प्रतिबंधों के बावजूद अधिकतर युवा कश लगाने संबंधी विज्ञापनों के प्रभाव में : अध्ययन
नयी दिल्ली. विज्ञापन संबंधी प्रतिबंध के बावजूद भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से कम से कम 85 प्रतिशत ने कहा कि वे विशेष रूप से सोशल मीडिया और दुकानों तथा अन्य खुदरा विक्रेताओं के इर्द-गिर्द ई-सिगरेट के विज्ञापनों के प्रभाव में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सभी प्रकार के ई-सिगरेट विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करता है। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम 2019 लागू किया है, जो ई-सिगरेट और इसी तरह के उपकरणों के निर्माण, बिक्री और विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाता है। जॉर्ज इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ द्वारा किए गए सर्वेक्षण में 15-30 वर्ष की आयु के चार हजार लोगों ने भाग लिया। शोधकर्ताओं का तर्क है कि ई-सिगरेट के विज्ञापन के संपर्क में आने से खतरे और जोखिम के बारे में लोगों की धारणा बदल सकती है तथा उनकी रुचि और बढ़ सकती है, जिससे उनके उपयोग की प्रवृत्ति में वृद्धि हो सकती है। सर्वेक्षण में जनसांख्यिकीय विशेषताओं, ई-सिगरेट और तंबाकू के उपयोग, दोस्तों और परिवार के सदस्यों की संख्या जो कि धूम्रपान करते हैं, और ई-सिगरेट विज्ञापन के कई स्वरूपों के संपर्क का आकलन किया गया। इनमें टेलीविज़न, प्रिंट, रेडियो और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न तरीके शामिल थे। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया, उदाहरण के लिए, चीन के 50 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया, भारत तथा ब्रिटेन के 39 प्रतिशत लोगों ने क्रमशः (सोशल मीडिया मंच) डॉयिन और इंस्टाग्राम पर ई-सिगरेट विज्ञापन देखने की बात बताई, जबकि 29 प्रतिशत ने इंटरनेट पर अन्य जगह ई-सिगरेट विज्ञापन देखा।'' शोध के निष्कर्ष ‘टोबैको इंड्यूस्ड डिजीज' पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि सभी चार देशों में विज्ञापन प्रतिबंधों के बावजूद, बड़ी संख्या में युवाओं ने ई-सिगरेट विज्ञापन के संपर्क में आने की बात बताई।










Leave A Comment