स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी पर ध्यान देने के लिए समय पर जांच जरूरी: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली. कुछ विशेषज्ञों ने स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी (एसएमए) और लोगों पर इसके प्रभाव से निपटने के लिए कुछ एहतियाती उपाय अपनाने की जरूरत पर जोर दिया है। एसएमए वह स्थिति है जब मोटर न्यूरॉन को क्षति होने से मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और कई मामलों में तो यह जटिलता घातक हो जाती है। मोटर न्यूरॉन मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में पाई जाने वाली वो कोशिकाएं हैं जो मस्तिष्क से इन कार्यों को करने वाली मांसपेशियों को आदेश भेजकर हमें चलने, बोलने, निगलने और सांस लेने आदि क्रियाकलापों की अनुमति देती हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में शिशुरोग विभाग में न्यूरोलॉजी खंड की प्रमुख डॉ शेफाली गुलाटी ने कहा कि इस स्थिति से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए एहतियाती उपायों पर ध्यान देना अहम होगा जिससे समयबद्ध तरीके से प्रभावित बच्चों का पता चल सके। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के लोगों, संभावित रोगियों और आम जनता के बीच भी इसे लेकर जागरुकता लाना जरूरी है। डॉ गुलाटी ने कहा कि सरकार की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एनपीआरडी) सही दिशा में एक कदम है जिसमें बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद ही उसकी स्क्रीनिंग की जाती है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की जल्द पहचान होने पर तत्काल उपचार शुरू किया जा सकता है।
इसके अलावा केंद्र सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने ‘उम्मीद' पहल शुरू की है जो ‘उपचार से बेहतर है रोकथाम' वाले सिद्धांत पर आधारित है। इसका उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में परामर्श, जांच और रोग की पहचान के लिए निदान केंद्र बनाना है।
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (पीजीआई), लखनऊ के डॉ कौशिक मंडल ने नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग पर जोर दिया है जो भारत के कुछ हिस्सों में शुरू हो गयी है।

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