजंक्टिवाइटिस यानी आंख आना सबसे आम समस्या है। इसमें आंखें लाल हो जाती हैं, खुजली होती है, पानी आता है और कई बार आंखों से चिपचिपा पदार्थ भी निकल सकता है। यह संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकता है।आंखों में खुजली और जलनबारिश के मौसम में धूल, नमी और प्रदूषण के कारण आंखों में एलर्जी हो सकती है। इससे आंखों में खुजली, जलन और असहजता महसूस हो सकती है।गंदे पानी से नुकसानबारिश का पानी कई बार बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवों से दूषित हो सकता है। यदि यह पानी आंखों में चला जाए तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।सूखी आंखों की समस्याबारिश में मौसम ठंडा और नम होने के बावजूद कई लोगों को स्क्रीन टाइम बढ़ने, एसी के इस्तेमाल या कम पलक झपकाने के कारण ड्राई आई की समस्या हो सकती है।मानसून में आंखों की देखभाल के आसान तरीकेआंखों को छूने से पहले हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोएं। गंदे हाथों से आंखों को रगड़ने से संक्रमण फैल सकता है।यदि आंखों में खुजली या जलन हो रही है तो उन्हें बार-बार रगड़ने से बचें, क्योंकि इससे समस्या बढ़ सकती है।आंख धोने या चेहरा साफ करने के लिए साफ पानी का इस्तेमाल करें। बारिश के गंदे पानी से आंखों को बचाएं।किसी दूसरे व्यक्ति का तौलिया, रुमाल या कॉस्मेटिक सामान इस्तेमाल करने से संक्रमण फैल सकता है।मोबाइल, लैपटॉप और टीवी का ज्यादा इस्तेमाल आंखों पर दबाव डाल सकता है। बीच-बीच में आंखों को आराम देना जरूरी है।कॉन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने वाले रखें सावधानीबारिश के मौसम में कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वालों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। गंदे हाथों से लेंस लगाने या लंबे समय तक लेंस पहनने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
- सेब को दुनिया के सबसे पौष्टिक फलों में गिना जाता है और इसे संतुलित आहार का अहम हिस्सा माना जाता है। इसमें फाइबर, विटामिन-सी, पोटैशियम और कई शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। यही वजह है कि इसे रोजाना खाने की सलाह दी जाती है।हालांकि, क्या सिर्फ एक सेब रोज खाने से आप कभी बीमार नहीं पड़ेंगे और डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी? इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इस लेख में जानेंगे कि रोज एक सेब खाने से शरीर को क्या-क्या फायदे मिलते हैं, यह किन बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है और इस मशहूर कहावत में कितनी सच्चाई छिपी है।"An Apple a Day Keeps the Doctor Away" एक लोकप्रिय कहावत है, लेकिन इसे शाब्दिक रूप से सच नहीं माना जा सकता। इसका मतलब यह है कि यदि आप रोजाना सेब समेत पौष्टिक भोजन खाते हैं और स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं, तो कई बीमारियों का खतरा कम हो सकता है। हालांकि, सिर्फ सेब खाने से सभी बीमारियों से बचाव संभव नहीं है।सेब में कौन-कौन से पोषक तत्व होते हैं?सेब में कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जैसे:फाइबरविटामिन Cपोटैशियमएंटीऑक्सीडेंटपॉलीफेनॉल्सप्राकृतिक कार्बोहाइड्रेटकम कैलोरीये सभी पोषक तत्व शरीर की विभिन्न कार्यप्रणालियों को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं।रोज सेब खाने के फायदे---सेब में मौजूद घुलनशील फाइबर (पेक्टिन) पाचन को बेहतर बनाने और कब्ज की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।यह आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को भी समर्थन देता है।सेब में मौजूद फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और हृदय को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाने में योगदान देते हैं और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं।सेब में कैलोरी कम और फाइबर अधिक होता है। इसे खाने से पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस हो सकता है, जिससे ओवरईटिंग की संभावना कम होती है।फाइबर और पॉलीफेनॉल्स के कारण सेब ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने में मदद कर सकता है।सेब में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद करते हैं, जिससे त्वचा और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है।क्या सिर्फ सेब खाने से डॉक्टर दूर रहेगा?नहीं। अच्छी सेहत के लिए सिर्फ सेब खाना काफी नहीं है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव का सही प्रबंधन और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी उतनी ही जरूरी हैं। सेब एक हेल्दी डाइट का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह किसी बीमारी का इलाज या पूरी तरह बचाव की गारंटी नहीं है।
