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मित्रता, प्रतिज्ञा और परिणाम का आधुनिक अर्थ

-डॉ. नीरज गजेंद्र
धर्म के अनुसार मित्रता निभाना पुण्य है। वचन निभाना श्रेष्ठ गुण है और प्रतिज्ञा को जीवन की रीढ़ माना गया है। ये बातें सुनने में जितनी सुंदर हैं, उतनी ही अधूरी भी है। यदि मित्रता निभाना ही सर्वोच्च धर्म होता, तो महाभारत में कर्ण क्यों मारे जाते। वे भी तो अपने मित्र दुर्योधन के प्रति अंत तक निष्ठावान रहे। यदि प्रतिज्ञा निभाना ही परम सत्य होता, तो भीष्म पितामह शरशैया पर क्यों पड़े रहे होते। वे अपनी प्रतिज्ञा से कभी नहीं डिगे। और यदि वचन निभाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य होता, तो राजा दशरथ को मृत्यु क्यों स्वीकार करनी पड़ती, उन्होंने भी तो अपने वचन का पालन किया। यहीं से धर्म का असली प्रश्न जन्म लेता है। समस्या मित्रता, वचन या प्रतिज्ञा में नहीं वह किसके साथ, किस उद्देश्य से और किस दिशा में जा रहा उस पर निहित है।
धर्म सिर्फ नियमों का पालन नहीं है, वह विवेक है। धर्म यह समझने की क्षमता है कि जिसे हम निष्ठा कह रहे हैं, वह सत्य के पक्ष में है या अहंकार, मोह और अन्याय के पक्ष में खड़ी हो चुकी है। कर्ण इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे दानवीर थे, महान धनुर्धर थे, अपार सामर्थ्य के स्वामी थे। किंतु उनकी मित्रता दुर्योधन से थी। एक ऐसे व्यक्ति से जो अन्याय, ईर्ष्या और सत्ता-लालसा का प्रतीक था। कर्ण जानते थे कि पांडव धर्म के साथ हैं, कृष्ण सत्य के साथ हैं, फिर भी उन्होंने मित्रता निभाने के नाम पर अधर्म का साथ नहीं छोड़ा। परिणाम यह हुआ कि वीर होते हुए भी वे विनाश को प्राप्त हुए। भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा भी यही सिखाती है। उन्होंने जीवनभर ब्रह्मचर्य और सिंहासन-त्याग की प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन जब अधर्म दरबार में निर्लज्ज होकर खड़ा था। जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब वे मौन रहे। प्रतिज्ञा विवेक से बड़ी हो गई और वहीं धर्म चूक गया। यहां प्रतिज्ञा बची रही, और धर्म हार गया।
आज के समय में यह प्रश्न और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। हम गर्व से कहते हैं मैं अपने दोस्त के लिए कुछ भी कर सकता हूँ। लेकिन यह शायद ही पूछते हैं कि वह दोस्त हमें किस दिशा में ले जा रहा है। हम कहते हैं मैंने कमिटमेंट किया है, पीछे नहीं हट सकता। लेकिन यह नहीं देखते कि वह कमिटमेंट समाज, परिवार और आत्मा के लिए सही है या नहीं। आधुनिक जीवन में कर्ण हर जगह हैं। गलत बॉस के लिए अनैतिक काम करना, गलत नेता के लिए झूठ फैलाना, गलत दोस्त के लिए गलत रास्ते पर चलना यह सब वफादारी के नाम पर होता है। लेकिन अंत में नुकसान उसी का होता है जो मित्रता निभा रहा होता है।
दान का सिद्धांत भी यही कहता है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि अयोग्य को दिया गया दान, देने वाले और पाने वाले दोनों को दुख देता है। आज दान भी सोच-समझकर नहीं किया जाता। कभी दिखावे के लिए, कभी सौदे की तरह कि एक देंगे तो दस पाएंगे। यह दान नहीं, निवेश है। दान तभी पवित्र होता है जब उसका उपयोग सही दिशा में हो। यही नियम मित्रता और प्रतिज्ञा पर भी लागू होता है। हर निभाई गई मित्रता पुण्य नहीं होती और हर निभाई गई प्रतिज्ञा धर्म नहीं होती। धर्म वही है जो लोक-कल्याण की ओर ले जाए, जो आत्मा को हल्का करे और मन को शांत रखे।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि मित्रता निभानी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है किससे निभानी चाहिए। जब प्रतिबद्धता गलत हाथों में पड़ जाती है, तो गुण भी दोष बन जाता है। इसलिए अपनी संगत पर ध्यान दीजिए। आपका लगाव किसके प्रति है, आपका समर्पण किस दिशा में है। यही आपका भविष्य तय करता है। कृष्ण के साथ चलेंगे तो रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन मंज़िल सुरक्षित होगी। दुर्योधन जैसे मित्रों के साथ चलेंगे तो सुविधा मिलेगी, लेकिन अंत विनाशकारी होगा। चयन हमें करना है मित्र कौन और कैसा हो।

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