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 जानिए क्या होता है क्रायोजेनिक टैंक, जिसके बिना लिक्विड ऑक्सीजन को यहां से वहां ले जाना मुमकिन ही नहीं!
नई दिल्ली।   हाल ही में टाटा ग्रुप ने ये घोषणा की थी कि वह ऑक्सीजन की किल्लत को देखते हुए इससे निपटने के लिए 24 क्रायोजेनिक टैंक का आयात  करेगा। इसके तहत जर्मनी की लिंडे समूह की भारतीय इकाई ने टाटा समूह और भारत सरकार के साथ साथ मिलाया है, ताकि देश भर में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन  की उपलब्धता को बढ़ाने के उपाय किए जा सकें। इन 24 में से 4 क्रायोजेनिक टैंक तो टाटा समूह के लिए भारतीय वायुसेना के जरिए सिंगापुर से भारत लाए भी जा चुके हैं और बाकी 20 टैंक भी जल्द ही लाए जाएंगे। यहां सबसे बड़ा सवाल जो लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर ये क्रायोजेनिक टैंक होता क्या है और इसका आयात करने की अचानक जरूरत क्यों पड़ गई?
 क्रायोजेनिक टैंक ऐसा टैंक होता है, जिसमें बहुत अधिक ठंडे लिक्विड रखे जाते हैं, जैसे लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन। लिक्विड ऑक्सीजन बहुत ही अधिक ठंडी होती है। इसका स्तर -185 डिग्री के करीब होता है जो ऑक्सीजन के उबलने का स्तर होता है। क्रायोजेकिन टैंक में उन गैसों को रखा जाता है, जिनका उबलने का स्तर -90 से अधिक होता है, जैसे ऑक्सीजन।
 क्रायोजेनिक शब्द ग्रीक, लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं के संयोजन से बना है।  ग्रीक शब्द क्रिए का लैटिन भाषा में अपभ्रंश क्रायो होता है, जिसका अर्थ है बहुत ज्यादा ठंडा और अंग्रेजी में क्रायोजेनिक का मतलब है बेहद ठंडा रखने वाला। इस शब्द से अब यह आसानी से समझा जा सकता है कि क्रायोजेनिक टैंक का इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं गैसों के लिए ही होता है, जिन्हें बेहद ठंडी परिस्थितियों में रखना पड़ता है।
 दिखने में तो क्रायोजेनिक टैंक भी किसी आम गैस टैंक जैसा ही लगता है, लेकिन इसकी बनावट में बहुत बड़ा अंतर होता है। इसे वैक्यूम बॉटल के सिद्धांत पर बनाया गया होता है। इस टैंक में दो तगड़ी परतें होती हैं, एक अंदर की और एक बाहर की परत। अंदर की परत वाले टैंक में लिक्विड ऑक्सीजन गैस भरी होती है, जबकि बाहर की परत अंदर की परत से थोड़ी दूरी पर होती है। दोनों परतों के बीच में से हवा को निकाल दिया जाता है और वैक्यूम जैसी स्थिति पैदा कर दी जाती है, ताकि बाहर की गर्मी का गैस के तापमान पर कोई असर ना हो।  इस टैंक के जरिए 20 टन ऑक्सीजन का ट्रांसपोर्टेशन हो सकता है।  एक क्रायोजेनिक टैंक तैयार होने में 25 लाख से 40 लाख रुपए तक का खर्च आता है। भारत में विविध कंपनियों के पास ऐसे ट्रांसपोर्ट कैरियर की संख्या 1500 के ही करीब है, लेकिन इनमें से करीब 220 टैंक सेफ्टी सर्टिफिकेट रिन्यूअल न मिलने के चलते वर्तमान में निष्क्रिय हैं। इस तरह देश में इन टैंक की संख्या 1250-1300 के बीच ही है।
 क्रायोजेनिक टैंक की जरूरत दो वजहों से होती है। इसकी पहली जरूरत तो लिक्विड ऑक्सीजन के ट्रांसपोर्टेशन के लिए होती है और दूसरी जरूरत होती है इसके स्टोरेज के लिए। तमाम अस्पतालों में स्टोरेज को तो जैसे-तैसे मैनेज किया जा सकता है, लेकिन ट्रांसपोर्टेशन के लिए इसकी जरूरत बहुत अधिक थी। वहीं अचानक से ऑक्सीजन की बढ़ी मांग की वजह से भारत में क्रायोजेनिक टैंक की दिक्कत हो गई, क्योंकि ये कोई ऐसी चीज नहीं, जिसे अचानक से बनाया जा सके। इसकी मैन्युफैक्चरिंग बहुत ही कम मात्रा में होती है।  

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