एम्स नई दिल्ली की स्टडी: कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में ऑटिज्म का खतरा बढ़ा
नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि 1 साल से कम उम्र के बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम, 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के बढ़े हुए खतरे से जुड़ा हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती उम्र में स्क्रीन के अधिक संपर्क से बच्चों के मस्तिष्क विकास और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चों के व्यवहार, संचार और सामाजिक संपर्क में अंतर देखा जाता है। कई मामलों में इसके संकेत 12 से 18 महीने की उम्र में ही दिखने लगते हैं, जिससे समय पर पहचान और हस्तक्षेप बेहद जरूरी हो जाता है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के 2025 के अनुमान के अनुसार, लगभग हर 31 में से 1 व्यक्ति में ASD पाया जाता है। यह आंकड़ा मजबूत पब्लिक हेल्थ सिस्टम और जागरूकता की जरूरत को दर्शाता है।
एम्स के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी ने बताया कि कई शोध और मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि जिन बच्चों में स्क्रीन एक्सपोज़र जल्दी शुरू होता है और स्क्रीन टाइम अधिक होता है, उनमें ऑटिज्म के लक्षण ज्यादा देखे जाते हैं।एम्स के अध्ययन में भी यह सामने आया कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों में स्क्रीन टाइम की शुरुआत कम उम्र में हुई थी। साथ ही, लड़कों में इसकी दर अधिक देखी गई, हालांकि लड़कियों में भी लक्षण स्पष्ट रूप से मौजूद थे।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखना बेहद आवश्यक है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस के अनुसार 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। 18 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए सीमित और उद्देश्यपूर्ण (एक्टिव) स्क्रीन उपयोग की सलाह दी जाती है, जबकि 7 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को अधिकतम 2 घंटे तक सीमित रखने की अनुशंसा की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को मोबाइल या टीवी के जरिए व्यस्त रखने के बजाय माता-पिता के साथ सीधा संवाद और इंटरैक्शन उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए ज्यादा जरूरी है।
ऑटिज्म की पहचान आमतौर पर 2 से 3 साल की उम्र में होती है, हालांकि 18 महीने के बाद इसके संकेत देखे जा सकते हैं। इसका कोई एक निश्चित मेडिकल टेस्ट नहीं है; पहचान बच्चे के व्यवहार, संवाद क्षमता और सामाजिक प्रतिक्रिया के आधार पर की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती वर्षों में संतुलित माहौल, सीमित स्क्रीन टाइम और परिवार के साथ अधिक समय बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए बेहद जरूरी है। जागरूकता और समय पर हस्तक्षेप से ऑटिज्म से जुड़ी चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।






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