- सुंदर बाल आपके लुक को काफी हद तक इंहेंस कर सकते हैं। अगर आपके बार स्मूद, सिल्की और चमकदार हैं तो हर किसी की आंखें एक ना एक बार आपके बालों पर जरूर टिकेंगी। अच्छे बालों के लिए उनकी सही केयर करना जरूरी है। बालों की केयर करने के लिए आप घर के बने हेयर मास्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। यहां हम गुड़हल के फुल से हेयर मास्क बनाने का तरीका बता रहे हैं। सीखिए--मास्क बनाने के लिए क्या चाहिए- गुड़हल के फूल- एक प्याज- गुड़हल की पत्तियां- एक मुट्ठी कड़ी पत्ता- एक चम्मच मेथी दाना- एक चम्मच काला जीरागुड़हल फूल का मास्क कैसे बनाएंइस मास्क को बनाने के लिए सबसे पहले गुड़हल के ताजे फूलों को लें और अच्छी तरह से धो लें। प्याज को छीलकर भी कुछ टुकड़ों में काट लें। फिर गुड़हल की साफ हरी पत्तियों और कड़ी पत्ता को धोकर एक तरफ रख लें। इस मास्क को बनाने के लिए मेथी दाना और काले जीरा को पानी में कुछ देर के लिए भिगो दें। अब एक मिक्सर जार में सभी चीजों को डालें और फिर अच्छे से पीसकर एक पेस्ट तैयार कर लें।कैसे लगाएं गुड़हल के फूल का मास्कइसे लगाने के लिए बालों को सुलझाकर हल्का गीला कर लें। अब मास्क को सबसे पहले स्कैल्प पर उंगलियों से हल्के हाथों से लगाएं। फिर पूरे बालों की लंबाई पर अच्छी तरह फैला दें। 30-45 मिनट तक लगा रहने दें। इसके बाद गुनगुने पानी से धो लें और हल्के शैम्पू से बाल साफ कर लें। इस मास्क को हफ्ते में एक या दो बार लगा सकते हैं।गुड़हल के फूल का मास्क बनाने के फायदेगुड़हल का प्राकृतिक म्यूसीलेज याना जेल जैसा पदार्थ बालों को कंडीशन करने में मदद कर सकता है। ऐसे में ये मास्क बालों को मुलायम और चमकदार बनाने में मदद करता है।अगर स्कैल्प रूखी है, तो यह मास्क मॉइस्चराइजर का काम कर सकता है।अच्छी तरह से मॉइस्चराइज बालों के टूटने की संभावना कम हो सकती है। इसके अलावा ये स्कैल्प पर जमी गंदगी और एक्सट्रा तेल हटाने में कुछ हद तक मदद कर सकता है।
- बारिश का मौसम शुरू होते ही काफी सारे लोग खुजली, इंफेक्शन, दाने और रैशेज जैसी समस्याओं से परेशान होने लगते हैं। ढेर सारा पसीना और बदबू के साथ होने वाली इन दिक्कतों के लिए कितनी भी दवा लगा ली जाए ये दोबारा वापस आ जाते हैं। ऐसे में बार-बार डॉक्टर के चक्कर लगाने से अच्छा है कि ये 3 काम रोजाना करना शुरू कर दें। जो आपको खुजली, फंगल इंफेक्शन और रैशेज जैसी समस्याओं से बचाने में मदद करेगी। आयुर्वेदिक डॉक्टर मनीषा मिश्रा ने बारिश के मौसम में होने वाली 3 समस्याओं के लिए 3 समाधान बताया है। जिसे हर किसी को जरूर याद रखना चाहिए। और, मॉनसून शुरू होने के साथ इसे फॉलो करेंगे तो इन सब दिक्कतों से बचे रहेंगे। जान लें ये 3 मॉनसून स्किन हैक….कत्था दूर करेगा फंगल इंफेक्शन की समस्याबारिश का मौसम शुरू होते ही बार-बार फंगल इंफेक्शन शरीर में हो जाता है तो इसका आयुर्वेदिक सॉल्यूशन है कत्था, जिसे खदेर भी कहते हैं। कत्था इंफ्यूस्ड वाटर आपको बार-बार होने वाले फंगल इंफेक्शन से बचाने में मदद कर सकता है। बस कत्था पाउडर एक चम्मच लें और इसे बाल्टी में घोल लें। नहाने के बाद सबसे आखिर में इस कत्था घुले पानी को पूरे शरीर पर डालें। इसके बाद सादा पानी डालने की जरूरत नहीं है। कत्था को आयुर्वेद में स्किन के फंगल इंफेक्शन में राहत पहुंचाने वाला माना जाता है। बार-बार फंगल इंफेक्शन हो जाता है तो इस आयुर्वेदिक रेमेडी को ट्राई करें।तुलसी नीम का पाउडरशरीर के जिन एरिया पर बार-बार पसीना होता है और वो गीले रहते हैं तो वहां रैशेज और इंफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है। तो इन गीली जगह को सबसे पहले सुखा लें। फिर इन जगहों पर तुलसी और नीम के पाउडर को लगाएं। तुलसी और नीम दोनों ही एंटीबैक्टीरियल और एंटी फंगल माने जाते हैं। इनका पाउडर डायरेक्ट स्किन पर लगाने से स्किन को सूखा रखता है, पसीना से बचाता है और साथ ही इंफेक्शन और रैशेज से बचाव होता है।नारियल कपूर का तेलजिन लोगों को गर्मी और बारिश के दिनों में बार-बार खुजली हो जाती है और वहां पर रैशेज हो जाते हैं, उन्हें नारियल के तेले में थोड़ी सी भीमसेनी कपूर को पाउडर बनाकर डाल देना चाहिए। ये कपूर इंफ्यूस्ड कोकोनट ऑयल शरीर की खुजली और रैशेज का रामबाण उपाय है। जिन जगहों पर खुजली हो रही हो वहां पर इस नारियल के तेल को लगाएं, स्किन को राहत और ठंडक मिलेगी।
- कुछ लोगों के लिए कार, बस या पहाड़ी रास्तों पर सफर करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। गाड़ी में बैठते ही जी मिचलाना, चक्कर आना, पसीना आना और उल्टी जैसा महसूस होना मोशन सिकनेस के सामान्य लक्षण हैं। यह समस्या तब होती है जब आंखों, कानों और मस्तिष्क को शरीर की गति के बारे में अलग-अलग संकेत मिलते हैं।बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कुछ संवेदनशील लोगों में यह परेशानी अधिक देखने को मिलती है। हालांकि यह कोई गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन सफर का पूरा मजा खराब कर सकती है। अच्छी बात यह है कि कुछ आसान घरेलू उपाय और छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक राहत पाई जा सकती है।अगर आप भी गाड़ी में बैठते ही उल्टी या जी मिचलाने की समस्या से परेशान रहते हैं, तो यहां बताए गए उपाय आपके अगले सफर को आरामदायक और आसान बना सकते हैं।अदरक का सेवन करेंअदरक को प्राकृतिक एंटी-नॉजिया माना जाता है। सफर शुरू करने से पहले अदरक का छोटा टुकड़ा चबाना या अदरक की चाय पीना जी मिचलाने और उल्टी की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। आप चाहें तो अदरक वाली कैंडी भी साथ रख सकते हैं।हल्का भोजन करेंखाली पेट सफर करने से भी कुछ लोगों को उल्टी की समस्या हो सकती है, वहीं बहुत ज्यादा तला-भुना या मसालेदार खाना खाने से भी परेशानी बढ़ सकती है। सफर से पहले हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन करना बेहतर रहता है।आगे की सीट पर बैठेंअगर कार से यात्रा कर रहे हैं तो आगे की सीट पर बैठने की कोशिश करें। इससे सड़क साफ दिखाई देती है और शरीर को गति का बेहतर एहसास होता है, जिससे मोशन सिकनेस की संभावना कम हो सकती है।नींबू और पुदीना इस्तेमाल करेंनींबू की खुशबू या पुदीने की चाय और पुदीने की टॉफी कई लोगों में मतली कम करने में मदद कर सकती है। सफर के दौरान इन्हें साथ रखना फायदेमंद हो सकता है।जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेंअगर हर बार यात्रा के दौरान तेज उल्टी, चक्कर या अत्यधिक परेशानी होती है, तो डॉक्टर से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर वे मोशन सिकनेस की दवा लेने की सलाह दे सकते हैं।सफर के दौरान इन बातों का रखें ध्यान--00 तेज खुशबू वाले परफ्यूम या भोजन से दूरी रखें।00 लंबी यात्रा में बीच-बीच में ब्रेक लें।00 पर्याप्त नींद लेकर ही यात्रा करें।00 आरामदायक कपड़े पहनें।00 गहरी और धीमी सांस लेने की कोशिश करें।
- नहाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे व्यक्ति अपने शरीर को साफ करने के लिए फॉलो करता है। दिनभर बाहर रहने की वजह से शरीर पर धूल, पसीना और गंदगी चिपक जाती है, जिसे साफ करने के लिए रोजाना नहाना जरूरी होता है। जब आप रोजाना नहाते हैं तो त्वचा साफ रहती है और संक्रमण का खतरा कम हो सकता है। वैसे तो अधिकतर लोग सुबह काम पर जाने से पहले नहाते हैं, लेकिन क्या वाकई सुबह के समय नहाना सही है? यहां जानिए सुबह, दोपहर या शाम में से नहाने का बेस्ट समय कौन सा है।पौराणिक और आयुर्वेद की मान्यतापुराने ग्रंथों की मानें तो नहाने को केवल शरीर की सफाई का काम नहीं बल्कि शुद्धि की एक प्रक्रिया माना गया है। आयुर्वेद सुबह जल्दी, खासकर ब्रह्ममुहूर्त में नहाने की सलाह देता है। ब्रह्ममुहूर्त सूरज उगने से लगभग 48 मिनट पहले होते है। कहा जाता है कि इस समय पर नहाने से इंद्रियां जागृत होती हैं। इससे सुबह की नींद खुलने में भी मदद मिलती है।आयुर्वेद की सलाहआयुर्वेद में हैवी खाने के तुरंत बाद नहाने से मना किया जाता है। कहते हैं ऐसा करने से पेट से खून का बहाव दूसरी तरफ चला जाता है, जिससे पाचन धीमा हो जाता है। हमेशा खाना खाने से पहले नहाना चाहिए या खाने के बाद कम से कम दो घंटे का इंतजार करना चाहिए। नहाने का समय अपने शरीर की प्रकृति के हिसाब से तय करना चाहिए। माना जाता है कि सुबह नहाने से कफ दोष के कारण होने वाली सुस्ती दूर होती है, जबकि शाम को गर्म पानी से नहाना वात प्रकृति वाले लोगों के लिए बहुत फायदेमंद और संतुलित बनाने वाला होता है।क्या कहता है साइंससाइंस में सुबह नहाने की सलाह दी जाती है क्योंकि रात भर हमारे शरीर से पसीना निकलता है और स्किन सेल्स झड़ते हैं। सुबह नहाने से सोते समय जमा हुए बैक्टीरिया हट जाते हैं और आप लंबे समय तक फ्रेश महसूस करते हैं।सुबह नहाने के फायदे:-सुबह ठंडे पानी से नहाने से नर्वस सिस्टम रीसेट हो जाता है- नहाते ही अलर्ट हो सकते हैं।- ब्लड सर्कुलेशन और मूड बेहतर होता है।नहाने का सबसे हेल्दी समय कौन सा है?नहाने का कोई हेल्दी समय नहीं है। हालांकि, बेहतर नींद के लिए सोने से डेढ़ घंटे पहले नहाने से शरीर का तापमान कम होता है और गहरी नींद आती है। इसके अलावा स्किन साफ करने के लिए भी रात के समय को बेस्ट माना जाता है। वहीं सुबह नहाने से रात भर का तेल और पसीना साफ हो जाता है और शरीर में फुर्ती आती है।नहाते हुए
- शरीर में अगर विटामिन की कमी होगी तो अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ये लक्षण शरीर के अंदर या बाहरी तौर पर दिखाई दे सकते हैं। विटामिन B12 एक जरूरी विटामिन है जो शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण, तंत्रिका तंत्र के सही कामकाज और डीएनए बनाने में जरूरी होता है। वहीं डी3 शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है, जिससे हड्डियां, दांत और मांसपेशियां मजबूत रहती हैं। आजकल ज्यादातर लोग विटामिन बी12 और डी3 की कमी से परेशान हैं। यहां 10 ऐसे साइन बता रहे हैं जो विटामिन बी 12 और डी3 की कमी के कारण शरीर में दिखाई दे सकते हैं।विटामिन बी 12 और डी3 की कमी के साइन--1) पिन और सुई चुभना- विटामिन बी 12 की कमी होने पर हाथ और जोड़ों में अचानक सुई जैसी चुभन हो सकती है।2) चिकनी जीभ- जीभ का बिलकुल चिकना, लाल और दर्दनक हो जाना या फिर टेस्ट बड्स गायब होने जैसा लगना बी12 की कमी के कारण होता है।3) कोल्ड स्वेट्स- बिना गर्मी के सिर्फ सर पर बहुत ज्यादा पसीना आना डी3 की कमी के कारण होता है। बिना किसी कारण के अचानक बहुत ज्यादा पसीना आना विटामिन की कमी के कारण हो सकता है।4) ब्रेन फॉग- ये बी 12 की कमी का लक्षण है। यह मानसिक थकान, तनाव या नींद की कमी के कारण दिमाग में 'धुंधलापन' महसूस होने की स्थिति है।5) मुंह के छाले- मुंह के छालों को अक्सर कब्ज से जोड़ा जाता है। लेकिन ये बी12 की कमी का लक्षण हो सकता है। बार-बार मुंह में छाले होना जो जल्दी ठीक ही नहीं होते वह विटामिन बी 12 की कमी के कारण हो सकता है।6) अचानक मूड में बदलाव- विटामिन डी3 और बी12 की वजह से बिना वजह चिंता, चिड़चिड़ापन या लो फील महसूस हो सकता है।7) चक्कर आना या वर्टिगो- विटामिन बी12 का एक लक्षण अचानक खड़े होने पर चक्कर आना या बैलेंस खोना है।8) मसूड़ों से खून आना- बिना किसी दांतों की समस्या के ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आना विटामिन बी12 की कमी का लक्षण है।9) बेवजह बाल झड़ना- विटामिन डी3 की कमी होने पर हेयरफॉल हो सकता है। जब जड़ों को डी3 नहीं मिल रहा होता तब बाल झड़ने की समस्या हो सकती है।10) बार-बार मांसपेशियों में ऐंठन- विटामिन डी3 की कमी से हो मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है।नोट- विटामिन बी12 के लिए दूध, दही, पनीर, अंडे, मछली, मांस और B12 के लिए डॉक्टर की सलाह पर सप्लीमेंट्स लें। इसके अलावा डी3 के लिए सुबह की धूप लगभग 10-20 मिनट लें।
