राष्ट्रपति मुर्मू ने पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक सहयोग का सुझाव दिया
नयी दिल्ली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को कहा कि दुनिया जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना कर रही है और उन्होंने 'पर्यावरणीय न्याय' सुनिश्चित करने और सीमा पार की अन्य कानूनी चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग का सुझाव दिया। यहां राष्ट्रमंडल के कानून अधिकारियों के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल अपनी विविधता और विरासत के साथ बाकी दुनिया को सहयोग की भावना से साझा चिंताओं को दूर करने का रास्ता दिखा सकता है। मुर्मू ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करती है।
कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (सीएलईए) - कॉमनवेल्थ अटॉर्नी एंड सॉलिसिटर जनरल कॉन्फ्रेंस (सीएएसजीसी) 2024 के समापन समारोह को संबोधित करते हुए मुर्मू ने कहा, इसलिए, जब हम न्याय वितरण की बात करते हैं, तो हमें सामाजिक न्याय सहित इसके सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।'' उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में, जैसा कि दुनिया जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना कर रही है, हमें न्याय की अवधारणा के इन विभिन्न पहलुओं में पर्यावरणीय न्याय को भी जोड़ना चाहिए। राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘जैसा कि होता है, पर्यावरणीय न्याय के मुद्दे अक्सर सीमा पार की चुनौतियां पैदा करते हैं। वे इस सम्मेलन का प्रमुख क्षेत्र हैं, जिसका नाम है, न्याय वितरण में सीमा पार की चुनौतियां।'' उन्होंने कहा, ‘‘व्यापार और वाणिज्य का वैश्वीकरण इस अंतर-संबंध का एक और उदाहरण है। इसके अलावा हाल के दशकों में प्रौद्योगिकी ने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया है।'' मुर्मू ने कहा कि सीमा पार की जटिल कानूनी चुनौतियों का समाधान तलाश करते समय अंतर-संबंध, अंतर-निर्भरता और तकनीकी क्रांति को ध्यान में रखना होगा। उन्होंने कहा, ‘‘हमें हमेशा उस चीज से निर्देशित होना चाहिए जो हम सभी में समान है - मानवता और मानवतावादी मूल्य।'' राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि राष्ट्रमंडल कानूनी शिक्षा संघ (सीएलईए) ने एक साझा भविष्य के लिए एक रूपरेखा तैयार करने का दायित्व लिया है जो सीमाओं से परे है और समानता और गरिमा पर आधारित प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि राष्ट्रमंडल अपनी विविधता और विरासत के साथ, बाकी दुनिया को सहयोग की भावना से साझा चिंताओं को दूर करने का रास्ता दिखा सकता है। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत वैश्विक विमर्श में एक प्रमुख हितधारक के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि जब न्याय वितरण में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की बात आती है तो भारत के पास देने के लिए बहुत कुछ है। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत न केवल सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि इतिहास बताता है कि यह सबसे पुराना लोकतंत्र भी है। उन्होंने कहा कि उस समृद्ध और लंबी लोकतांत्रिक विरासत के साथ, हम आधुनिक समय में न्याय वितरण में अपनी सीख से योगदान कर सकते हैं। मुर्मू ने कहा कि न्याय के लिए निकटतम संस्कृत शब्द ‘न्याय' है, जिसका अर्थ है कि क्या उचित है और क्या सही है। उन्होंने कहा कि ‘न्याय' शास्त्रीय भारतीय दर्शन की छह प्रणालियों में से एक का नाम है, जो मूल रूप से पश्चिम में तर्कशास्त्र के अध्ययन के समान है।
राष्ट्रपति ने कहा, तो जो सही और उचित है वह तार्किक रूप से भी सही है। ये तीन गुण मिलकर किसी समाज की नैतिक व्यवस्था को परिभाषित करते हैं। यही कारण है कि आप, कानूनी पेशे और न्यायपालिका के प्रतिनिधि, वे हैं जो व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करते हैं।'' उन्होंने कहा कि अगर उस व्यवस्था को चुनौती दी जाती है, तो ‘आप ही हैं' जो वकील या न्यायाधीश, कानून के छात्र या शिक्षक के रूप में इसे फिर से सही करने के लिए सबसे अधिक प्रयास करते हैं। मुर्मू ने कहा कि आधुनिक समय में, असाधारण नेताओं की दो या तीन पीढ़ियों ने एक नई राष्ट्रीय जागरूकता को पुनर्जीवित करने में मदद की। उन्होंने कहा, ‘‘जो बहुत ध्यान देने योग्य बात थी वह यह है कि उनमें से अधिकांश ने कानून का अध्ययन किया था - और वह भी इंग्लैंड में। मुझे यकीन है कि राष्ट्रमंडल के कई अन्य सदस्यों के पास उन दिनों इस पृष्ठभूमि के नेता थे। यह विरासत ही हमें परिवार के रूप में एक साथ बांधती है।








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