यूपीएससी ने परिवीक्षाधीन आईएएस अधिकारी पूजा खेडकर की उम्मीदवारी रद्द की
नयी दिल्ली. संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने बुधवार को कहा कि उसने परिवीक्षाधीन आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) अधिकारी पूजा खेडकर की उम्मीदवारी रद्द कर दी है और भविष्य में किसी भी परीक्षा में उनके शामिल होने पर रोक लगा दी है। आयोग ने एक बयान में कहा, ‘‘यूपीएससी ने उपलब्ध रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल की है और उन्हें सीएसई-2022 नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करने का दोषी पाया है।'' इसमें कहा गया है कि सीएसई-2022 (सिविल सेवा परीक्षा-2022) के लिए उनकी अनंतिम उम्मीदवारी ‘‘रद्द'' कर दी गई है और भविष्य में किसी भी परीक्षा में उनके शामिल होने या चयन पर ‘‘स्थायी रूप से रोक'' लगा दी गई है। आयोग ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में खेडकर का यह “एकमात्र मामला” है, जिसमें वह यह पता नहीं लगा सका कि खेडकर ने एक अभ्यर्थी के लिए सीएसई परीक्षा में बैठने के लिए निर्धारित प्रयासों से ज्यादा बार परीक्षा दी, क्योंकि “उसने न सिर्फ अपना नाम बदला, बल्कि अपने माता-पिता के नाम भी बदल दिए।” इसमें कहा गया है कि यूपीएससी एसओपी को और मजबूत करने की प्रक्रिया में है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में इस तरह के मामले की पुनरावृत्ति न हो। आयोग ने कहा कि पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर को अपनी पहचान ‘फर्जी' बताकर परीक्षा के लिए स्वीकृत सीमा से अधिक अवसर ‘धोखाधड़ी' से प्राप्त करने को लेकर 18 जुलाई को कारण बताओ नोटिस (एससीएन) जारी किया गया था। बयान में कहा गया है कि उसे 25 जुलाई तक एससीएन पर अपना जवाब देना था, लेकिन उसने अपना जवाब देने के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटाने के वास्ते चार अगस्त तक का समय मांगा। आयोग ने कहा कि यूपीएससी ने उसे 30 जुलाई को अपराह्न साढ़े तीन बजे तक अपना जवाब देने के लिए ‘अंतिम मौका'' दिया था, लेकिन वह ‘‘निर्धारित समय के भीतर अपना स्पष्टीकरण देने में विफल रहीं।'' आयोग ने कहा कि खेडकर के मामले की पृष्ठभूमि में, उसने पिछले 15 वर्षों (2009-2023) के दौरान सिविल सेवा परीक्षाओं में शामिल हुए 15,000 से अधिक अंतिम उम्मीदवारों को लेकर इस बात की ‘गहन जांच' की कि उन्होंने कितनी बार प्रयास किया था। इस विस्तृत कवायद के बाद, खेडकर के मामले को छोड़कर, किसी भी अन्य अभ्यर्थी ने सीएसई नियमों के तहत निर्धारित प्रयासों की संख्या को पार नहीं किया। बयान के मुताबिक, खेडकर के मामले में यूपीएससी की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) यह पता नहीं लगा सकी कि उसने परीक्षा में बैठने के प्रयासों की निर्धारित संख्या को पार कर लिया है। इसका मुख्य कारण यह था कि उसने न सिर्फ अपना नाम बदला बल्कि अपने माता-पिता के नाम भी नाम बदल दिए। झूठे प्रमाण पत्र (विशेष रूप से ओबीसी और पीडब्ल्यूबीडी श्रेणियों के लिए) प्रस्तुत करने के संबंध में शिकायतों के मुद्दे को उठाते हुए यूपीएससी ने कहा कि आयोग सिर्फ प्रमाण पत्रों की “प्रारंभिक” जांच करता है जैसे कि क्या प्रमाण पत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया है, प्रमाण पत्र किस वर्ष से संबंधित है, प्रमाण पत्र जारी करने की तिथि क्या है, क्या प्रमाण पत्र पर कोई ‘ओवरराइटिंग' है और प्रमाण पत्र का प्रारूप आदि। बयान के मुताबिक, “आम तौर पर, अगर प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया होता है, तो उसे वास्तविक मान लिया जाता है। यूपीएससी के पास न तो अधिकार है और न ही हर साल उम्मीदवारों द्वारा जमा किए जाने वाले हजारों प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच करने का साधन है।” यूपीएससी ने कहा कि यह माना जाता है कि प्रमाण पत्रों की वास्तविकता की जांच और सत्यापन उन अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जिनके पास यह काम करने का अधिकार है। यूपीएससी ने खेडकर के खिलाफ इस आरोप में पुलिस में मामला दर्ज कराया है कि उसने अपनी फर्जी पहचान बताकर सिविल सेवा परीक्षा में निर्धारित प्रयासों से अधिक बार परीक्षा देकर धोखाधड़ी की है।





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