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कुंडलिया

-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)         
चलते-चलते राह में, जाने कब हो शाम।
पूर्ण सभी दायित्व हों, सुखी रखें निज धाम।।
सुखी रखें निज धाम, सोच रख सोते-जागें।
प्रियजन हों खुशहाल, कर्म करने को भागें।।
पूरी हो हर चाह, भाव मानस में पलते।
कर लें कुछ सत्कर्म, सोचते चलते -चलते।।
 उड़ने प्रेम-पतंग दें, नभ में उच्च उड़ान।
त्याग-समर्पण-भाव से, रिश्ते को दें मान।।
रिश्ते को दें मान, दिशा जीवन की मोड़ें।
द्वेष-दंभ से मुक्त, स्वार्थ की सीमा तोड़ें।।
स्नेह-डोर को थाम, नई राहें दें जुड़ने।
चले गगन में साथ, प्रेम के पंछी उड़ने।।
 जीवन के हर मोड़ पर, साथी देना  साथ।
बनें सहारा हम चलें, ले हाथों में हाथ।
ले हाथों में हाथ, थकन मिट जाए सारी।
कंधे पर रख शीश, नींद आती है प्यारी।।
बनी रहे यह प्रीति, अमर है मन का बंधन।
पति-पत्नी हम साथ, बिताएँ सुख से जीवन।।
 जीवन की पुस्तक सरल, समझें तो है ठाठ।
पृष्ठ बदलते जो रहे, पढ़ें न कोई पाठ।।
पढ़ें न कोई पाठ, उलझते जाते प्रतिदिन।
कमियों से अनजान, थकें मुश्किल पल गिन-गिन।।
होती है जब हार, दुखी हो जाता है मन।
सुलझे रहें विचार, सुखद हो जाता जीवन।।

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