- क्या आपके हाथों या पैरों में बार-बार झुनझुनी होती है? क्या कभी ऐसा महसूस होता है कि उंगलियां सुन्न हो रही हैं, पैरों में जलन हो रही है या जमीन पर चलते समय पैरों में कुछ अजीब लगता है? कई लोग इन लक्षणों को थकान, कमजोरी या सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन अगर झुनझुनी लगातार बनी रहती है या बार-बार वापस आती है, तो यह शरीर में नसों से जुड़ी किसी समस्या का संकेत भी हो सकती है। ऐसी ही एक स्थिति है पेरिफेरल न्यूरोपैथी, जिसमें शरीर की बाहरी नसें प्रभावित होने लगती हैं।पेरिफेरल न्यूरोपैथी का संकेतमारे शरीर में मौजूद पेरिफेरल नर्व्स (Peripheral Nerves) दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड से संदेशों को हाथों, पैरों और अन्य अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं। जब ये नसें किसी कारण से डैमेज या कमजोर हो जाती हैं, तो इसे पेरिफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति को झुनझुनी, सुन्नपन, जलन, चुभन या सेंसिटिविटी में बदलाव महसूस हो सकता है। कई मामलों में यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है और शुरुआती लक्षणों को लोग सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।यदि झुनझुनी केवल कुछ मिनटों के लिए होती है और फिर ठीक हो जाती है, तो यह हमेशा गंभीर नहीं होती लेकिन यदि यह रोजाना होने लगे, रात में बढ़ जाए या हाथों और पैरों में लगातार बनी रहे, तो यह नसों के प्रभावित होने का संकेत हो सकता है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी में शुरुआत अक्सर पैरों की उंगलियों से होती है और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ सकती है। यदि झुनझुनी के साथ पैरों या हाथों में सुन्नपन, जलन, तेज दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, बैलेंस बिगड़ना या चलने में कठिनाई महसूस हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कुछ मामलों में मरीजों को गर्म और ठंडे तापमान का सही अंदाजा लगाने में भी परेशानी हो सकती है। यह संकेत देते हैं कि नसों का काम प्रभावित हो रहा है और हेल्थ चेकअप की जरूरत है।साल 2026 में JAMA Journals में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, पेरीफेरल न्यूरोपैथी दुनिया भर में लगभग 1% वयस्कों को प्रभावित करती है। इसकी वजह से शरीर में सुन्नपन, दर्द, कमजोरी और अंदरूनी अंगों में दिक्कतें आ सकती हैं। पश्चिमी देशों में इसका सबसे मुख्य कारण डायबिटीज है। अगर समय पर ध्यान दिया जाए, तो इस समस्या और इसके दर्द को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।पेरिफेरल न्यूरोपैथी के प्रमुख कारणडायबिटीज पेरिफेरल न्यूरोपैथी का सबसे आम कारण है। लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर नसों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा विटामिन B12 की कमी, किडनी रोग, थायराइड डिजीज, ज्यादा शराब का सेवन, कुछ इंफेक्शन, ऑटोइम्यून बीमारियां और कुछ दवाओं के नुकसान भी इस समस्या का कारण बन सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर रिजल्ट निकालने के बजाय कारण की पहचान करना जरूरी होता है।निष्कर्षहाथों या पैरों में लगातार होने वाली झुनझुनी को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। यह कई बार पेरिफेरल न्यूरोपैथी जैसी स्थिति का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिसमें नसें प्रभावित होने लगती हैं। यदि झुनझुनी बार-बार हो रही है, लंबे समय तक बनी रहती है या इसके साथ सुन्नपन, कमजोरी और शरीर के बैलेंस संबंधी समस्याएं भी हैं, तो जल्द से जल्द एक्सपर्ट डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से नसों को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है।
- ओआरएस हर घर में रखना क्यों जरूरी है इसके प्रति जागरूकता लाने के लिए 29 जुलाई को वर्ल्ड ओआरएस डे मनाया जाता है। इस खास मौके पर हम बात करेंगे ORS कोई बीमारी वाली दवा नहीं है। ये एक लाइफ-सेविंग घोल है जो हर घर के फर्स्ट-एड बॉक्स में होना ही चाहिए। WHO की रिपोर्ट 2023 के अनुसार, ORS के इस्तेमाल से दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की दस्त से होने वाली मौत 93% तक कम हो गई है।ORS है क्या?ORS का फुल फॉर्म है Oral Rehydration Solution यानी मौखिक पुनर्जलीकरण घोल। WHO और UNICEF ने इसे मिलकर बनाया था। किसी भी ORS के फॉर्मूले में 4 चीजों को शामिल किया जाता है- सोडियम, पोटैशियम, सिट्रेट और ग्लूकोज। एकदम सही मात्रा में। डॉ. वी.के. पॉल, नीति आयोग के सदस्य और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं, ORS दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे असरदार आविष्कार है। इसने करोड़ों बच्चों की जान बचाई है।ORS के 5 बड़े फायदेनई दिल्ली के मॉडल टाउन स्थित यथार्थ हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन के हेड डॉ. संजय गुप्ता कहते हैं कि ओआरएस का पैकेट हर घर में होना जरूरी है, ताकि उल्टी, दस्त जैसी बीमारी में तुरंत इसे इस्तेमाल किया जा सके। आइए आगे जानते हैं ORS के 5 बड़े फायदों के बारे में-1. डिहाइड्रेशन का तुरंत इलाजडॉक्टर बताते हैं कि दस्त या उल्टी होने पर शरीर से पानी के साथ-साथ नमक भी निकल जाता है। सिर्फ पानी पीने से वो नमक वापस नहीं आता है। ORS का कमाल ये है कि इसमें मौजूद ग्लूकोज और नमक एक साथ मिलकर आंतों से पानी को 3 गुना तेजी से खून में पहुंचते हैं। इससे उल्टी, दस्त के कारण होने वाले डिहाइड्रेशन से तुरंत राहत मिलती है।