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प्रधानमंत्री की अपील के बाद रत्न-आभूषण उद्योग पर प्रतिकूल असर संभवः जीजेसी

मुंबई.  पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने संबंधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद रत्न एवं आभूषण उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। एक उद्योग संगठन ने सोमवार को यह आशंका जताई। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण परिषद (जीजेसी) के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने कहा कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से एक करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देने वाले रत्न एवं आभूषण उद्योग पर प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, "हम सोने की जिम्मेदारी से खपत करने संबंधी प्रधानमंत्री की अपील को समझते हैं। यह बढ़ते आयात और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव की व्यापक राष्ट्रीय चिंता को दर्शाती है। लेकिन भारत में पहले से ही हजारों टन सोना घरों में रखा हुआ है। ऐसे में समाधान केवल सोने की मांग घटाने में नहीं, बल्कि स्वर्ण मौद्रीकरण योजना (जीएमएस) के जरिये मौजूदा सोने के उपयोग में है।" रोकड़े ने कहा कि अतीत में इस तरह के मामलों में 'रिवेंज बाइंग' यानी प्रतिबंध के बाद अधिक खरीद की स्थिति भी देखी गई है, जिससे आगे चलकर सोने की मांग बढ़ सकती है। उन्होंने कहा, ''बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा क्षेत्र (बीएफएसआई), खुदरा, ई-कॉमर्स, आभूषण डिजाइनिंग और लॉजिस्टिक जैसे संबद्ध क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ेगा। इसलिए हम सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।'' जीजेसी के उपाध्यक्ष अविनाश गुप्ता ने कहा कि सोने का भारतीय परिवारों से भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ाव है, लेकिन वर्तमान में आर्थिक स्थिरता के साथ मांग का संतुलन भी जरूरी है। गुप्ता ने कहा, ''आभूषण उद्योग का मानना है कि एक मजबूत एवं पारदर्शी स्वर्ण मौद्रीकरण योजना भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान हो सकती है। इस योजना के जरिये घरों और लॉकर में रखे निष्क्रिय सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाया जा सकता है। इससे आयात घटेगा, चालू खाते के घाटे (सीएडी) पर दबाव कम होगा और वित्तीय प्रणाली मजबूत होगी।'' प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को हैदराबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग, सोना खरीद और विदेशी यात्रा टालने समेत कई उपाय सुझाए थे, ताकि पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेशी मुद्रा की बचत की जा सके।

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