हिंसक वीडियो गेम पर राज्यसभा में जताई गई चिंता, राकांपा सदस्य ने इसके नियमन की मांग की
नयी दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की राज्यसभा सदस्य फौजिया खान ने बच्चों में ऑनलाइन वीडियो गेम के बढ़ते चलन और उसकी सामग्री से उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को लेकर मंगलवार को चिंता जताई और सरकार से उसके नियमन की मांग उठाई। राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए राकांपा सदस्य ने कहा कि डिजिटल युग में बच्चे तेजी से ऑनलाइन वीडियो गेम के संपर्क में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से कई खेलों के विषय ऐसे हैं जो छोटे बच्चों के लिए अनुपयुक्त हैं। इस क्रम में उन्होंने हिंसा, अभद्र भाषा, मादक द्रव्यों के सेवन, यौन सामग्री, लिंग रूढ़िवादिता और कानून की अवहेलना जैसे विषयों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, ‘‘पबजी, कॉल ऑफ ड्यूटी, जीटीए और ब्लू व्हेल चैलेंज जैसे ऑनलाइन गेम बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए हैं। इससे बड़े होने पर उनमें आक्रामक व्यवहार का विकास होता है। इस प्रकार के गेम ज्यादा खेलने से बच्चे मानसिक बीमारी के शिकार हो रहे हैं।'' राकांपा सदस्य खान ने पुणे की एक घटना का भी जिक्र किया जिसमें वीडियो गेम से प्रभावित 15 वर्षीय लड़के ने 14वीं मंजिल की इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली। उन्होंने कहा कि शोध से पता चलता है कि हिंसक विषयों के संपर्क में आने से बच्चों का संज्ञानात्मक विकास कम हो सकता है और भावनाओं पर नियंत्रण कम हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह लत अकादमिक प्रदर्शन, सामाजिक कौशल और मानसिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। खान ने कहा कि भारत में वर्तमान में वीडियो गेम को विनियमित करने के लिए विशिष्ट कानून का अभाव है और इस विषय पर न्यायिक ध्यान सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि ऑनलाइन मीडिया तक बच्चों की पहुंच को विनियमित करने में माता-पिता की भूमिका निर्विवाद है, लिहाजा सरकार को बच्चों के लिए सामग्री, विशेष रूप से वीडियो गेम को सीधे विनियमित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस सामग्री की देखरेख और वर्गीकरण के लिए एक समर्पित विभाग स्थापित किया जाना चाहिए, जिसमें संबंधित हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे खेलों से प्रभावित किशोरों को परामर्श और सहायता प्रदान की जानी चाहिए। शून्यकाल में ही तृणमूल कांग्रेस की सुष्मिता देव ने उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठों और उच्च न्यायालयों की क्षेत्रीय पीठों की संख्या बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा, ‘‘न्याय में देरी का मतलब न्याय नहीं मिलना है।''
उन्होंने कहा कि इस देश में न्याय में देरी का प्राथमिक कारण यह है कि बड़ी संख्या में मामले उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। उन्होंने कहा, ‘‘और दूसरा कारण यह है कि संसाधनों की कमी के कारण न्याय तक हमारी पहुंच नहीं है, क्योंकि मुकदमेबाजी बहुत महंगी हो गई है। और दूसरा, हमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। file photo

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