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 हिन्दी मिसिंग, हिंग्लिश ऑन एयर

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
आलेख- डॉ. कमलेश गोगिया  ( वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद)
सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता जिसे पूर्व में कलकत्ता (औपनिवेशिक) और कालिकता कहा जाता था, की संस्कृति में टोला, तल्ला और लेन सामाजिक पहचान की नींव है। टोला शब्द किसी खास समुदाय या पेशे की बस्ती को दर्शाता है जबकि लेन का आशय तंग गलियों और तल्ला का अर्थ छायादार वृक्ष के नीचे के स्थान से है। कोलकाता का कालू टोला मोहल्ला, 37 अमरतल्ला लेन, वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से देश में हिन्दी पत्रकारिता की नींव पड़ी। 30 मई, 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की शुरुआत की थी। यह वह दौर था जब भारत स्वतंत्र नहीं था और अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली तथा फारसी भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, उस दौर में हिन्दी भाषा का सामाचार पत्र प्रकाशित करने के साहस के लिए शब्द नहीं मिलते। उदन्त मार्तण्ड जिसका अर्थ उगता हुआ सूर्य होता है, डेढ़ साल तक ही प्रकाशित हो सका। आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए यह पत्र दिसंबर 1827 को बंद हो गया। कारण, अंग्रेजी शासन की नीतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ, फिर हिन्दी के दम पर सरकार से टकराना उस दौर में तो और भी कठिन था। हिन्दी  पत्रकारिता रूकी नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में ही  देश के विभिन्न क्षेत्रों से हिन्दी के अनेक समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक और मासिक स्वरूप में प्रकाशित होने लगे। चाहें राजा राममोहन राय के बंगदूत की बात कर लें या फिर आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के जनक भारतेंदू हरिशंचद्र के कवि वचन सुधा, हरिशंद्र मैग्जीन और हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार सुधावर्षण की। देश के लिए मर-मिटने के जुनून के साथ पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम का अहम हथियार थी। आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय बन गई। फिर तकनीकी क्रांति और डिजिडलीकरण ने हिन्दी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल  कर रख दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। अब तो उदन्त मार्तण्ड का कोई निशां भी बाकी नहीं रहा, जैसा कि लगभग पाँच वर्ष पूर्व राजीव कुमार झा की जागरण की रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट के अऩुसार, “अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था।“  कोशिश होनी चाहिए थी हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना के इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर हिन्दी पत्रकारिता दिवस को हर साल भव्य रूप प्रदान करने की।
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, लेकिन जो परिवर्तन हिन्दी पत्रकारिता में देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा शायद ही कभी की गई होगी। प्रिंटिंग प्रेस और टाइपराइटर से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता आज वेब पोर्टल्स, यू ट्यूब और सोशल मीडिया तक पहुँच गई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया। बाजारवाद और पूंजीकरण के फलस्वरूप मिशन उद्योग बन गया। पत्रकारिता की गंभीरता भी नदारद होती चली गई। भाषा और शैली भी पूरी तरह परिवर्तित हो गई। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हिन्दी पत्राकरिता से हिन्दी मिसिंग है, हिंग्लिश ऑन एयर है। हिन्दी के समाचार पत्र हों या न्यूज चैनल अथवा पोर्टल, हिन्दी और अंग्रेजी के मिश्रण का तड़का अनिवार्य है। दीक्षांत समारोह जैसे शब्द की जह कन्वोकेशन ने ले ली है तो न्यूज रूम में एंकर को परिस्थिति की जगह सिचुएशन बोलना ज्यादा सरल लगता है। किसी कार्पोरेट कंपनी के मिनिट्स की तरह खबरों की हेडलाइन देखी जा सकती है। जैसे हेडलाइन देखिए —
सीएम का मास्टरस्ट्रोक!”
“ऑपरेशन क्लीनअप ऑन!”
“पॉलिटिकल टेम्परेचर हाई!”
“इश्यू का डीप एनालिसिस”
 
हालांकि इसका सकारात्मक  पहलू यह है कि हिन्दी के समाचार पत्र हिन्दी भाषा को बोलचाल के अधिक करीब लाने के उद्देश्य से हिन्दी व्याकरण के साथ अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर वाक्यों का निर्माण करते  हैं जिससे क्लिष्टता कम हो जाए। फिर डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ी खबरें छपने के कारण अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य सा हो गया है। जैसे, हैशटैग, ट्रोल, डाउनलोड, ड्रापडाउन, अपडेट आदि। लेकिन प्रायः क्लिष्टता को कम करने का उद्देश्य अपना मार्ग भटक जाता है। अनेक अवसरों पर जानबूझकर हेडलाइन के साथ पूरे समाचार में हिंग्लिश का प्रयोग किया जाता है, विशेष रूप से पेज-थ्री पत्रकारिता के पुलआउट पृष्ठों में। घोटाले की जगह स्कैम लिखना ज्यादा गौरवपूर्ण समझा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष अंग्रेजी का प्रभाव और वर्चस्व किसी चुनौती से कम नहीं।  बावजूद इसके हिन्दी के डिजिटल पाठकों की संख्या में निरंतर विस्तार हो रहा है क्योंकि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों तक इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच बढ़ गई है। हिन्दी पत्राकारिता की समृद्धि में अहम योगदान ग्रामीण पत्रकारों का है। ग्रामीण पत्रकार मुद्दे को इश्यू नहीं लिखते और न ही स्पर्धा या प्रतियोगिता को कॉम्पटिशन। वे इस तरह के वाक्यों का भी प्रयोग नहीं करते - “रेन अटैक: सिटी लाइफ आउट ऑफ कंट्रोल!” या फिर “हिन्दी हमारी प्राइड है”, “लेट्स प्रमोट हिंदी”, “हिंदी इज़ द फ्यूचर”।  वे प्रायः सरल, सहज और बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में स्थानीय शब्द, लोकजीवन और क्षेत्रीय संवेदनाएँ शामिल होती हैं। इससे हिन्दी पत्रकारिता केवल शहरी अभिजात भाषा नहीं रहती, बल्कि जनसाधारण की भाषा बनी रहती है।
हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र भले ही डेढ़ साल तक ही साँसें ले पाया, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता रूपी जिस ज्योत को शुक्ल जी ने प्रज्जवलित किया, उसकी लौ बीते 200 वर्षों से हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और वेब पोर्टल के माध्यम से आज भी जगमगा रही है। देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाली हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं...

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