चुनावी बिसात पर शह को मात में बदल देने की कला के माहिर रहे हैं अमित शाह
नयी दिल्ली। सड़कों पर अपनी पार्टी के पोस्टर और पर्चे चिपका कर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति तैयार करने वाला ‘चाणक्य' कहा जाता है क्योंकि वह बूथ से लेकर चुनाव मैदान तक प्रबंधन और प्रचार की ऐसी सधी हुई बिसात बिछाते हैं कि मंझे से मंझे राजनीतिक खिलाड़ी भी अक्सर मात खा जाते हैं। शतरंज खेलने से लेकर क्रिकेट देखने एवं संगीत में में गहरी रुचि रखने वाले अमित शाह को राजनीति का माहिर रणनीतिकार माना जाता है । इस वर्ष अक्तूबर में अपने जीवन के छह दशक पूरे करने जा रहे शाह को राज्य दर राज्य भाजपा की सफलता गाथा लिखने का सूत्रधार माना जाता है।
मंगलवार को घोषित आम चुनाव के परिणामों में शाह ने गांधीनगर संसदीय सीट को अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को सात लाख 44 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया। वर्तमान लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल, ओडिशा और दक्षिण भारत में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के लिए उनकी सफल रणनीति को श्रेय दिया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शाह ने विचारधारा की दृढ़ता, असीमित राजनीतिक कल्पनाशीलता और वास्तविक राजनीतिक लचीलेपन का शानदार मिश्रण करके चुनावी समर में भाजपा की शानदार जीत का मार्ग प्रशस्त किया । उन्होंने बिहार और महाराष्ट्र में न केवल राजग के घटक दलों के साथ गठबंधन को लेकर लचीला रुख अपनाया बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रतिद्वन्द्वी दलों के वोट बैंक को अपनी पार्टी के पाले में लाने की रणनीति को अंजाम दिया । चुनाव प्रबंधन के खिलाड़ी शाह ने पहली बार 1991 के लोकसभा चुनाव में गांधीनगर में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रबंधन संभाला था। लेकिन, उनके बूथ प्रबंधन का करिश्मा 1995 के उपचुनाव में तब नजर आया, जब साबरमती विधानसभा सीट पर तत्कालीन उप मुख्यमंत्री नरहरि अमीन के खिलाफ चुनाव लड़ रहे अधिवक्ता यतिन ओझा का चुनाव प्रबंधन उन्हें सौंपा गया। खुद यतिन कहते हैं कि शाह को राजनीति के सिवा और कुछ नहीं दिखता। उनके करीबी बताते हैं कि पारिवारिक और सामाजिक मेल-मिलाप में वह बहुत कम वक्त जाया करते हैं। शाह को कार्यकर्ताओं की अच्छी परख है और वह संगठन व प्रबंधन के माहिर खिलाड़ी हैं। शाह ने पहली बार सरखेज से 1997 के विधानसभा उपचुनाव में किस्मत आजमायी और तब से 2012 तक लगातार पांच बार वहां से विधायक चुने गये। सरखेज की जीत ने उन्हें गुजरात में युवा और तेजतर्रार नेता के रूप में स्थापित किया। उस जीत के बाद वह भाजपा में लगातार सीढ़ियां चढ़ते गए। मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद शाह और अधिक मजबूती से उभरे। 2003 से 2010 तक गुजरात सरकार की कैबिनेट में उन्होंने गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाला। हालांकि उन्हें इस बीच कई सियासी उतार-चढ़ावों का सामना करना पड़ा, लेकिन जब नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर लाया गया तो उनके सबसे करीबी माने जाने वाले अमित शाह को भी पूरे देश में भाजपा के प्रचार प्रसार में शामिल किया गया । शाह जुलाई 2014 से जनवरी 2020 तक भाजपा अध्यक्ष पद का दायित्व संभाला। इस दौरान भाजपा ने कई राज्यों में विजय प्राप्त की। अध्यक्ष पद से हटने के बाद भी शाह पार्टी संगठन में अपनी सक्रियता और रुचि निरंतर बनो रखे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में उन्होंने लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को 80 में से 71 सीटों पर जीत दिलवा कर अपनी राजनीतिक क्षमता भी साबित की। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की कामयाबी के पीछे शाह की रणनीति को महत्वपूर्ण माना जाता है । शाह ने अगस्त 2019 में गृह मंत्री के तौर पर संसद में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के प्रस्ताव के समय जिस तैयारी के साथ विपक्षी पार्टियों की अलोचनाओं की धार को कुंद किया और जिस प्रकार जम्मू कश्मीर में बिना किसी खून-खराबे के इसे लागू करवाया, उससे इनके कुशल प्रशासक होने की छवि काफी मजबूत हुई। शाह ने गृह मंत्री के तौर पर संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) को संसद से पारित करवाने के समय भी काफी दृढ़ता का परिचय दिया।

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