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 'जिंदगी नाटक नहीं, जिसकी लाइन हिसाब-किताब से बोली जाए’

0- हिंदी रंगमंच दिवस पर आयोजित नाटक टीस में दिखी रंगमंचीय कलाकारों के पर्दे के पीछे की पीड़ा
0- महाराष्ट्र मंडल और रंगभूमि की प्रस्तुति को संत ज्ञानेश्वर सभागृह में देखने के लिए उमड़ी प्रेमी दर्शन
रायपुर। रंगमंच पर खड़ा कलाकार जहां दुनिया का मनोरंजन करता हैं, वहीं उसके नाट्य अभिनय के लिए पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही होती है। इन कलाकारों के दैनिक जीवन के संघर्ष को भावनात्‍मक रूप से मंच पर ‘टीस’ के माध्‍यम से प्रस्तुत किया। निर्देशक लोकेश साहू ने 'टीस' के माध्‍यम से दर्शाया कि जिंदगी कोई नाटक नहीं होता कि वहां हर बात पहले से हिसाब- किताब करके बोली जाए। हिंदी रंगमंच के दिवस पर महाराष्ट्र मंडल और रंगभूमि के कलाकारों ने स्व. डा. कुंज बिहारी शर्मा की जन्मतिथि पर पुण्य स्मरण करते हुए संत ज्ञानेश्वर सभागृह में हिंदी नाटक टीस का मंचन किया गया।
नाटक के मुख्य पात्र रजत (आकाश वरठी) एक उत्कृष्ट रंगमंच अभिनेता हैं, जो अपनी कला की दुनिया में खोए रहते हैं, किंतु अपने ही घर में निरंतर संघर्ष करते दिखाई देते हैं। उनकी पत्नी मीना (ट्विंकल परमार) के संवादों में घर की आर्थिक स्थिति और जीवन की कठोर सच्चाइयां सामने आती हैं। बाबूजी (प्रांजल सिंह राजपूत) का संवेदनशील दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि कलाकारों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष को समझना कितना आवश्यक है। वहीं बलवंत (प्रभात साहू) के संवाद समाज की उस सोच को उजागर करते हैं, जहां घर की प्रतिभा को अक्सर पहचान नहीं मिलती।
नाटक में अत्यंत भावुक प्रसंग लेखक की पत्नी रंजना ध्रुव ने प्रस्तुत किया। इसमें यह बताया गया कि इस नाटक की प्रेरणा उनके दिवंगत पुत्र के अधूरे सपनों से जुड़ी है। इस पृष्ठभूमि ने नाटक को और अधिक संवेदनशील और प्रभावशाली बना दिया। चंचल ध्रुव ने कलाकारों का कुशल मार्गदर्शन करते हुए एक निर्देशक के संघर्ष को बखूबी प्रस्तुत किया। नाटक के संवाद और प्रस्तुति ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया।
कविताओं की प्रस्‍तुति ने किया प्रभावित
नाटक के मंचन से पहले कविता मंचन 'शबरी', 'किवाड़', 'जिंदगी' में डॉ. विकास अग्रवाल, भूपेंद्र साहू और अक्षदा मातुरकर के उत्कृष्ट अभिनय ने समां बांध दिया। इसकी परिकल्पना आचार्य रंजन मोड़क ने की। मंच संचालन चैतन्य मोड़क ने किया। प्रकाश व्यवस्था नीरज सिंह ठाकुर, संगीत नितीश यादव, रूप सज्जा सुषमा गायकवाड़, वेशभूषा सुमन त्यागी और मंच सज्जा अजय पोद्दार, प्रवीण क्षीरसागर ने की। मंच व्यवस्था में जयप्रकाश साहू, सुकृत गनोदवाले, रिया परमार, राजेश गनोदवाले, सुमित मोड़क और क्षितिज महोबिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
 

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