सबका वक्त बदलते देखा...
सजल
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सबका वक्त बदलते देखा।
खोटा सिक्का चलते देखा।।
कंटक मध्य सुमन मुस्काते।
पीड़ा में सुख पलते देखा।।
सब कुछ देकर कुछ न माँगते।
पावस बनकर ढलते देखा ।।
अनजानों से मिला सहारा।
अपनों को भी छलते देखा।।
सूर्य अस्त हो गया साँझ को।
दीप रात भर जलते देखा।।







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