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अहंकार की आग में जलता संवाद और राख बनता अस्तित्व

 -डॉ. नीरज गजेंद्र
 बहुत पुरानी बात है। एक पक्षी था भारूंड। उसके दो सिर थे, पर शरीर एक ही। दोनों सिरों की अपनी-अपनी सोच, अपनी-अपनी जिद, अपनी-अपनी पहचान। समस्या यह नहीं थी कि वे अलग सोचते थे; समस्या यह थी कि वे साथ सोच नहीं पाते थे। एक दिन एक सिर को स्वादिष्ट फल मिला। उसने कहा मैंने पाया है, मैं ही खाऊंगा। दूसरे ने कहा हमारा शरीर एक है, तो हिस्सा भी साझा होना चाहिए। पर पहला नहीं माना। उसने फल अकेले खा लिया। दूसरे के मन में चोट लग गई। अपमान की आग भीतर ही भीतर सुलगती रही।
 कुछ दिन बाद दूसरा सिर एक फल उठा लाया। पहला घबरा गया, कहा यह फल जहरीला है, मत खाओ। पर इस बार दूसरे ने जिद पकड़ ली, उस दिन मेरा स्वाद नहीं पूछा था, आज मैं भी नहीं पूछूंगा। और उसने विषैला फल खा लिया। कुछ ही देर में पूरा शरीर तड़प-तड़प कर मर गया। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल में कहानी तो हमारे भीतर यहीं से शुरू होती है। हम सबके भीतर भी दो सिर हैं। एक कहता है मुझे चाहिए, अभी चाहिए। दूसरा कहता है रुको, सोचो, समझो। एक अहंकार है, दूसरा विवेक। जब अहंकार हावी हो जाता है, तो विवेक की आवाज हमें कड़वी लगने लगती है। हम वही करते हैं जो उस समय अच्छा लगता है, भले बाद में उसका परिणाम जहरीला निकले।
 धर्म हमें सबसे पहले यही सिखाता है कि जीवन अलग-अलग टुकड़ों में नहीं बंटा है। परिवार हो, समाज हो या राष्ट्र, सब एक ही शरीर की तरह हैं। महाभारत में कौरव और पांडव अलग-अलग दल थे, पर वंश एक था। जब संवाद टूटा, तो युद्ध हुआ। युद्ध में कोई सचमुच जीतता नहीं; हार सबकी होती है। यही बात हम अपने घरों में भी देख सकते हैं, जब ईगो टकराते हैं, तो रिश्ते टूटते हैं। और जब रिश्ते टूटते हैं, तो जीतने वाला भी भीतर से खाली रह जाता है।
 आध्यात्म हमें भीतर झांकना सिखाता है। श्रीमद्भगवद्गीता का पूरा संवाद मन के द्वंद्व को शांत करने का उपाय ही तो है। अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा है, पर असली लड़ाई उसके भीतर चल रही है। तभी श्रीकृष्ण उसे समझाते है कि अपने कर्तव्य को पहचानो, मोह और क्रोध से ऊपर उठो। अगर अर्जुन भी जिद पकड़ लेता, तो परिणाम अलग होता। आध्यात्म कहता है असली जीत बाहर नहीं, भीतर होती है। पुराणों में अहंकार के उदाहरण भरे पड़े हैं। रामायण के रावण को ही देख लीजिए। विद्वान था, तपस्वी था, पर जिद और अभिमान ने उसे अंधा बना दिया। समझाने वाले थे, पर उसने किसी की नहीं सुनी। आखिरकार उसका अंत हुआ। यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ। शक्ति थी, सामर्थ्य था, पर भीतर का विष उसे ले डूबा।
 अब जरा आज के समय को देखिए। हमारे पास तकनीक है, साधन हैं, जानकारी है। पर क्या हमारे भीतर संवाद है? परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो जाता है। दफ्तरों में टीम के लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। राजनीति में दल एक-दूसरे को खत्म करने की होड़ में रहते हैं। नतीजा? विकास की जगह टकराव, शांति की जगह तनाव। भारूंड की तरह हम भी भूल जाते हैं कि शरीर एक है। अगर एक हिस्सा जलता है, तो पूरा शरीर दर्द महसूस करता है। अगर हम बदले की आग में कुछ गलत कदम उठा लें, तो उसका असर दूसरे पर ही नहीं पड़ता, हम खुद भी उसके शिकार होते हैं।
 धर्म, आध्यात्म और आधुनिकता तीनों को अलग-अलग देखने की जरूरत नहीं है। धर्म हमें सही-गलत का आधार देता है। आध्यात्म हमें भीतर से मजबूत बनाता है। आधुनिकता हमें साधन देती है। पर अगर इन तीनों के बीच तालमेल न हो, तो असंतुलन पैदा होता है। जैसे भारूंड के दो सिर अलग-अलग दिशा में खींच रहे थे, वैसे ही जब हमारा मन और बुद्धि अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं, तो जीवन की गाड़ी डगमगाने लगती है।
 असल सवाल यह नहीं है कि हमारे भीतर मतभेद क्यों हैं। सवाल यह है कि हम उन्हें कैसे संभालते हैं। क्या हम हर असहमति को अपमान मान लेते हैं। क्या हम हर चोट का जवाब चोट से देना चाहते हैं। या हम रुक कर सोच सकते हैं कि हमारा लक्ष्य क्या है। भारूंड की मौत चेतावनी देती है कि अहंकार और बदले की भावना अंततः आत्मघाती होती है। अगर हम सच में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो हमें संवाद सीखना होगा, धैर्य रखना होगा, और यह समझना होगा कि जीत वही है जिसमें सबका भला हो। क्योंकि अंत में, हम सब एक ही शरीर का हिस्सा हैं। और जब हम खुद से ही लड़ते हैं, तो हार भी हमारी ही होती है।
 (लेखक, एक प्रखर विश्लेषक, चिंतक और समसामयिक विषयों के मर्मज्ञ हैं, जो तथ्य और तर्क पर आधारित संवाद को समाज में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।)

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