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लखनऊ की विंटेज कार रैली में दिखा इतिहास का भव्य नजारा

 लखनऊ. नवाबों के शहर लखनऊ की सड़कें रविवार को संग्रहालय में तब्दील हो गईं। बेहद नाज़ों से सम्भाल कर रखी गयी पुराने जमाने की (विंटेज) कारों का एक बेड़ा शहर में निकला तो लोग बरबस उसकी तरफ आकर्षित हो गए। ‘अवध हेरिटेज कार क्लब' (ओएचसीसी) द्वारा आयोजित विंटेज कार रैली के दौरान चलते-फिरते इतिहास ने लोगों का ध्यान एकाएक अपनी तरफ खींच लिया। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग और एचडीएफसी बैंक के सहयोग से आयोजित इस विंटेज कार रैली में लगभग दो दर्जन पुरानी कारें शामिल हुई। 'चंद्रिका देवी हेरिटेज ड्राइव' नामक इस रैली ने गोमती नगर में पर्यटन विभाग के पर्यटन भवन से कैप्टन फार्म तक 60 किलोमीटर का रास्ता तय किया। पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव मुकेश मेश्राम ने ऐसे आयोजनों के व्यापक प्रभाव पर जोर देते हुए कहा, "लखनऊ में यह विंटेज कार रैली युवा पीढ़ी को हमारे परिवहन के इतिहास से जोड़ती है। यह हमारी विरासत को संरक्षित करने में नागरिकों के बीच रुचि भी बढ़ाती है।" मेश्राम ने कहा, "उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग इन आयोजनों में सहयोग करता है और हम बुंदेलखंड और चंबल क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इसी तरह की रैलियों की योजना बना रहे हैं।" रैली में 1928 ऑस्टिन, बेबी ऑस्टिन, जगुआर मार्क 4, फिएट स्पाइडर और प्रतिष्ठित फॉक्सवैगन बीटल जैसी दुर्लभ कारों का बेड़ा शामिल था जिनमें से कुछ कारें तो लगभग एक सदी पुरानी थी। ओएचसीसी के अध्यक्ष प्रद्युम्न सिंह ने कहा, "यह चौथी बार है जब उप्र पर्यटन विभाग ने हमें प्रायोजित किया है। ये कार्यक्रम हमारी विरासत का हिस्सा है और हमारा उद्देश्य विंटेज कारों को चलाकर और उन्हें जनता के सामने प्रदर्शित करके उन्हें बढ़ावा देना है।" रैली में कुछ लोगों ने भाग नहीं लिया, जिससे इसमें शामिल होने वाली गाड़ियों की संख्या अपेक्षित 30 से घटकर लगभग 22-24 रह गई, लेकिन प्रद्युम्न सिंह निराश नहीं हुए। उन्होंने  कहा, "आज की रैली के लिए यह अब भी एक अच्छी संख्या है। इन कारों में से कुछ 1940 और 1950 के दशक की थीं और उन्होंने 60 किलोमीटर की दूरी तय की जो ऐसी विंटेज कारों के लिए अच्छी-खासी दूरी है।" रैली का मुख्य आकर्षण 1928 ऑस्टिन थी, जिसके मालिक डॉक्टर अखिलेश माहेश्वरी हैं।

 
ओएचसीसी के कोषाध्यक्ष अमित गुजराल ने ऐसी पुरानी कारों को सहेज कर रखने की चुनौतियों को साझा किया।
 
उन्होंने कहा, "इन कारों का रख-रखाव बेहद लगन का काम है और इसमें समय भी लगता है। हम इन गाड़ियों के रखरखाव के लिए अक्सर दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद के बाज़ारों में जाते हैं या उनके पुर्जे आयात करते हैं। नियमित रख-रखाव ज़रूरी है। इंजन को सही स्थिति में रखने के लिए हम कम से कम 15 दिन में एक बार कार स्टार्ट करते हैं।" कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता मुज़फ़्फ़र अली ने विंटेज कारों के सांस्कृतिक महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, "कारें हमारे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके रखरखाव और संरक्षण को समझना महत्वपूर्ण है।" अली ने लखनऊ के विंटेज कारों और रैलियों के समृद्ध इतिहास को याद किया।
 
उन्होंने कहा, "तिर्वा के राजा इस मुहिम के अगुवा थे और मेरे पिता के पास 1928 की इसोटा फ्रास्चिनी थी। लखनऊ के तालुकदारों के बीच ऐसी कारें शान और जुनून का प्रतीक थीं।" जिन कारों ने सबसे अलग पहचान बनाई उनमें संदीप नारायण की वोल्वो अमेज़ॅन (1967) थी, जिसे ‘थ्री-पॉइंट' सीट बेल्ट प्रणाली शुरू करने के लिए जाना जाता है। वोल्वो ने इस नवाचार का पेटेंट नहीं कराया क्योंकि उनका मानना था कि सुरक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए। नारायण ने कहा, "आज यह प्रणाली दुनिया भर में सभी कारों में इस्तेमाल की जाती है।"
 
नारायण ने अपनी फिएट स्पाइडर (1958) भी प्रदर्शित की, जो लाल रंग की शानदार कार है।
 
नितिन कोहली ने अपनी 1951 की मॉरिस सीरीज़ की कार चलाई।
उन्होंने  कहा, "यह 'मेड इन इंग्लैंड' है। मेरे पास इसके लिए एक निजी मैकेनिक है जो शायद हर सात या 15 दिन में आता है। मैं हर रविवार को इस कार को चलाता हूं।" रैली लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के कठवारा गांव में कैप्टन के फार्म में संपन्न हुई।

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