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भारत की गाथा का गवाह रहा है पुराना संसद भवन

नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नये संसद भवन का रविवार को उद्घाटन किये जाने के साथ ही 1927 से देश की गाथा का गवाह रहा पुराना संसद भवन इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा। स्व-शासन की ओर पहले कदम से लेकर स्वतंत्रता की सुबह तक और देश के परमाणु शक्ति के रूप में उभरने और उससे आगे तक, पुराना संसद भवन लगभग एक सदी से देश की गाथा का गवाह बना हुआ है। संसद भवन संविधान के निर्माण, महात्मा गांधी की मृत्यु की घोषणा के बाद के दृश्यों के साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा बांग्लादेश में पाकिस्तानी सेना के बिना शर्त आत्मसमर्पण की घोषणा का भी साक्षी रहा है। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दिल को छू लेने वाला भाषण, लाल बहादुर शास्त्री के शांत लेकिन दृढ़ संकल्प, इंदिरा गांधी की वाक्पटुता, अटल बिहारी वाजपेयी की काव्य प्रतिभा और नरेंद्र मोदी की शक्तिशाली भाषणकला संसद के कक्षों में गूंजी है। पुरानी संसद भवन की आधारशिला वर्ष 1921 में ड्यूक ऑफ कनॉट, प्रिंस आर्थर द्वारा रखी गई थी और इसका उद्घाटन 18 जनवरी, 1927 को किया गया था। संसद का हाल ही में समाप्त हुआ मानसून सत्र शायद पुराने भवन में अंतिम हो। वायसराय लॉर्ड इरविन ने 24 जनवरी, 1927 को तीसरी विधानसभा के पहले सत्र में कहा, ‘‘आज आप दिल्ली में अपने नए और स्थायी भवन में पहली बार मिल रहे हैं। इस कक्ष में, विधानसभा के लिए इसकी गरिमा और महत्व के मद्देनजर एक व्यवस्था की गई है।'' पंडित मदन मोहन मालवीय, मोहम्मद अली जिन्ना, पंडित मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सी.एस. रंगा अय्यर, माधो श्रीहरि अणे, विठ्ठलभाई पटेल सहित अन्य तीसरी विधानसभा के सदस्य थे। भारत सरकार अधिनियम, 1919 के जरिये अंग्रेजों ने सरकार में भारतीयों की अधिक भागीदारी की अनुमति दी थी। दो साल बाद, क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सदन द्वारा विवादास्पद व्यापार विवाद विधेयक पारित किए जाने के बाद सार्वजनिक गैलरी से विधानसभा कक्ष में बम फेंके। आठ अप्रैल, 1929 की विधानसभा की कार्यवाही की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘इस चरण में आगंतुक दीर्घा से दो बम फेंके गए जो सदस्यों की सीट के बीच फट गए, जिससे कुछ सदस्यों को चोटें आईं। कुछ समय के लिए भ्रम की स्थिति रही और अध्यक्ष ने कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिया। बाद में वह अपने आसन पर वापस आ गए।'' विट्ठलभाई पटेल विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष (प्रेसीडेंट) थे, बाद में देश में संसदीय लोकतंत्र विकसित होने के बाद यह पद अध्यक्ष (स्पीकर) के रूप में जाना जाने लगा। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर, संविधान सभा की बैठक रात 11:00 बजे राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई। उत्तर प्रदेश की एक सदस्य सुचेता कृपलानी ने विशेष सत्र की शुरुआत के मौके पर ‘वंदे मातरम' का पहला छंद गाया। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध ‘‘नियति से साक्षात्कार'' (ट्रिस्ट विद डेस्टिनी) भाषण दिया, जिसके बाद संविधान सभा के सदस्यों ने स्वयं को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर ने 2 फरवरी, 1948 को लोकसभा की एक बैठक के दौरान महात्मा गांधी की मृत्यु की घोषणा की। मावलंकर ने कहा, ‘‘आज हम एक दोहरी आपदा की छाया में बैठक कर रहे हैं, हमारे युग की सबसे कद्दावर हस्ती का दुखद निधन हो गया है जिसने हमें गुलामी से आजादी की ओर अग्रसर किया और हमारे देश में राजनीतिक हिंसा की फिर से शुरुआत हो गई है।'' वहीं, नेहरू ने कहा, ‘‘एक गौरव चला गया है और हमारे जीवन को गर्म और उज्ज्वल करने वाला सूर्य अस्त हो गया है और हम ठंड और अंधेरे में कांप रहे हैं।'' इसी सदन से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश से हर हफ्ते एक समय भोजन छोड़ने की अपील की थी क्योंकि भारत भोजन की कमी से जूझ रहा था और 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा था। वर्ष 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद जब लोकसभा की बैठक हुई, तो सदन में मुद्दों को उठाने के निजी सदस्यों के अधिकारों को निलंबित करने के सरकार के कदम के खिलाफ सदन में कई सदस्यों का विरोध देखा गया। उप गृहमंत्री एफ.एच. मोहसिन ने 21 जुलाई, 1975 को लोकसभा की बैठक में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल लगाये जाने की घोषणा की। लोकसभा सदस्य सोमनाथ चटर्जी, इंद्रजीत गुप्ता, जगन्नाथराव जोशी, एच.एन. मुखर्जी, पी.के. देव ने अपने अधिकारों के निलंबन का विरोध किया। वर्ष 1989 में देश की राजनीति के गठबंधन युग में प्रवेश करने के साथ ही संसद 1998 तक लगातार सरकारें बदलने की गवाह बनी, जब भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन बनाया था। एक साल के भीतर वाजपेयी सरकार 17 अप्रैल, 1999 को तब गिर गई जब वह लोकसभा में एक वोट से विश्वास मत हार गए थे। हालांकि, बाद में हुए आम चुनावों के बाद वाजपेयी सरकार फिर से सत्ता में आ गई। वर्ष 1974 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 22 जुलाई को संसद में एक विस्तृत बयान दिया, जिसमें सदन को पोखरण में ‘‘शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण'' और अन्य देशों की प्रतिक्रिया से अवगत कराया गया। लगभग 24 साल बाद 1998 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी ने वैज्ञानिकों द्वारा उस वर्ष 11 मई और 13 मई को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया। उन्होंने दुनिया को आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति की भी घोषणा की, जो परीक्षणों के बारे में अनजान थी। वर्ष 2008 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर मतभेद के बाद वामपंथी दलों द्वारा समर्थन वापस लेने के मद्देनजर विश्वास मत के दौरान अपनी गठबंधन सरकार का सशक्त तरीके से बचाव किया।

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