घर की चौखट पर कदम रखते ही बोलिए मातृभाषा: कालेले
- मराठी भाषा दिवस पर महाराष्ट्र मंडल में हुई संगोष्ठी, वक्ताओं ने कहा- मराठी हमारी मां, तो हम क्यों छोड़ रहे हैं अपनी मां को
रायपुर। नए नियम बना लीजिए, घर की चौखट पर कदम रखते ही आपको अपनी मातृभाषा ही बोलनी पड़ेगी, नहीं तो परिवार का कोई भी सदस्य आपकी किसी भी बात या सवाल का जवाब ही नहीं देगा। यह नियम हमारे परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है। यही कारण है कि आज भी मेरे नाती- पोते भी मराठी में बात करते हैं। मराठी भाषा दिवस पर प्रा. अनिल श्रीराम कालेले ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित संगोष्ठी में इस आशय के विचार व्यक्त किए।
प्रा. कालेले ने कहा कि हमारे बीच यह धारणा है कि पुणे के लोग प्रामाणिक मराठी बोलते हैं। विदर्भ, कोकण, खानदेश, मालवाणी, मुंबई की मराठी ऐसी ही है। मेरा कहना है हम कौन होते हैं की मराठी को प्रामाणिक और किसी की मराठी को चलताऊ कहने वाले। कम से कम उन लोगों ने अपनी मातृभाषा को छोड़ा तो नहीं है। मराठी बोल तो रहे हैं और यही प्रशंसनीय है।
प्रा. अनिल ने कहा कि मेरे सामने भी यह स्थिति यदाकदा बनते रहती है। जैसे सामने वाले वहिणी बोल रहे हैं, जबकि सही शब्द वहिनी (भाभी) है। अब उनकी गलती सुधारो तो बुरा लगता है। इसलिए खामोश रहकर इतनी तसल्ली कर लेते हैं कि कम से कम मराठी में तो बात हो ही रही है। प्रा. कालेले ने कहा कि फिर भी हमें याद रखना चाहिए कि मराठी अभिजात भाषा है। अभिजात का आशय रिफाइंड या पॉलिश्ड है, जो एक प्रकार से एलीट क्लास के लिए है।
वरिष्ठ सभासद शशि वरवंडकर ने कहा कि मराठी हमारी मां है। यदि हम ही अपनी मां का सम्मान नहीं करेंगे, तो बाहर का कोई व्यक्ति आकर हमारी मां का आदर क्यों करेगा। हमें दो हजार साल पुरानी अपनी मराठी भाषा का अभिमान होना चाहिए। मराठी का ज्ञान बढ़ाने के लिए मराठी की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। इसके लिए महाराष्ट्र मंडल में लाइब्रेरी भी है।
सबसे पहले कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिकेत ठोके ने पावर प्रेजेंटेशन के माध्यम से मराठी के इतिहास की ज्ञानवर्धक जानकारी दी। डॉ. ठोके ने बताया कि भारत में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा मराठी है। पहले नंबर पर हिंदी और दूसरे नंबर पर बंगाली है। इस मौके पर उन्होंने बड़े पर्दे पर छत्रपति शिवाजी महाराज के हस्तलिखित पत्र भी दिखाए और मराठी के महत्व को समझाया।
शादी के बाद अपने अनुभवों को साझा करते हुए सुरेखा पाटिल ने कहा कि भोपाल से यहां आने के बाद जब मेरी मुलाकात मराठी भाषियों से होती थीं, तो मुझे इस बात का आश्चर्य होता था कि वे मुझसे हिंदी में क्यों बात कर रहे हैं। चर्चा करते- करते मैं उन्हें मराठी बोलने पर ले ही आती थी।
अध्यक्षीय संबोधन में मंडल अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने कहा कि महाराष्ट्र मंडल पद्मजा लाड के माध्यम से कोरोना काल से मराठी भाषा की ऑनलाइन क्लास ले रहा है। छह साल से क्लास में शामिल होने के लिए मिलने वाली राशि वे मंडल को ही डोनेट करती हैं। मराठी भाषा को सिखाने के लिए उनका समर्पण प्रेरणास्पद है। काले ने कहा कि पहले मंडल में मराठी अखबार आते थे अब रायपुर में मराठी के समाचार पत्र नहीं आ रहे हैं। फिर भी मराठी की साहित्यिक किताबों की उपलब्धता तो यहां है। हमारे सभासद मराठी की किताबें पढ़ने लगेंगे, तो निश्चित ही हम उन्हें बेहतर पुस्तकें उपलब्ध कराएंगे।
कार्यक्रम का संचालन साहित्यिक समिति की प्रभारी कुमुद लाड ने किया। पद्मजा लाड ने मराठी की ऑनलाइन क्लास के संदर्भ में जानकारी देते हुए अपने अनुभव साझा किए। इस मौके पर मराठी निबंध स्पर्धा के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया गया। पुरस्कृत किए गए विजेताओं में 17 वर्ष आयुवर्ग में प्रथम कृष्णराज गणेशा जाधव, द्वितीय अनय पंडित 30 आयुवर्ग में प्रथम वैष्णवी काले, द्वितीय श्रुति आभास करकशे, 30 वर्ष से अधिक आयुवर्ग में जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा के कारण लगभग सभी स्थानों के लिए संयुक्त विजेता घोषित किए गए। इसमें सुरभि मकरंद गोखले, स्मिता मोहित चांदे, अनघा दिनकर करकशे, द्वितीय सुरेखा पाटिल, सरिता फड़के, अंजलि खेर, सुप्रिया शेष, तीसरे स्थान पर मंगल गणेशा जाधव, गणेशा जाधव पाटिल रहे। अभय भागवतकर, अक्षता पंडित, अमृता आशीष शेष और प्रतिज्ञा अय्यर को सांत्वना पुरस्कार दिया गया।
इस मौके पर गीता दलाल, श्याम सुंदर खंगन, परितोष डोनगांवकर, दीपक पात्रीकर, प्रशांत देशपांडे, नवीन देशमुख, विजय लाड, दिनकर करकशे, अपर्णा कालेले, प्रवीण क्षीरसागर पद्मजा लाड सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।


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