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जल के दोबारा उपयोग के लिए सख्त नियमों का प्रस्ताव

 नई दिल्ली।  सरकार ने अपशिष्ट जल के उपयोग के लिए नए नियम प्रस्तावित किए हैं। इन नियमों के तहत जल के उपयोगकर्ताओं पर सख्त जिम्मेदारी डाली गई है और 2031 तक न्यूनतम 50 फीसदी अपशिष्ट जल के उपयोग का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इन नियमों के तहत जल के सभी बड़े उपयोगकर्ता को व्यापक अपशिष्ट जल उपचार उपायों को पंजीकृत करने और उन्हें लागू करने की आवश्यकता होगी। रोजाना 5,000 लीटर से अधिक जल की खपत करने वाली संस्थाओं को बड़े उपयोगकर्ता के तौर पर परिभाषित किया गया है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 7 अक्टूबर को प्रस्तावित नियमों की रूपरेखा प्रस्तुत की है। उसके अनुसार नए बड़े उपयोगकर्ताओं के लिए अपशिष्ट जल के न्यूनतम उपयोग के प्रतिशत में आगे वृद्धि होगी। यह रिहायशी सोसाइटियों के लिए वित्त वर्ष 2027-28 में 20 फीसदी से शुरू होकर वित्त वर्ष 2031 तक 50 फीसदी तक पहुंच जाएगी।
इसी प्रकार सरकारी और निजी कार्यालयों सहित संस्थागत एवं वाणिज्यिक संस्थानों को शुरू में 20 फीसदी उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग करना होगा। बाद में वित्त वर्ष 2030 से यह आंकड़ा बढ़कर 40 फीसदी हो जाएगा। मगर औद्योगिक इकाइयों को वित्त वर्ष 2031 से 90 फीसदी उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग करना होगा।इसके विपरीत, मौजूदा बड़े उपयोगकर्ताओं के शुरुआती लक्ष्य कम रखे गए हैं। रिहायशी सोसाइटियों के लिए शुरू में 10 फीसदी अपशिष्ट जल का उपयोग अनिवार्य किया गया है जबकि वित्त वर्ष 2031 उसे बढ़ाकर 25 फीसदी करने का प्रस्ताव है। मगर संस्थागत और वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं के लिए यह आंकड़ा 10 फीसदी से शुरू होकर समान समय सीमा के भीतर 20 फीसदी तक बढ़ाने का प्रस्ताव है।
मंत्रालय के प्रस्तावित ढांचे में विस्तारित उपयोगकर्ता दायित्व (ईयूआर) के बारे में भी बताया गया है। इसके तहत उपयोगकर्ताओं के लिए उनके उपभोग स्तर के अनुपात में अपशिष्ट जल का उपचार करना और उसका दोबारा उपयोग करना आवश्यक है। अपशिष्ट जल का तात्पर्य शौचालय, स्नानघर, कपड़े धोने की मशीन या रसोईघर से निकलने वाले इस्तेमाल किए गए जल से है।मंत्रालय ने 1 अक्टूबर, 2025 से प्रभावी होने वाले इन मसौदा नियमों पर 60 दिनों के भीतर आम लोगों से राय मांगी है। यह पहल जल संरक्षण पर जोर दिए जारे से प्रेरित है। जल संसाधन सीमित होने के कारण उसका पुनर्चक्रण बेहद आवश्यक हो गया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चक्रीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उपचारित अपशिष्ट जल के उपयोग के लिए फरवरी में जारी अपने दिशानिर्देशों में जोर देकर कहा था कि भारत में उपचारित अपशिष्ट जल का दोबारा उपयोग करने की प्रथा बेहद मामूली है। कई राज्य सरकारों ने नीतिगत नियोजन के समय इस ओर खास ध्यान नहीं दी है।बोर्ड के दिशानिर्देशों के अनुसार, सात राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों- दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, चंडीगढ़ और पुदुच्चेरी में ही घरेलू अपशिष्ट जल का उपचार करने के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। इसका उपयोग आम तौर पर बागवानी, सिंचाई, गैर-संपर्क बांध, धुलाई (सड़कें, वाहन, रेलगाड़ियां), निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।
भारत में रोजाना करीब 3,666.8 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल को उपचारित करने की क्षमता है जबकि रोजाना 7,236.8 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल तैयार होता है। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि रोजाना 4 करोड़ लीटर क्षमता के अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र स्थापित करने की लागत करीब 85.10 करोड़ रुपये है। मगर भारी-भरकम पूंजी निवेश के बाद यह संयंत्र अपने 8 वर्षों के परिचालन काल में करीब 7.77 रुपये प्रति लीटर उपचारित अपशिष्ट जल का राजस्व सृजित कर सकता है।

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