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सपनों की उड़ान ने झारखंड में अनाथों, गरीब बच्चों के सपनों को साकार करने के लिए पंख दिए

कलामती। .झारखंड के सुदूरवर्ती खूंटी गांव में एक अनाथालय में पली बढ़ी एलिशा हासा (19) की अब तक की जीवन यात्रा संघर्ष और कठिनाइयों से भरी थी, जिसने वंचित तबके के छात्रों के लिए बने स्कूल में 11वीं कक्षा में दाखिला से पहले इंजीनियरिंग शब्द सुना तक नहीं था। अनाथ आदिवासी लड़की, जो कभी हिंदी बोलना तक नहीं जानती थी, उसने सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक जेईई मेन्स की परीक्षा पास की है। उसके सपने बड़े हैं और वह अपने जैसे ही गरीबी के शिकार बच्चों के जीवन में बदलाव लाना चाहती है। एलिशा अब जेईई-एडवांस की तैयारी कर रही है। उसने कहा, ‘‘जब मैं नौ साल की थी तब मैंने अपने माता-पिता को खो दिया। मुझे एक अनाथालय में भेज दिया गया और वहां से मुझे 2015 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी), कलामती खूंटी में पढ़ने के लिए भेजा गया। मुझे ‘सपनों की उड़ान' कार्यक्रम का पता चला जिसने मेरे सपनों को पंख दिए। मैंने दिन-रात पढ़ाई की लेकिन पिछले साल सफलता नहीं पा सकी। इस साल मुझे अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग में पूरे भारत में 1,788 स्थान प्राप्त हुआ है।'' एलिशा अकेली नहीं है। ऐसे नौ अन्य छात्र भी हैं जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, 12 साल की उम्र तक हिंदी नहीं जानने के बावजूद केजीबीवी में दाखिला लिया और जेईई मेन्स परीक्षा पास की। इन सभी ने जेईई-एडवांस के लिए तैयारी शुरू कर दी है, जिनका सपना गरीबी से ऊपर उठना और माओवाद प्रभावित खूंटी जिले में सकारात्मक बदलाव लाना है। सभी ने एक स्वर में अपनी सफलता का श्रेय ‘सपनों की उड़ान' को दिया, जो समाज के वंचित समूहों के उम्मीदवारों को इंजीनियरिंग और मेडिकल के लिए विशेष कोचिंग प्रदान करने के इरादे से शुरू की गई खूंटी जिला प्रशासन की एक शैक्षिक पहल है। यह परियोजना खूंटी के उपायुक्त शशि रंजन के दिमाग की उपज है, जो खुद आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) के छात्र रहे हैं। आजादी की लड़ाई से बहुत पहले अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की वंशज सरस्वती मुंडा का अत्यधिक गरीबी के कारण केजीबीवी में दाखिला कराया गया था, उनके माता-पिता सिर्फ खेती से जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं थे। अपनी आंखों में चमक के साथ उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने परदादा बिरसा मुंडा के सपने को पूरा करना चाहती हूं, जिन्होंने झारखंड के आदिवासी लोगों की समृद्धि का सपना देखा। मैं चाहती हूं कि मैं अपने गांव में लोगों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश जलाऊं जहां लोग मुश्किल से इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई के बारे में जानते हैं।'' अत्यधिक आर्थिक संकट का सामना कर रहे ये सभी छात्र ‘धन के इंतजाम' को सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखते हैं। उन्होंने पूजा कुमारी का उदाहरण सुनाया, जो पिछले साल नीट (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) उत्तीर्ण करने के बावजूद आर्थिक तंगी के कारण उसमें दाखिला नहीं ले सकीं। केजीबीवी कलामती के वार्डन सह शिक्षक ज्योति कुमार ने अपनी चिंताओं को दोहराते हुए कहा, ‘‘कोई भी विश्वास नहीं कर सकता था कि ऐसी पृष्ठभूमि की लड़कियां इस तरह की उपलब्धि हासिल कर सकती हैं। वे सभी वंचित समुदायों से हैं, कई अनाथ हैं, कई मानव तस्करी के बाद बचाई गई हैं, कई एकल माता-पिता से संबंधित हैं और कई विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न की शिकार हैं।'' उपायुक्त द्वारा निविदा और चयन की प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त इंजीनियरिंग कोच एस.डी. मिश्रा ने कहा कि इन लड़कियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘भाषा' की थी क्योंकि उन्हें शुरू में सही हिंदी भी नहीं आती थी। उन्होंने कहा, ‘‘इन सभी ने न केवल हिंदी बल्कि इंजीनियरिंग और मेडिकल के कठिन अंग्रेजी तकनीकी शब्दों को सीखने के लिए अपना 100 प्रतिशत दिया। अगर वे सरकारी कॉलेजों में दाखिला ले पाती हैं तो उन्हें अपने सपनों को साकार करने से कोई नहीं रोक सकता, वरना वे शिक्षा पर लाखों रुपये कैसे खर्च कर सकती हैं जब वे सालाना 5,000 रुपये से 10,000 रुपये तक की मामूली राशि तक नहीं दे सकतीं।'' युवा मन को जगाने वाले खूंटी के उपायुक्त रंजन ने कहा, ‘‘हम हर संभव प्रयास करेंगे ताकि प्रतिभा बर्बाद नहीं हो। हम ऐसे बच्चों को उन संस्थाओं से जोड़ेंगे जो उनकी मदद करना चाहती हैं।'' जेईई-मेन्स में केजीबीवी की लड़कियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ऐसे मेधावी छात्रों को हर संभव समर्थन देने का वादा किया है। सोरेन ने कहा कि गरीब छात्रों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जो महंगी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते और राज्य उनकी हर संभव मदद सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

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