2. लू और गर्मी से बचावपसीने से शरीर का सारा नमक निकल जाता है। इसके कारण सिरदर्द, चक्कर, कमजोरी की परेशानी होती है। ऐसे में ORS पीते ही 15 मिनट में एनर्जी वापस आ जाती है। खिलाड़ी, मजदूर, बच्चे, बुजुर्ग समेत हर उम्र के लोगों के लिए ORS पीना फायदेमंद होता है।3. बुखार और वायरल में बॉडी को सपोर्टडॉक्टर कहते हैं कि 100 बुखार में शरीर 24 घंटे में 1 लीटर एक्स्ट्रा पानी मांगता है। अगर पानी नहीं मिला तो चक्कर और कमजोरी महसूस होने लगती है। ऐसे में ORS बुखार में खोए हुए फ्लूइड और इलेक्ट्रोलाइट दोनों की भरपाई कर देता है। द4. बच्चों और बुजुर्गों के लिए रामबाणछोटे बच्चों को दस्त लग जाए तो 2 घंटे में हालत खराब हो जाती है। ठीक इसी तरह बुजुर्गों में डिहाइड्रेशन से BP गिर जाता है। ऐसे में बच्चों और बुजुर्गों को ओआरएस देने से डिहाइड्रेशन की समस्या कम होती है।5. फूड पॉइजनिंग और पेट खराब में फायदेमंदमानसून के मौसम में बाहर खाना या बासी खाने के बाद अक्सर लोगों को पेट में खराबी और फूड पॉइजनिंग की समस्या होती है। ऐसे में ओआरएस पीना पेट के लिहाज से फायदेमंद होता है। ओआरएस का सोडियम और नमक शरीर को हाइड्रेट करके फूड पॉइजनिंग की समस्या से बचाता है।ORS बनाने का सही तरीका क्या है?-1 पैकेट ORS को 1 लीटर साफ पानी में घोलें।-पानी में ORS को डालने के बाद चम्मच से 2 मिनट हिलाएं।-घोल बनने के 24 घंटे के अंदर इस्तेमाल कर लें।-अगर 24 घंटे के बाद आपके पास ORS बचा हुआ तो उसे फेंक दें।ORS को कितनी मात्रा में पीना चाहिए?ORS की मात्रा उम्र और जरूरत के हिसाब से तय होती है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैः-बच्चे: हर दस्त के बाद आधा से 1 कपवयस्क: हर उल्टी/दस्त के बाद 1-2 गिलास। दिन में 3-4 लीटर तकडॉक्टर कहते हैं कि अगर 24 घंटे में ORS पीने के बाद भी उल्टी रुक नहीं रही, खून आ रहा है या बहुत कमजोरी है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। ORS इलाज की जगह नहीं लेता, पर उसे सपोर्ट करता है।
- प्रोटीन शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन इसकी जरूरत से ज्यादा मात्रा लेना शरीर पर बुरा असर डाल सकता है। ज्यादा मात्रा में प्रोटीन का सेवन शरीर में कई समस्याओं को बढ़ा सकता है, जिसमें थकान, कब्ज, सुस्ती आदि परेशानियां शामिल हैं। आइए इस लेख में जानते हैं कि ज्यादा प्रोटीन खाने पर शरीर क्या संकेत देता हैज्यादा प्रोटीन लेने के 5 संकेतन्यूट्रिशनिस्ट रक्षिता मेहरा का कहना है कि ज्यादा मात्रा में प्रोटीन लेने पर स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं हो सकती हैं, क्योंकि किसी भी चीज को बहुत कम या ज्यादा मात्रा में लेना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।1. बार-बार पेशाब आनाअगर आपको नॉर्मल से ज्यादा बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती है तो यह ज्यादा प्रोटीन लेने का संकेत हो सकता है। जब शरीर प्रोटीन को पचाता है तो नाइट्रोजन वाले टॉक्सिक पदार्थ बनते हैं, जिन्हें किडनी पेशाब के जरिए बाहर निकालती है। ज्यादा मात्रा में प्रोटीन लेने पर किडनी को ज्यादा काम करना पड़ सकता है, जिससे पेशाब की मात्रा बढ़ सकती है। अगर इसके साथ आपको ज्यादा प्यास लगने की समस्या होती है तो यह शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है। इसलिए, हाई प्रोटीन डाइट लेने वालों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बहुत जरूरी है।2. हर समय सुस्ती महसूस होनाप्रोटीन हमारे शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन अगर आप जरूरत से ज्यादा प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट बहुत कम लेते हैं तो शरीर में एनर्जी की कमी हो सकती है। कार्बोहाइड्रेटेड फूड्स आपके शरीर को एनर्जी देने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में प्रोटीन ज्यादा लेने पर शरीर में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो जाती है, जिससे लोगों में थकान, सुस्ती और काम में मन न लगने जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। अगर आप हाई प्रोटीन डाइट शुरू करने के बाद लगातार एनर्जी की कमी महसूस कर रहे हैं तो अपनी डाइट का संतुलन जरूर चेक करें।3. कब्ज की समस्या होनाकई हाई-प्रोटीन डाइट में फाइबर की मात्रा कम हो जाती है, खासकर जब लोग दालों, साबुत अनाज, फल और सब्जियों की जगह सिर्फ एनिमल-बेस्ड प्रोटीन पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। फाइबर की कमी से पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है और कब्ज, ब्लोटिंग और मल त्याग करने में मुश्किल जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर आपकी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ गई है तो इसके साथ पर्याप्त मात्रा में फाइबर का सेवन और भरपूर मात्रा में पानी पीना जरूरी है।4. वजन बढ़नाअक्सर लोगों को लगता है कि ज्यादा मात्रा में प्रोटीन खाने से सिर्फ वजन कम होगा, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है। अगर आप शरीर की जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं, फिर चाहे वो प्रोटीन से ही क्यों न आए तो ज्यादा एनर्जी शरीर में फैट के रूप में जमा हो सकती है। इसके अलावा, कई प्रोटीन बार, शेक और सप्लीमेंट्स में ज्यादा चीनी और कैलोरी भी होती है, जो वजन बढ़ाने का कारण बन सकती है। इसलिए, सिर्फ हाई-प्रोटीन फूड के लेबल वाले प्रोडक्ट को अपनी डाइट में शामिल करने से बचें, बल्कि उसमें कैलोरी भी चेक करें।