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आशा कर्मी : सुर्खियों से दूर संघर्षपूर्ण हालात में स्वास्थ्य सेवा का पहला स्तंभ

नयी दिल्ली. बारिश हो या तपती दोपहरी, आंधी आए या ओले पड़ें या फिर महामारी ही क्यों न फैली हो, महिलाओं का एक समूह तमाम मुश्किलों व चुनौती भरे हालातों के बावजूद भारतीय ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ बन लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है। हम बात कर रहे हैं आशा कर्मियों की। इनका मेहनताना भले कम हो लेकिन मेहनत में कोई कोर-कसर नहीं रखतीं, अधिकतर काम की चर्चा भी नहीं होती लेकिन उससे भी कोई गुरेज नहीं…शायद यही वजह है कि पिछले हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोविड पर नियंत्रण को लेकर इनके प्रयासों के लिये इन्हें सम्मानित किया। देश की 10 लाख मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) स्वयंसेवकों के लिये डब्ल्यूएचओ की तरफ से मिला यह सम्मान वह वैश्विक मान्यता थी जिसकी उन्हें जरूरत थी। आशा कार्यकर्ता दवाएं, टीके, प्राथमिक चिकित्सा देने के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को स्वास्थ्य सलाह देने के अलावा कई अन्य सेवाएं भी देती हैं। लेकिन कम भुगतान, सुविधाओं की कमी और अनियमित काम के समय के खिलाफ उनका संघर्ष जारी है। और क्योंकि वे महिलाएं हैं ऐसे में घर और नौकरी दोनों के बीच संतुलन साधना भी उनके लिये अहम है। उत्तर प्रदेश के बस्ती की एक आशा कार्यकर्ता 42 वर्षीय शैलेंद्री हर सुबह तीन बजे उठती है। जल्दी-जल्दी घर के काम खत्म करती है और फिर घर-घर जाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ निकल जाती हैं। हालांकि उनकी प्राथमिक चिंता है कि घर की जरूरतें कैसे पूरी की जाएं। उन्होंने कहा, “सरकार को हमें एक निश्चित आमदनी देनी चाहिए। बहुत काम है... क्या अधिकारी हमारे द्वारा किए गए काम को देखते हैं? हमने इतनी ईमानदारी से लोगों की सेवा की है, लेकिन केवल खोखली प्रशंसा मिली है।” उन्हें नहीं पता कि उनके जैसी आशा कर्मियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया गया है। बस्ती में आशा कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहीं शैलेंद्री ने कहा, “हमें हर महीने ज्यादा से ज्यादा 10,000 रुपये मिलते हैं। हर दिन कीमतों में बढ़ोतरी के बीच हमसे उस पैसे में अपना काम चलाने की उम्मीद कैसे की जाती है। साथ ही, अपने काम को अपने परिवार से पहले रखकर हम जो व्यक्तिगत त्याग करते हैं... उसे कौन महत्व देता है?” बिहार के भागलपुर जिले के साबोर प्रखंड की आशा कार्यकर्ता सुनीता सिन्हा भी इस बात से इत्तेफाक रखती हैं। उन्होंने कहा कि कई दिन ऐसा भी होता है जब उन्हें मरीज को लेकर अस्पताल भी जाना होता है।
सुनीता ने कहा, “कोई साधन नहीं है और हमें अपने दम पर सब कुछ प्रबंधित करना पड़ता है। साथ ही, हम इतने दबाव में काम करते हैं। ऐसे दिन होते हैं जब हम पूरा दिन चलने में बिताते हैं और पांच मिनट तक नहीं बैठते हैं। लेकिन कोई हमारी इस मेहनत को स्वीकृति नहीं देता।” उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान भी वह अपनी परवाह किए बगैर मरीजों को देखने घर-घर जाती थीं।
 उन्होंने कहा, “मुझे एक वाकया याद है ... हमारे पास मास्क कम थे इसलिए हमने सभी के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते कपड़ों को सेनिटाइज कर मास्क बनाए। अब भी हम लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। टीकाकरण अभियान शुरू होने के दिन से ही हमने टीकाकरण के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद की है।” आशा कार्यकर्ता लाखों ग्रामीणों और स्वास्थ्य प्रणाली के लिए संपर्क का पहला और कभी-कभी एकमात्र बिंदु हैं। वे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत कार्य-आधारित प्रोत्साहन के माध्यम से पैसा कमाती हैं, जिसे केंद्र और राज्य सरकार के बीच 60-40 के अनुपात में वित्त पोषित किया जाता है। ‘ एक न्यूज़ एजेंसी' से बात करने वाली सभी आशा कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे प्रति माह 10,000 रुपये से अधिक नहीं कमाती हैं। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने कहा कि नियमित अग्रिमपंक्ति कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अनुबंध के आधार पर भर्ती किए गए कर्मचारियों के वेतनमान में बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं को समर्थन देने के लिए एक प्रदर्शन-आधारित भुगतान पद्धति शुरू की है। हालांकि, आशा प्रोत्साहन मुख्य रूप से प्रजनन और बाल स्वास्थ्य से संबंधित गतिविधियों पर केंद्रित हैं।

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