मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...
यादें-आशा भोंसले
आलेख- मंजूषा शर्मा
दिग्गज गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी आवाज से हिंदी ही नहीं बल्कि कई भाषाओं के गानों को अमर बना दिया। उनके निधन की खबर लगते ही आज सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर उनके ही गाये गाने सुनाई दे रहे हैं। आज हम उनके गाये एक गाने की चर्र्चा कर रहे हैं, जो मेरा भी पसंदीदा है- गाने के बोल हैं- मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है। यह फिल्म इजाज़त में शामिल किया गया था, जो वर्ष 1987 में प्रदर्शित हुई थीं। इस फिल्म के लिए आशा भोंसले को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
गाने के बोल सुनकर साफ पता चल जाता है कि ऐसा गाना और कोई नहीं, सिर्फ गुलजार साहब ही लिख सकते हैं। दरअसल यह एक नज़्म है। इस गाने के लिए गुलजार साहब को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
पूरा गाना है-
मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैं
सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैं
वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
पतझड़ हैं कुछ, हैं ना ...
पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट
कानों में एक बार पहन के लौटाई थी
पतझड़ की वो शांख अभी तक कांप रही हैं
वो शांख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे
आधे सूखे, आधे गिले, सुखा तो मैं ले आई थी
गिला मन शायद, बिस्तर के पास पडा हो
वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल
गीली मेहंदी की खुशबू, झूठमूठ के शिकवे कुछ
झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
सब भिजवा दो, मेरा वो सामन लौटा दो
एक इजाजत दे दो बस
जब इस को दफऩाऊंगी
मैं भी वही सो जाऊंगी.....
गुलजार साहब इतनी सादगी और सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है , जैसे कोई अपनी ही कहानी बयां कर रहा है। उनकी लेखन की यह सादगी जैसे रूह को छू लेती है। गुलजार साहब द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आंखों में एक सपना बुन देती है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो गीत की इन पंक्तियों में दिखाई देती है।
फिल्म इजाजत का गाना मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है, आशा भोसले का सबसे पसंदीदा गाना हुआ करता था। एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने कहा था कि ये गाना पंचम (आर. डी . बर्मन) के साथ उनके खूबसूरत रिश्ते की एक बानगी है।। आशा ताई बताती थींं कि जब ये गाना गुलजार साहब ने लिखा था, तो पंचम दा ने कहा था कि पहली बार ऐसा होगा कि कोई गाना अपने बोल की वजह से अखबार की सुर्खियां बनेगा।
गुलज़ार साहब और पंचम दा की जोड़ी ने एक से बढक़र एक गीत दिए हैं। जब गुलज़ार साहब - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है.. नज्म को लिखकर पंचम दा के पास लेकर गए और बोले इस पर गाना बनाना है तो पंचम दा ने कहा यार कल से टाइम्स ऑफ़ इंडिया लेकर आ जाना और बोलना इस न्यूज़ पर भी गाना बनाओ । पहले तुम्हारा गाना तो समझ आए। लेकिन उन्होंने गाने की रुह को समझा और एक प्यारी सी धुन भी बना दी। यह गाना सुनकर ऐसा लगता है जैसे जि़न्दगी से जि़न्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती है।
शायद उस वक्त का यह पहला ऐसा गाना था, जिसमें कोई तुकबंदी नहीं थी । सही मायने में यह नॉन रिमिंग लिरिक्स था। गाने के पाश्र्व में बजता म्यूजिक सॉफ्ट है। इसमें संतूर का इस्तेमाल हुआ है जिसे उल्हास बापट ने बजाया है। उल्लास , वर्ष 1978 से पंचम दा की म्यूजिक टीम से जुड़ गए और 1942 टु लव स्टोरी फिल्म तक साथ रहे। इजाजत के गाने में उल्लास बापट ने कमाल का संतूर वादन किया है। गाने में पंचम दा का ट्रेंड साफ झलकता है। कुछ इसी प्रकार का म्यूजिक फिल्म मौसम में मदन मोहन साहब ने भी तैयार किया था।
फिल्म इजाजत सुबोध घोष की लिखी बांगला कहानी पर आधारित है जिसकी पटकथा गुलजार ने लिखी और निर्देशन भी उन्हीं का था। इसमें नसीरुद्दीन शाह, रेखा, अनुराधा पटेल के अलावा शशि कपूर ने भी काम किया। इस गाने में रेखा और नसीर नजर आते हैं। नसीर, माया(अनुराधा पटे) का लिखा खत पढक़र पत्नी रेखा को सुनाते हैं-
एक दफा वो याद है तुमको, बिन बत्ती जब साईकिल का चालान हुआ था
हमने कैसे भूखे प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी,
हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी दे कर भेज दिया था
एक चवन्नी मेरी थी, वो भिजवा दो....
इसके बाद यह गाना पाश्र्व में बजता है और अनुराधा पटेल गाते हुए अपने प्रेमी से कहती हैं- कि उसने भले ही उसका भौतिक सामान लौटा दिया है, लेकिन अब वह उसके तमाम वो अहसास भी वापस कर दें, जो उसके साथ बिताए क्षणों के साक्षी रहे हंै। यह गाना एक प्रकार से फिल्म की पूरी कहानी का ही निचोड़ है। गाने के अंत में माया कहती हैं-
एक इजाजत दे दो बस
जब इस को दफऩाऊंगी
मैं भी वही सो जाऊंगी.....
पूरी कहानी नसीर-रेखा और अनुराधा पटेल के बीच घूमती है। अनुराधा पटेल यानी माया अपने नाम के अनुरूप एक माया है, जो नसीर की प्रेमिका रहती है, लेकिन नसीर और रेखा की शादी हो जाती है। दोनों की खुशहाल शादीशुदा जिदंगी है। जब भी माया उनकी जिदंगी के बीच आती है, पारिवारिक जीवन में तनाव आ जाता है। आखिरकार एक दिन रेखा, नसीर को छोडक़र चली जाती है और दूसरी शादी कर लेती है। उधर , माया यानी अनुराधा भी आत्महत्या करने का प्रयास करती है और एक दिन हादसे में उसकी मौत हो जाती है। यह फिल्म सामान्तर फिल्म जगत का हिस्सा थी और एक खास वर्ग ने ही उसे पसंद किया था।
मेरा कुछ सामान, नाम से गुलजार साहब ने बाद में अपने गानों का एक अलबम भी निकाला जिसे वर्ष 2005 में सारेगामा कंपनी ने रिलीज किया था। वहीं आशा भोंसले के 75 जन्मदिन पर भी इसी कंपनी ने जो अलबम जारी किया था, उसका नाम भी मेरा कुछ सामान, रखा गया था जिसमें यह गाना शामिल था। मई 2011 में गुलजार की कहानियों पर आधारित जिन नाटकों का मंचन मुंबई और दिल्ली में हुआ था, उस श्रृंखला का नाम भी मेरा कुछ सामान- रखा गया था।









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