5. हर समय थकान महसूस होनाअगर पर्याप्त नींद लेने के बाद भी आपको लगातार थकान की समस्या महसूस होती है तो इसका एक कारण असंतुलित डाइट भी हो सकती है। ज्यादा प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट लेने से शरीर की एनर्जी पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक डिहाइड्रेशन के कारण भी थकान की समस्या बनी रह सकती है। हालांकि, लगातार थकान के पीछे एनीमिया, थायराइड की समस्या, विटामिन की कमी या अन्य स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए, यह लक्षण लंबे समय तक बना रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।कितनी प्रोटीन की जरूरत होती है?प्रोटीन की जरूरत हर व्यक्ति के शरीर के लिए अलग-अलग होती है। यह उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधियों और स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। इसलिए, जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज करते हैं या एथलीट हैं, उन्हें नॉर्मल लोगों की तुलना में ज्यादा प्रोटीन की जरूरत हो सकती है। वहीं, किडनी से जुड़ी कुछ बीमारियों से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार प्रोटीन की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए और संतुलित मात्रा में ही इसे लेना चाहिए।निष्कर्षप्रोटीन शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन इसका ज्यादा मात्रा में सेवन शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। बार-बार पेशाब आना, लगातार सुस्ती होना, कब्ज होना, वजन बढ़ना और हर समय थकान महसूस होना, शरीर में नजर आने वाले ऐसे संकेत हो सकते हैं कि आपकी डाइट में प्रोटीन जरूरत से ज्यादा है या उसका संतुलन सही नहीं है। हेल्दी रहने का सबसे अच्छा तरीका किसी एक पोषक तत्व पर ज्यादा निर्भर होना नहीं है, बल्कि इसके स्थान पर संतुलित आहार लेना है, जिसमें प्रोटीन के साथ कार्बोहाइड्रेट, हेल्दी फैट, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स भी पर्याप्त मात्रा में शामिल हों।
- लहसुन भी ऐसी ही एक सब्जी है, जो हमारे देश में आमतौर पर मिल जाती है और हम अक्सर रोजाना के खानपान में इसका सेवन करते हैं। लेकिन जब बात इसके गुणों की आती है, तो यह किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं होता क्योंकि स्वास्थ्य के लिए अनेक गुण पाए जाते हैं। इस लेख में आज हम लहसुन के बारे में जानेंगे कि लहसुन स्वास्थ्य के लिए कितना फायदेमंद है और कितनी मात्रा में इसका सेवन किया जाना चाहिए। भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में भी लहसुन का उल्लेख मिलता है जिसमें बताया गया है कि लहसुन सिरदर्द, निमोनिया, गले की समस्याओं और पाचन संबंधी विकारों जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में मदद करता है।लहसुन में पाए जाने वाले खास पोषक तत्वभले ही लहसुन दिखने में एक बेहद छोटी सी सब्जी हो और खाने के फ्लेवर देने के लिए एक मसाले की तरह इसका सेवन किया जाता है, लेकिन इसमें कई अलग-अलग तरह के खास तत्व पाए जाते हैं। जिनके बारे में आपको इस लेख में हम बताने वाले हैं।1 एलिन (Alliin) -यह सिर्फ कच्चे लहसुन में पाया जाता है। जब लहसुन को काटते या कुचलते हैं तो यह एलिसिन में बदल जाता है।2 एलिसिन (Allicin)- लहसुन में तेज गंध इसी की होती है और इसमें एंटीमाइक्रोबियल और एंटीऑक्सीडेंट प्रोपर्टीज पाई जाती हैं।3 एजोइनी (Ajoene) -यह एलिसिन से बनता है और ब्लड क्लॉट बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करने और इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करता है।4 डायलिल सल्फाइड (Diallyl Sulfide)- यह शरीर में एंटीऑक्सीडेंट एक्टिविटी को बढ़ाने और कुछ प्रोटेक्टिव एंजाइम्स को एक्टिवेट करने में मदद कर सकता है।5 डायलिल डिसल्फाइड (Diallyl Disulfide)- यह एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-ऑक्सीडेंट इफेक्ट्स के रूप की तरह काम करता है, जो सूजन ल लालिमा कम करता है।6 डायलिल ट्राइसल्फाइड -लहसुन का एक शक्तिशाली सल्फर कंपाउंड है, जो हार्ट के लिए अच्छा माना जाता है।7 एस-एलिल सिस्टीन (S-allyl Cysteine) -यह एक तरह का एज रिलेटेड एक्सट्रेक्ट है, जो कि एक स्टेबल एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड होता है।8 एस-एलिल मेरकैप्टोसिस्टीन (S-allyl Mercaptocysteine)- यह खासतौर पर पुराने लहसुन में पाया जाता है, जो एक खास तरह का एंटीऑक्सीडेंट है और लिवर को हेल्दी रखने में मदद करता है।9 मिथाइल एलिल सल्फाइड (Methyl Allyl Sulfide) -यह भी लहसुन पाने जाने वाला एक खास तरह का तत्व होता है, जो लहसुन को उसकी गंध प्रदान करता है।डायबिटीज कंट्रोल करने में मदद -स्टडी में यह पाया गया है कि एक निश्चित मात्रा में लहसुन का सेवन करने से Fasting Blood Glucose में कुछ हद तक कमी देखी गई और HbA1c लेवल में भी 0.53% प्रतिशत कमी देखी गई। हालांकि, कमी का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इससे यह साबित होता है कि डायबिटीज के मरीजों के लिए लहसुन पूरी तरह से सेफ है और कहीं न कहीं ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में ही मदद करता है।कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद -PubMed द्वारा पब्लिश की गई एक रिपोर्ट में यह साबित हुआ कि लहसुन का सही और निश्चित सेवन करना शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करने में मदद करता है। रिसर्च में पाया गया कि लहसुन बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और कुछ लोगों में गुल कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। यहां तक कि कुछ हद तक लहसुन का सेवन करना ट्राइग्लिसराइड्स लेवल को कम करने में भी मदद कर सकता है।हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने में मदद -Online Library की रिपोर्ट के अनुसार मेटा एनालिसिस के आधार पर एक रिसर्च की गई, यानी पहले की गई रिसर्चों के आधार पर एक फिर से रिसर्च कई गई। इसमें पाया गया कि हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए लहसुन अच्छा विकल्प है, जो कुछ हद तक ब्लड प्रेशर लेवल को कम करने में मदद कर सकता है। ऑनलाइन लाइब्रेरी के शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि बीपी के मरीजों के लिए लहसुन का सेवन करना अच्छा विकल्प हो सकता है।इन्फेक्शन से बचाव करने में मदद -दुनिया की सबसे भरोसेमंद मेडिकल रिसर्च संस्थाओं में से एक Cochrane द्वारा कई गई एक स्टडी में यह पाया गया है कि लहसुन का सेवन करना सर्दी-खांसी और जुकाम जैसी समस्याओं का इलाज करने में मदद करता है। इस रिसर्च में 146 स्वस्थ लोगों को 12 सप्ताह तक रोजाना या तो एलिसिन (Allicin) युक्त लहसुन का सप्लीमेंट दिया गया या फिर प्लेसीबो (डमी कैप्सूल) दिया गया। इसके बाद रिसर्च में यह पाया गया है कि जिन समूह को लहसुन दिया गया था उसमें सर्दी-जुकाम के 24 मामले आए जबकि जिन्हें डमी कैप्सूल दिए गए थे उनमें सर्दी-जुकाम के मामले 65 दर्ज किए गए। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह एक अध्ययन सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं में लहसुन के इस्तेमाल से मिलने वाले फायदों की ओर संकेत करता है।लेकिन क्या ज्यादा लहसुन का सेवन करना सेफ है?इसमें कोई शक है कि लहसुन हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है और इससे हेल्थ को अनेक फायदे मिलते हैं। इसका उपयोग सदियों से खाने के स्वाद और प्राकृतिक इलाज के लिए किया जाता रहा है। यह हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाता है और दिल को स्वस्थ रखता है। लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा सेवन करना स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है जो इस प्रकार हैं --पाचन की समस्या - कुछ लोग लहसुन को कच्चा खा लेते हैं और जरूर से ज्यादा कच्चा लहसुन खाना सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।-खून बहने का खतरा - लहसुन प्राकृतिक रूप से खून को पतला करता है। ज्यादा लहसुन खाने से खून पतला करने वाली दवाइयों का असर प्रभावित हो सकता है और सर्जरी के दौरान या बाद में खून बहने का रिस्क बढ़ जाता है।-पेट के मरीजों को परेशानी - लहसुन में कार्बोहाइड्रेट का एक खास प्रकार पाया जाता है, जिससे संवेदनशील पेट वाले लोगों या IBS के मरीजों को पेट फूलने और दर्द की समस्या हो सकती है।सांस और शरीर की बदबू - सल्फर के तत्व खून में मिलकर सांसों और पसीने के जरिए बाहर निकलते हैं, जिससे मुंह और शरीर से काफी देर तक बदबू आ सकती है।कितनी मात्रा में करें लहसुन का सेवनस्वास्थ्य के लिए कोई कितनी भी हेल्दी चीज क्यों न हो वह सिर्फ तब तक ही फायदेमंद होती है, जब तक उसका सेवन सही मात्रा में किया जाए। किसी भी हेल्दी समझी जाने वाली चीज का सेवन अगर जरूरत से ज्यादा मात्रा किया जा रहा है और लंबे समय से ऐसा हो रहा है, तो काफी संभावना हो सकती है कि उससे हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकती है। लहसुन के मामले में भी ठीक ऐसे ही होता है, यह सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है लेकिन अगर आप इसका जरूरत से ज्यादा मात्रा में सेवन करते हैं तो इससे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है जिसके बारे में हमने आपको ऊपर भी बताया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर लहसुन का सही सेवन कितना होना चाहिए, जो इस प्रकार है-ताजा लहसुन - 1 से 2 कली (लगभग 3 से 6 ग्राम)-लहसुन का पाउडर - 0.4 से 1.2 ग्रामलहसुन खून को पतला कैसे करता है?लहसुन का जो सबसे बड़ा गुण होता है और वही कई बार हेल्थ को नुकसान भी पहुंचा सकता है और वह है लहसुन का ब्लड थाइनिंग वाला गुण। लहसुन में खास तरह के गुण होते है, जो खून को पतला करने का काम करते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा खून पतला हो रहा है तो उससे स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं जो इस प्रकार हैं। हालांकि, Pubmed द्वारा पब्लिश की गई एक रिपोर्ट में यह तो पाया गया कि लहसुन में एंटीप्लेटलेट तत्व होते हैं, लेकिन इसका प्रभाव बहुत हम होता है और यह किसी ब्लड थिनर दवा के जितना खून पतला नहीं कर पाता है। हालांकि, लहसुन का प्रभाव हर व्यक्ति के शरीर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है और यह भी जानना भी महत्वपूर्ण है कि अगर कोई व्यक्ति पहले से ही किसी कारण से ब्लड थिनर दवाएं ले रहा है तो ऐसे में लहसुन का सेवन करना खून पतला करने में और ज्यादा समस्याएं पैदा कर सकता है।
