मार्क टली: वो आवाज जिस पर भारत ने भरोसा किया
नयी दिल्ली. पश्चिम बंगाल के टॉलीगंज में 1930 के दशक के अंत में अमीर ब्रिटिश माता-पिता के बच्चे के रूप में मार्क टली को स्थानीय लोगों के साथ घुलने-मिलने की अनुमति नहीं थी। अपने माता-पिता की प्राथमिकताओं के विपरीत टली ने जीवन भर भारत में पत्रकार और पर्यवेक्षक के रूप में काम किया, लोगों के बीच घुलमिल कर उनकी कहानियां सुनाईं और देश के घटनापूर्ण अतीत के कुछ सबसे उल्लेखनीय अध्यायों को भी उजागर किया। प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक और भारत से गहरा जुड़ाव रखने वाले टली का रविवार को यहां एक निजी अस्पताल में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थे और पिछले एक सप्ताह से साकेत के मैक्स अस्पताल में भर्ती थे। टॉलीगंज में 1935 में जन्मे टली ने अपने जीवन का पहला दशक भारत में बिताया, जहां उन्होंने दार्जिलिंग के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की, जिसके बाद उन्हें आगे की शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। वर्ष 2001 में 'नाइटहुड' सम्मान के लिए चुने जाने के बाद 'बीबीसी' के साथ एक साक्षात्कार में टली ने इंग्लैंड को याद करते हुए कहा कि वह "बहुत ही नीरस, अंधेरी जगह थी… जहां भारत का उज्ज्वल आसमान नहीं था।'' कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में धर्मशास्त्र का पाठ्यक्रम करने के बाद, इस युवा ब्रिटिश नागरिक का झुकाव पादरी बनने की ओर था और उन्होंने लिंकन थियोलॉजिकल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन नियति के पास उनके लिए कुछ और ही योजना थी। वर्ष 2020 में यूनेस्को कूरियर को दिए एक साक्षात्कार में टली ने अपने "विद्रोही स्वभाव" को याद करते हुए बताया कि वह सेमिनरी में केवल दो सत्र ही टिक पाए थे। उन्होंने कहा, "मुझे लगता था कि शायद मुझे पादरी बनने की प्रेरणा मिली है। मैं हमेशा से थोड़ा विद्रोही स्वभाव का था, और मुझे सेमिनरी का अनुशासन पसंद नहीं था। साथ ही, मैं बीयर का भी शौकीन था।'' बीबीसी ने अपने लेख में लिखा, "वह काफी शराब पीते थे: अपने 21वें जन्मदिन पर, उन्होंने एक पब में 21 पाइंट बियर खरीदने के लिए 21 शिलिंग का भुगतान किया, और उन्होंने वह सारी बियर पी डाली।" टली का भारत से पुनः परिचय तब हुआ जब बीबीसी ने उन्हें 1964 में नयी दिल्ली में अपना संवाददाता बनाकर भेजा जो अगले 30 वर्षों तक अंग्रेजी प्रसारक के साथ उनके करियर की शुरुआत थी। 35 वर्षीय टली को 1969 में लंदन वापस भेज दिया गया, क्योंकि भारत सरकार ने बीबीसी को भारत में प्रसारण करने से रोक दिया था। यह तब हुआ जब बीबीसी ने ''फैंटम इंडिया'' नामक एक फ्रेंच वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया था जिसमें देश की आलोचना की गई थी। वर्ष 1971 में दिल्ली लौटने के बाद अगले ही वर्ष उन्हें ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया और उन्हें दक्षिण एशिया क्षेत्र को कवर करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिससे भारत में उनके पत्रकारिता करियर का एक और चरण शुरू हुआ। बीबीसी के साथ उनके काम में स्वतंत्रता के बाद के भारतीय इतिहास की ऐतिहासिक घटनाओं का कवरेज प्रमुखता से शामिल है। वर्ष 1971 के बांग्लादेश युद्ध से लेकर 1975-77 के आपातकाल, 1979 में पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, 1984 के सिख विरोधी दंगे, 1991 में राजीव गांधी की हत्या और 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक की घटनाएं इनमें शामिल हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार और पंजाब की समस्या, पत्रकार सतीश जैकब के साथ लिखी गई टली की पहली पुस्तक, "अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल" (1985) के विषय थे। भारत में बिताए अपने वर्षों पर टली की पहली प्रमुख पुस्तक 1988 में "नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया" के रूप में सामने आई, जिसमें देश में उनके दो दशकों से अधिक के काम को 10 निबंधों के संग्रह में समेटा गया था। इसमें ऑपरेशन ब्लू स्टार, रूप कंवर सती मामला, रामानंद सागर की "रामायण" और 1977 के कुंभ मेले सहित कुछ प्रमुख समाचार घटनाओं को शामिल किया गया था। उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा, ''इस किताब