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 खेत बचाओ अभियान: नील हरित शैवाल से मिट्टी की सेहत संवार रहे लब्जी नावापारा के किसान धनेश्वर प्रसाद

-रासायनिक खाद छोड़ जैविक खेती की ओर बढ़े, अन्य किसानों से भी की जैविक खेती अपनाने की अपील
 रायपुर  / खेती में रासायनिक खादों के बेहिसाब प्रयोग से मिट्टी की कम होती उपजाऊ क्षमता के बीच सरगुजा जिले में अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत लब्जी, नावापारा के एक प्रगतिशील किसान श्री धनेश्वर प्रसाद ने एक नई और सकारात्मक राह चुनी है। 6 एकड़ कृषि भूमि के मालिक श्री धनेश्वर अब रासायनिक खादों का मोह छोड़कर पूरी तरह से जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा चुके हैं और क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए एक बेहतरीन प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। श्री धनेश्वर प्रसाद बताते हैं कि वे पहले अपनी खेती में केवल रासायनिक खादों का ही प्रयोग करते थे, जिससे हर साल खाद की मात्रा बढ़ानी पड़ती थी और जमीन की उपजाऊ शक्ति लगातार कम हो रही थी। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने कृषि विस्तार विभाग से संपर्क किया और अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण कराया। परीक्षण रिपोर्ट में मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी पाई गई। विभागीय अधिकारियों ने उन्हें मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ’नील हरित शैवाल’ (Blue-Green Algae) से खेती करने की तकनीकी सलाह दी।
 कृषि विभाग के मार्गदर्शन पर अमल करते हुए धनेश्वर जी ने नवाचार किया और अपने घर के बाड़ी में ही एक टैंक का निर्माण कर नील हरित शैवाल का उत्पादन शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि इस टैंक से लगभग 25 किलो नील हरित शैवाल का उत्पादन प्राप्त होगा। इसे खेतों में डालने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति होगी और जमीन की सेहत में सुधार आएगा।
 जैविक खेती के दूरगामी फायदों का उल्लेख करते हुए श्री धनेश्वर प्रसाद ने बताया कि यह कदम केवल वर्तमान फसल को बचाने के लिए नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य और उनके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए भी है। उन्होंने बताया कि जैविक खेती से जमीन उपजाऊ बनती है और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। साथ ही मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरने से फसल उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होगी। उन्होंने बताया कि रासायनिक खादों के दुष्प्रभाव से फैलने वाली बीमारियों में कमी आएगी और शुद्ध व पौष्टिक आहार मिलेगा।
 पर्यावरण और खेत बचाओ अभियान की इस मुहिम में जुटे धनेश्वर प्रसाद का मानना है कि जैविक खेती को और अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने क्षेत्र के अन्य कृषक बंधुओं से भी अपील की है कि वे भी रासायनिक खेती का त्याग कर जैविक खेती को अपनाएं और अपनी खेती, मिट्टी और आने वाली पीढ़ी को बचाएं।

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