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'नाता प्रथा': स्टांप पेपर पर नाबालिग लड़कियों की बिक्री से संबंधित रिपोर्ट का खुलासा करने का आदेश

 नयी दिल्ली.  लड़कियों को शादी के नाम पर स्टांप पेपर या अनौपचारिक समझौतों के माध्यम से 'बेचे' जाने वाली 'नाता प्रथा' एक बार फिर जांच के दायरे में है। केंद्रीय सूचना आयोग ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई कार्रवाई रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। सूचना आयुक्त पीआर रमेश ने हाल ही में जारी एक आदेश में कहा कि मंत्रालय को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अनुरोध पर पुनर्विचार करना चाहिए और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साथ साझा की गई कार्रवाई रिपोर्ट को उपलब्ध कराना चाहिए हालांकि छूट प्राप्त हिस्सों को हटा दिया जाए। केंद्रीय सूचना आयोग ने हालांकि अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई अन्य जानकारी को अस्वीकार करने के फैसले को बरकरार रखा। अपीलकर्ता द्वारा मांगी गयी जानकारी में शिकायतकर्ताओं और उनके परिवारों के व्यक्तिगत विवरण शामिल हैं जो सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत छूट प्राप्त हैं। आरटीआई आवेदन में मंत्रालय, राष्ट्रीय सूचना आयोग और राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश व गुजरात राज्यों के बीच हुए पत्राचार की प्रतियां तथा इस मामले पर की गई कार्रवाई रिपोर्ट जारी करने का अनुरोध किया गया था। केंद्रीय सूचना आयोग ने पाया कि व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता लेकिन मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई कार्रवाई रिपोर्ट जनहित का मामला है और इसे संशोधित रूप में साझा किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छह जून, 2024 को जारी एक बयान में इस प्रथा को गंभीर बताते हुए इसे 'सामाजिक बुराई' करार दिया था। आयोग ने कहा था, "आयोग 'नाता प्रथा' को गंभीर मानता है, जिसके तहत कुछ समुदायों में लड़कियों को शादी के नाम पर स्टांप पेपर पर या किसी अन्य तरीके से बेचा जाता है। राजस्थान के कुछ हिस्सों और मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश व गुजरात के आसपास के इलाकों में इस प्रथा की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।" आयोग ने इस प्रथा को 'अनैतिक' व 'दुराचारी' बताते हुए इसके उन्मूलन की मांग की थी।

 
इस प्रथा के महिलाओं और नाबालिग लड़कियों पर गंभीर परिणाम होते हैं।
 
आयोग ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और संबंधित राज्यों को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। मंत्रालय ने मानवाधिकार को सूचित किया था कि यह प्रथा महिलाओं के लिए 'अपमानजनक' प्रतीत होती है और इसे समाप्त करने की आवश्यकता है। मानवाधिकार आयोग ने राजस्थान में एक नाबालिग लड़की के पिता द्वारा 'नाता प्रथा' के तहत ग्रामीणों की उपस्थिति में परिवारों के बीच हुए समझौते के माध्यम से 2.5 लाख रुपये में उसकी शादी कराने के मामले का भी हवाला दिया। शुरुआती तौर पर 60,000 रुपये का भुगतान किया गया था लेकिन शेष राशि समय पर नहीं चुकाई गई, जिसके बाद पिता लड़की को वापस ले आया और 32,000 रुपये में उसका 'नाता' (शादी) दूसरे आदमी से तय कर दिया। लड़की ने इस व्यवस्था का विरोध किया और पहले वाले आदमी के साथ रहने के लिए लौट गई।
 
बाद में उसने अपने पिता द्वारा उत्पीड़न व धमकियों का आरोप लगाया और जून 2020 में आत्महत्या कर ली।

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