में बताई गई कहानियां यह दिखाने में मदद करेंगी कि पश्चिमी सोच ने भारतीय जीवन को कैसे प्रभावित किया है और आज भी कर रही है। वे कहानियां भारत की गरीबी का हल नहीं देतीं, लेकिन यह सुझाव देती हैं कि समाधान खोजने की शुरुआत हमें भारत के भीतर करनी चाहिए।" टली को 1992 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया, ब्रिटिश सरकार ने न्यू ईयर ऑनर्स 2002 में उन्हें 'नाइट' की उपाधि से नवाजा और 2005 में उन्हें पद्म भूषण प्राप्त हुआ। वर्ष 1994 में एक ऐसी घटना के बाद बीबीसी के साथ उनका जुड़ाव आंशिक रूप से समाप्त हो गया, जिसे उनकी पत्रकारिता की ईमानदारी का प्रतिबिंब माना जा सकता है। बर्मिंघम में रेडियो अकादमी को दिए गए एक व्याख्यान में टली ने कहा कि जॉन बर्ट के नेतृत्व में बीबीसी के कर्मचारियों में "वास्तविक रूप से भय का माहौल" है। इसके जवाब में, बर्ट ने मार्क टली के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वह "पुराने सैनिक हैं जो अपने मस्कट बंदूकों से हम पर निशाना साध रहे हैं।" टली ने जुलाई 1994 में बीबीसी से इस्तीफा दे दिया, लेकिन अप्रैल 2019 में बंद होने तक, बीबीसी के रेडियो 4 पर आध्यात्मिकता पर आधारित कार्यक्रम "समथिंग अंडरस्टुड" को प्रस्तुत करते रहे। किसी भी समाचार मीडिया में प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत न होते हुए भी टली दिल्ली में एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय रहे और भारत की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के गहन पर्यवेक्षक बने रहे। वर्ष 2002 में प्रकाशित उनकी एक और उल्लेखनीय कृति "इंडिया इन स्लो मोशन" में टली ने हिंदू अतिवाद से लेकर बाल श्रम, सूफी रहस्यवाद से लेकर कृषि संकट, राजनीतिक भ्रष्टाचार की निरंतरता और कश्मीर की समस्या तक, विविध विषयों को शामिल किया है। इस किताब को उन्होंने अपनी साथी जिलियन राइट के साथ मिलकर लिखा था। कुल 10 किताबों में, गल्प और कथेतर दोनों में, टली का भारत लगातार पसंदीदा विषय बना रहा। "इंडियाज अनएंडिंग जर्नी" (2008) में टली भारत की विविधता का विश्लेषण करते हैं, जबकि "इंडिया: द रोड अहेड" भारत के भविष्य का एक चिंतनशील और जमीनी आकलन है। उनकी दो गल्प रचनाएं, "द हार्ट ऑफ इंडिया" (1995) और "अपकंट्री टेल्स: वन्स अपॉन अ टाइम इन द हार्ट ऑफ इंडिया" (2017), भारतीयता से परिपूर्ण कहानियों का संग्रह हैं। चौबीस अक्टूबर को टली के 90वें जन्मदिन पर, उनके बेटे सैम टली ने 'लिंक्डइन' पर पत्रकारिता में अपने पिता के लंबे योगदान को याद किया। सैम ने लिखा, ''मुझे लगता है कि मेरे पिता की उपलब्धियां ब्रिटेन-भारत संबंधों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दोनों देशों के प्रति उनका अटूट लगाव और स्नेह है। हालांकि वह भारत में रहते हैं, लेकिन ब्रिटेन से भी उनके गहरे संबंध हैं। 'दिल है हिंदुस्तानी, मगर थोड़ा अंग्रेज़ी भी!' पोस्ट पर प्रतिक्रिया में कई लोगों ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस पर टली को सुनने की अपनी यादों को ताजा किया और बताया कि कैसे उन्हें किसी खबर की सत्यता पर भरोसा हुआ और उन्हें "सत्य की आवाज" कहा गया। संजय दिघे ने लिखा, ''1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, मेरा परिवार पाकिस्तान सीमा के पास रहता था। हम दोनों तरफ से प्रसारण सुनते थे। लेकिन जब तक हम मार्क टली को वर्ल्ड सर्विस पर सुन नहीं लेते, तब तक हमें किसी बात पर यकीन नहीं होता था! न सिर्फ युद्धकाल में, बल्कि जब भी वह प्रसारण करते थे, हम उन पर सरकारी प्रसारक से भी ज़्यादा भरोसा करते थे। वह सत्य की आवाज़ थे।" बीबीसी के पूर्व पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी ने टली के साथ काम करने के अपने दिनों को याद किया, खासकर अयोध्या विवाद के दौरान। उन्होंने लिखा, ''मुझे अयोध्या विवाद और चुनावों सहित कई खबरों पर उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। मुझे लगता है कि वही एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें मेरे घर में रोजाना अपनी बीयर पीने की छूट है, क्योंकि मैं शराब नहीं पीता। हनुमान जी से प्रार्थना करें कि वह उन्हें अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करें।"


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