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  दो तिहाई से अधिक बुजुर्ग परिजनों के सदस्यों के हाथों उत्पीड़न का करते सामना : सर्वेक्षण

नयी दिल्ली ।  दो तिहाई से अधिक बुजुर्गों का कहना है कि वे घर में बच्चों समेत परिवार के सदस्यों के हाथों उत्पीड़न, अपमान और दुर्व्यवहार का सामना करते हैं। ‘एजवेल फाउंडेशन' नामक एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने अपने स्वयंसेवकों के राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से जून के पहले हफ्ते में 5000 बुर्जुगों पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। यह सर्वेक्षण रिपोर्ट 15 जून के विश्व बुजुर्ग उत्पीड़न जागरूकता दिवस से दो दिन पहले मंगलवार को जारी की गयी। एजवेल फाउंडेशन ने कहा कि उसने भारत में बुजुर्गों के उत्पीड़न की स्थिति तथा उनके अधिकारों पर जागरूकता के संबंध में 5000 वृद्धों से रायशुमारी की। रिपोर्ट के अनुसार जिन बुजुर्गों से बातचीत की गयी, उनमें दो तिहाई से अधिक ने कहा कि घर में परिवार के लोग, बच्चे , रिश्तेदार या अन्य उन्हें झिड़कते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं या उनका अपमान करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर बुजुर्गों (करीब 77 प्रतिशत) का कहना है कि उन्हें अपने मानवाधिकारों की जानकारी नहीं है तथा उनसे जब बुरा बर्ताव किया जाने लगता है तो वे उसका विरोध नहीं करते हैं और ऐसे में यह एक पैटर्न (चलन) बन जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक वृद्धावस्था में अपनी जरूरतों के लिए अन्य पर आश्रित बुजुर्गों पर बुरे व्यवहार का खतरा अधिक रहता है। आमतौर पर देखा गया कि बुजुर्गों के साथ बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार इसलिए भी होता है क्योंकि वृद्धों को परिवार के दूर चले जाने या उनका सहयोग नहीं मिलने का डर सताता है। एनजीओ के मुताबिक बुजुर्ग डरते हैं कि यदि उन्होंने दुर्व्यवहार या उत्पीड़न की चर्चा की एवं उसकी रिपोर्ट की तो उनके जीवन में तनाव आ जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘ बुजुर्ग लोगों को वृद्धावस्था में अकेला पड़ जाने, अलग-थलग पड़ जाने, या हाशिये पर डाल दिये जाने का डर रहता है इसलिए वे समझौते को गले लगा लेते हैं। अधिकतर परिवार की बेहतरी के लिए दुर्व्यवहार को नजर अंदाज करते हैं।'' रिपोर्ट में कहा गया है कि खासकर बुजुर्ग महिलाओं पर उत्पीड़न/दुर्व्यवहार का खतरा अधिक होता है क्योंकि वे अपनी जरूरतों, खासकर वित्तीय एवं मनोवैज्ञानिक जरूरतों के लिए दूसरों पर अपेक्षाकृत अधिक आश्रित होती हैं। एजवेल फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष हिमांशु रथ ने कहा कि बुजुर्गों की तेजी से बढ़ती संख्या और एकल परिवारों की बढ़ती लोकप्रियता के चलते पीढ़ियों के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है तथा बुजुर्गों का उत्पीड़न/दुर्व्यवहार ज्यादातर बुजुर्गों के संदर्भ में आम बात हो गयी है। रथ ने कहा, ‘‘ हम हर साल यह दिवस मनाते हैं लेकिन लोगों को बुजुर्गों के मानवाधिकार के बारे में संवेदनशील बनाने के लिए जमीनी स्तर पर कुछ नहीं करते। अब समय आ गया है , जब सभी संबंधित पक्षों को हाथ मिलाना चाहिए और सभी के लिए बेहतर कल के वास्ते इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए।''
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