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 जलवायु परिवर्तन के समाधान में जनजातीय ज्ञान प्रणालियाँ अहम: मंत्री राम विचार नेताम

रायपुर।  छत्तीसगढ़ के जनजातीय कार्य मंत्री श्री राम विचार नेताम ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने में जनजातीय ज्ञान प्रणालियाँ प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं। उन्होंने जनजातीय समुदायों को सतत विकास का सक्रिय भागीदार बताते हुए उनके पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति-आधारित जीवन शैली को नीति निर्माण में समुचित स्थान देने की आवश्यकता पर बल दिया।
श्री नेताम हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा 28 मार्च को आयोजित दो दिवसीय ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “लॉ, राइट्स एंड इंडिजिनस फ्यूचर्स: रीथिंकिंग ट्राइबल जस्टिस इन अ ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड” के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। अपने मुख्य भाषण में उन्होंने कहा कि न्याय, समानता और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समावेशी नीतियाँ समय की आवश्यकता हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता जैसी समकालीन चुनौतियों के समाधान में जनजातीय ज्ञान की उपयोगिता को रेखांकित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर (डॉक्टर) वी. सी. विवेकानंदन के उद्घाटन वक्तव्य से हुई। उन्होंने समकालीन विधिक विमर्श में जनजातीय न्याय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाली जनजातीय प्रणालियाँ “प्रकृति पर नियंत्रण” आधारित विकास मॉडल के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। उन्होंने केवल शैक्षणिक विश्लेषण तक सीमित न रहकर ठोस नीतिगत कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
यह सम्मेलन “सेंटर फॉर स्टडी ऑफ लॉ एंड इंडिजिनस पीपल” द्वारा आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व केंद्र प्रमुख डॉ. अयान हाजरा ने किया। कार्यक्रम में प्रभारी रजिस्ट्रार डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि श्री आशुतोष कुमार आहिरे ने सम्मेलन के संयोजक के रूप में दायित्व निभाया।
दो दिवसीय सम्मेलन में देश-विदेश से शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, विधि विशेषज्ञों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में जनजातीय अधिकार और संवैधानिक ढांचा, संस्कृति और विधिक बहुलवाद, जलवायु न्याय एवं पर्यावरणीय सततता, विकास और विस्थापन, तथा जनजातीय समुदायों में लैंगिक मुद्दों जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई।
29 मार्च को आयोजित समापन सत्र में छत्तीसगढ़ शासन के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक विकास विभाग के प्रधान सचिव श्री सोनमणि बोरा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने जनजातीय समुदायों के न्याय, समावेशन और सशक्तिकरण के लिए सुशासन, नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन तथा संस्थागत समन्वय की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
स्कूल ऑफ लॉ एंड ह्यूमैनिटीज के निदेशक डॉ. अविनाश सामल ने प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संवाद और विचार-विमर्श को सार्थक बताया।
सम्मेलन का समापन सभी गणमान्य अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया। यह आयोजन कानून, समाज और जनजातीय ज्ञान प्रणालियों के बीच सतत संवाद को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, जो समावेशी एवं सतत भविष्य के निर्माण में सहायक होगा।

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