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रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर:  डॉलर के मुकाबले पहली बार 92 के पार

 नई दिल्ली। सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के सामने बुरी तरह लुढ़क गया। दिन के अंत में ये 92.35 पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। पिछले बंद से ये 53 पैसे नीचे गिरा। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 92.22 पर खुला था, थोड़ी देर के लिए 92.15 तक चढ़ा, लेकिन फिर लगातार गिरता चला गया। शुक्रवार को यह 91.82 पर बंद हुआ था, तब भी 18 पैसे की गिरावट आई थी।

ट्रेडर्स का कहना है कि मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इसके साथ ही डॉलर भी मजबूत होता जा रहा है। घरेलू शेयर बाजार में भारी बिकवाली और विदेशी निवेशकों के पैसे निकालने से रुपये पर और दबाव पड़ गया है।
 छह बड़ी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दिखाने वाला ‘डॉलर इंडेक्स’ 0.35% बढ़कर 99.33 पर पहुंच गया। इन सभी वजहों से रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
  घरेलू शेयर बाजार की बात करें तो आज सेंसेक्स 1,352.74 अंक गिरकर 77,566.16 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी भी 422.40 अंक लुढ़ककर 24,028.05 पर आ गया। यह निफ्टी में पिछले एक महीने का सबसे बड़ा एक दिन का गिरावट वाला सत्र रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुक्रवार को 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शेयरों का MSCI सूचकांक करीब 4% गिर गया, जबकि वॉल स्ट्रीट के फ्यूचर्स भी कमजोर शुरुआत का संकेत दे रहे थे। बॉन्ड बाजार में भी दबाव दिखा। 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड लगभग 4 आधार अंक बढ़ गई। टोक्यो से लेकर ब्रिटेन तक बॉन्ड बाजारों में गिरावट देखी गई, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई बढ़ने का डर बढ़ गया है।
मिडल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष का असर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे एशियाई देशों की मुद्राओं पर भी पड़ा है। इंडोनेशियाई रुपिया और फिलीपींस का पेसो भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए। तेल आयात करने वाली एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर इसका खासा दबाव पड़ रहा है।
 वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। जनवरी में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति (कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन) 2.75% रही, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 2% से 6% वाले लक्ष्य दायरे के निचले हिस्से के करीब है। हालांकि इसके बावजूद रुपये पर दबाव साफ नजर आ रहा है। डॉलर-रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम बढ़ गए हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि बाजार में आगे रुपये के कमजोर होने का जोखिम माना जा रहा है।

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