- क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी से बातचीत कर रहे हों और अचानक एक बेहद आसान शब्द याद ही न आए? वह शब्द आपकी जुबान पर तो होता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी कुछ सेकंड या मिनट तक याद नहीं आता। बाद में अचानक वही शब्द अपने आप याद आ जाता है। जब कोई शब्द दिमाग में मौजूद होता है लेकिन उसे बोलने के लिए तुरंत याद नहीं किया जा सकता, तो इसे "टिप ऑफ द टंग" कहा जाता है। यह एक बेहद सामान्य स्थिति है और लगभग हर व्यक्ति ने अपने जीवन में इसका अनुभव किया होता है। इस दौरान व्यक्ति को महसूस होता है कि शब्द उसे पता है, लेकिन वह उसे व्यक्त नहीं कर पा रहा। कुछ सेकंड या मिनट बाद वही शब्द अचानक याद भी आ जाता है।''कई बार दिमाग में जानकारी मौजूद होने के बावजूद उसे बाहर लाने की प्रोसेस थोड़ी धीमी हो जाती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। ज्यादा तनाव, चिंता, मानसिक दबाव, पर्याप्त नींद न लेना या लगातार कई काम एक साथ करना दिमाग की शब्दों को याद करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। जब मस्तिष्क पर ज्यादा दबाव होता है, तो जानकारी को खोजने और सही समय पर उपयोग करने में थोड़ी देर लग सकती है। यही वजह है कि बिजी या तनावपूर्ण दिनों में लोग ज्यादा बार शब्द भूलते हुए नजर आते हैं।'' उम्र बढ़ने के साथ दिमाग के फंक्शन में कुछ नेचुरल बदलाव आते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि याददाश्त कमजोर हो रही है, बल्कि दिमाग को कुछ शब्दों तक पहुंचने में पहले की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है।इसी कारण उम्रदराज लोगों में "टिप ऑफ द टंग" की घटनाएं ज्यादा देखने को मिलती हैं। अगर यह कभी-कभार हो रहा है और व्यक्ति सामान्य रूप से बातचीत कर पा रहा है, तो आमतौर पर चिंता की जरूरत नहीं होती।National Institute on Aging में प्रकाशित आर्टिकल से यह साफ है कि भूलने की बीमारी का कारण हमेशा बुढ़ापा या डिमेंशिया ही नहीं होता। तनाव, खराब लाइफस्टाइल, नींद की कमी, पोषण की कमी और डिप्रेशन जैसी मानसिक या मेडिकल परेशानियां भी हमारी याददाश्त पर गहरा असर डालती हैं। अच्छी बात यह है कि सही इलाज, बैलेंस खान-पान और तनावमुक्त जीवन जीने से इन समस्याओं को ठीक किया जा सकता है। इसलिए, यदि आप या आपका कोई करीबी लगातार याददाश्त में कमजोरी महसूस कर रहा है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है ताकि समय पर सही कदम उठाया जा सके।क्या यह गंभीर समस्या का संकेत है?कभी-कभी शब्द भूलना सामान्य है, लेकिन यदि यह समस्या बार-बार होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को लगातार सही शब्द खोजने में कठिनाई हो रही है, बातचीत प्रभावित होने लगी है या दूसरों की बात समझने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। इसके अलावा पढ़ने, लिखने या भाषा को समझने में अचानक कठिनाई महसूस होना भी चेतावनी का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में समस्या सिर्फ सामान्य भूलने की नहीं, बल्कि किसी न्यूरोलॉजिकल स्थिति से जुड़ी हो सकती है। कुछ मामलों में शब्द याद न आना अफेजिया (Aphasia) नामक स्थिति का संकेत हो सकता है। यह तब होता है जब दिमाग के वे हिस्से प्रभावित हो जाते हैं जो भाषा को कंट्रोल करते हैं। स्ट्रोक इसके सबसे सामान्य कारणों में से एक है।अफेजिया का एक प्रकार एनॉमिक अफेजिया (Anomic Aphasia) भी होता है।इसमें व्यक्ति को पूरी तरह पता होता है कि वह क्या कहना चाहता है, लेकिन सही शब्द याद नहीं आता। यह समस्या सामान्य भूलने की तुलना में ज्यादा गंभीर मानी जाती है और हेल्थ चेकअप की जरूरत होती है।अफेजिया का पता कैसे लगाया जाता है?National Institute on Deafness and Other Communication Disorders की रिपोर्ट के अनुसार, अफेजिया की पहचान केवल लक्षण देखकर नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए डॉक्टर और स्पीच-लैंग्वेज एक्सपर्ट द्वारा जांच की जाती है। सबसे पहले डॉक्टर मरीज की बोलने, समझने, पढ़ने और लिखने की क्षमता का आंकलन करते हैं। जरूरत पड़ने पर ब्रेन स्कैन जैसे CT या MRI के जरिए यह देखा जाता है कि मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। यदि डॉक्टर को अफेजिया का संदेह होता है, तो मरीज को स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट के पास भेजा जाता है, जो भाषा और संवाद से जुड़ी क्षमताओं की विस्तार से जांच करते हैं।अगर किसी व्यक्ति को अचानक बोलने में परेशानी, सही शब्द याद न आना, दूसरों की बात समझने में कठिनाई या स्ट्रोक जैसे अन्य लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और मरीज की संवाद करने की क्षमता में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।यदि शब्द भूलने के साथ अचानक शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, चेहरे का टेढ़ा होना, बैलेंस बिगड़ना या समझने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए। ये स्ट्रोक जैसी गंभीर डिजीज के संकेत हो सकते हैं और समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है।निष्कर्षबातचीत के दौरान कभी-कभार कोई आसान शब्द भूल जाना आमतौर पर "टिप ऑफ द टंग" फिनोमेनन का हिस्सा होता है और यह तनाव, थकान, नींद की कमी या बढ़ती उम्र के कारण हो सकता है लेकिन यदि यह समस्या बार-बार होने लगे, भाषा समझने या बोलने में कठिनाई आने लगे या इसके साथ अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय रहते जांच कराने से किसी गंभीर समस्या का पता लगाया जा सकता है और उचित उपचार शुरू किया जा सकता है।






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