ग्रामीण ठप्पे के कारण विकास के मोर्चे पर पिछड़ सकते हैं भारत के बड़े गांव: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली. दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश भारत 2050 के दशक तक अपने गांवों में ही रहेगा, भले ही अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या उस मानदंड से अधिक हो गयी है, जिससे उन्हें कस्बे की श्रेणी में रखा जा सके और इससे गांवों के विकास के अवसरों में पीछे छूटने का खतरा है। विशेषज्ञों ने बृहस्पतिवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के कारण ताजा जनगणना की कवायद में देरी हो रही है, लेकिन 2011 के जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में 23,335 गांव 5,000 से अधिक जनसंख्या वाले हैं, लेकिन वे गांवों की श्रेणी में ही रहेंगे, क्योंकि वे अन्य मानदंडों को पूरा नहीं करते और इस तरह वे शहरी केंद्रों के लिए बनाये गये कार्यक्रमों का लाभ पाने से छूट सकते हैं। भारत में कोई बस्ती तब शहरी श्रेणी में आती है जब उसकी जनसंख्या 5,000 से अधिक हो, जिसका जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर हो और कम से कम 75 फीसद आबादी गैर-कृषि गतिविधियों में लगी हो। इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (आईआईएचएस) के निदेशक ए. रवि ने कहा, ‘‘भारत जनसांख्यिकीय दृष्टि से अब भी गांवों में रहता है, हालांकि हमारे पास निश्चित आंकड़े नहीं हैं, क्योंकि 2021 की जनगणना नहीं हुई है। अत्यंत संभावना है कि भारत 2050 के दशक तक जनसांख्यिकीय दृष्टि से अपने गांवों में ही रहेगा, लेकिन यह प्रमुख रूप से 1990 के दशक के अंत से शहरी अर्थव्यवस्था आधारित रहा है।'' उन्होंने कहा, ‘‘भारत जनसंख्या घनत्व, जनसंख्या के आकार और गैर-खेतिहर पुरुष श्रमिकों के प्रतिशत के आधार पर शहरी वर्गीकरण तीन स्तर पर करता है।'' संयुक्त राष्ट्र के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की आबादी 142.86 करोड़ हो गयी है और वह चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन गया है। शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में लोग गांवों में रहते हैं, वहीं भारतीय शहर देश की जीडीपी में लगभग दो-तिहाई का योगदान देते हैं और 2031 तक यह आंकड़ा बढ़कर 75 प्रतिशत हो सकता है। आंकड़ों के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों में करीब 70 प्रतिशत नयी नौकरियों के अवसर सृजित होने की संभावना है।

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