अन्य भाषाओं से प्रतिस्पर्धा किए बिना हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने की आवश्यकता: शाह
नयी दिल्ली. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि किसी अन्य भारतीय भाषा के साथ प्रतिस्पर्धा किए बिना देश में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने की जरूरत है। राजभाषा पर नवगठित संसदीय समिति को संबोधित करते हुए शाह ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लाई गई नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने पर जोर दिया गया है क्योंकि मातृभाषा में बुनियादी शिक्षा मिलने पर बच्चे कई भाषाओं से जुड़ते हैं। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, शाह ने कहा, “किसी भी भारतीय भाषा के साथ प्रतिस्पर्धा किए बिना, हमें हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने की जरूरत है।” उन्होंने कहा कि हिंदी अब एक तरह से रोजगार और तकनीक से जुड़ गई है और भारत सरकार भी आधुनिक तकनीक को हिंदी भाषा के साथ जोड़ने के लिए विशेष प्रयास कर रही है। शाह ने कहा कि नई शिक्षा नीति में सभी भारतीय भाषाओं को महत्व देने का संकल्प लिया गया है और संसदीय समिति इसे और आगे ले जाएगी। गृह मंत्री ने कहा कि पिछले दस वर्षों में, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, संसदीय समिति ने लगातार प्रयास किया है कि हिंदी सभी स्थानीय भाषाओं की सहेली बने और उसकी किसी से प्रतिस्पर्धा न हो। उन्होंने कहा, “हमें इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी स्थानीय भाषा के बोलने वालों के मन में हीनभावना न आए और हिंदी सामान्य रूप से सर्वसम्मति व सहमति से कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकृत हो।” गृह मंत्री ने कहा कि आज़ादी के 75 वर्षों के बाद ये बहुत ज़रूरी है कि देश का शासन देश की भाषा में चले और इसके लिए कई प्रयास किए हैं। उन्होंने कहा, “हमें 1000 साल पुरानी हिंदी भाषा को एक लंबे समय तक नया आयुष्य देना, स्वीकृत बनाना और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा हमारे सामने छोड़े गए कार्य को पूरा करने का प्रयास करना है।” गृह मंत्री ने कहा कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, राजगोपालाचारी, केएम मुंशी और सरदार पटेल आदि में से कोई भी हिंदी भाषी क्षेत्र से नहीं आते थे, लेकिन इन सभी ने इस बात को महसूस किया था कि देश की एक ऐसी भाषा होनी चाहिए जो राज्यों के बीच संवाद का काम करे। शाह ने कहा कि पिछले 75 वर्षों से राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन पिछले 10 वर्षों में इसके तरीके में थोड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि पूर्व केंद्रीय मंत्रियों के एम मुंशी और एन जी आयंगर ने बहुत सारे लोगों से विचार-विमर्श करके ये तय किया था कि हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करने और इसे सरकारी कामकाज में आगे बढ़ाने के क्रम में किसी भी स्थानीय भाषा के साथ हिंदी की स्पर्धा न हो। शाह ने कहा कि राजभाषा विभाग इस प्रकार का सॉफ्टवेयर बना रहा है जिससे आठवी अनुसूची की सभी भाषाओं का अपने आप तकनीकी आधार पर अनुवाद हो जाए। उन्होंने कहा कि इस कार्य के पूरा हो जाने पर कामकाज में हिंदी की बहुत तेज़ गति से स्वीकृति होगी और विकास होगा।










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