ब्रेकिंग न्यूज़

 600 किलो की शिवाजी प्रतिमा को 20 लोगों ने पांच घंटे की मशक्‍कत के बाद किया स्‍थापित

0- महाराष्ट्र मंडल में शिवाजी महाराज की सिंहासनस्थ प्रतिमा को प्रतिष्ठित करने की कहानी
रायपुर। छत्रपति शिवाजी महाराज का व्‍यक्तित्‍व जितना भव्‍य, उतनी की भारी भरकम उनकी प्रतिमा। जी हां... बात हो रही है महाराष्‍ट्र मंडल भवन में शिवाजी राज्‍याभिषेक दिवस पर प्रतिष्ठित की गई छत्रपति शिवाजी की संगमरमर के एक पत्‍थर पर तराशी गई खूबसूरत प्रतिमा की, जिसका वजन करीब 600 किलो है। इस प्रतिमा को राजस्‍थान से यहां लाकर किसी तरह मंडल भवन के प्रथम तल तक क्रेन की मदद से पहुंचाया तो गया, लेकिन बाद जब इसी प्रतिमा को निर्धारित प्‍लेटफार्म पर रखने की आई तो, एक तरह से सारी इंजीनियरिंग फेल लग रही थी।  
महाराष्ट्र मंडल भवन के सह प्रभारी शचिंद्र देखमुख ने बताया कि दिनभर बिजली के ट्रांसफार्मर चढ़ाने- उतारने पर उन्‍हें फि‍ट करने का काम करने वाले अनुभवी 10 कामगार को विशेष रूप से बुलाया गया। इनके साथ महाराष्‍ट्र मंडल के कर्मचारियों ने भी प्रतिमा को सिर्फ तीन फिट ऊपर चढ़ाने के लिए तकरीबन पांच घंटे भारी मशक्‍कत की। देशमुख के अनुसार भिलाई से ट्रक पर लोडकर 600 किलो वजनी मूर्ति को महाराष्ट्र मंडल परिसर लाया गया। यहां क्रेन की मदद से मूर्ति को प्रथम तल के लॉन एरिया तक पहुंचा दिया गया। 
शचिंद्र के अनुसार लॉन एरिया से प्रतिमा स्थापित होने वाले स्थल तक मूर्ति को पाइप और लकड़ी के बेलन के सहारे एक घंटे की मशक्त के साथ लाया गया। घंटेभर की जी तोड़ मेहनत के बाद शिवाजी प्रतिमा को 10 लोग मात्र 20 फीट ही खिसका पाए। फिर शुरू हुआ प्रतिमा को सुनिश्चित प्‍लेटफार्म पर रखने का टास्‍क। शचिंद्र ने बताया कि लकड़ी के बॉक्स को खोलकर प्रतिमा को बाहर निकाला गया। एक पीस संगमरमर पत्थर में तैयार 600 किलो की इस प्रतिमा को पूरी नजाकत व सावधानी के साथ जमीन से तीन फीट उठाना था। इसके लिए बृहन्महाराष्ट्र मंडल के छत्तीसगढ़ कार्यवाह सुबोध टोले, दिव्य महाराष्ट्र मंडल के सह प्रभारी कुणाल दत्त मिश्रा, प्रकाश गुरव, नारायण सहित अन्य सदस्यों और 10 अनुभवी कामगारों ने यह जिम्मा अपने कंधों पर लिया। मूर्ति को शिफ्ट करने के लिए पहले मूर्ति को रस्सी से बांधकर कांवर की तरह उठाकर रखने की योजना बनीं, लेकिन जगह और बल की कमी के कारण यह प्रयास कारगर कार्य नहीं हो सका।  
सुबोध टोले ने बताया कि इसके बाद मूर्ति का निर्माण करने वाले शिल्‍पकार कुशल उजाला भी दुर्ग से यहां पहुंच गए। फिर नए सिरे से मूर्ति को चढ़ाने की योजना बनी। इस बार पेवर ब्लाक, ईंट और ट्रकों में इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोलिक जेक का इस्तेमाल किया गया। मूर्ति को तिरछा कर पहले एक सिरे पर कुछ ईंटें रखी गई। फिर मूर्ति को दूसरी ओर झुकाकर दूसरी ओर ईंट रखी गई। इस आधे घंटे के प्रयास के बाद मूर्ति जमीन से छह इंच ऊपर पहुंच गई। 
टोले के मुताबिक प्रतिमा को चढ़ाने के लिए यहां से शुरू हुआ हाइड्रोलिक जेक के काम। भारी वजन (ट्रक के एक हिस्से) को उठाने की क्षमता वाले दो जेक को मूर्ति के ठीक नीचे लगाया गया। एक जेक को सुबोध टोले औऱ दूसरे को कुणाल मिश्रा ने नियंत्रित कर प्रतिमा को उठाना शुरू किया। अन्य सहयोगी जेक के साथ उठती प्रतिमा के नीचे ईंटे के ऊपर ईट लगाते रहे। काफी मशक्कत के बाद प्रतिमा ढाई फिट ऊंचाई पर आई तो उसे टिकाने के लिए एक तखत लाया गया, जिस पर प्रतिमा का सैकड़ों किलो का वजन पड़ते ही तखत आगे बढ़ने लगा। तत्‍काल उस पर कई पदाधिकारी सवार हो गए। तत्‍पश्‍चात प्रतिमा को शेष छह इंच और ऊपर उठाने के लिए खासी मशक्‍कत करनी पड़ी। 
टोले के अनुसार इस दौरान मूर्ति पर बैलेंस बनाए रखने का पूरा जिम्मा शचिंद्र और उनकी टीम ने बखूबी निभाया। फिर ‘जय भवानी जय शिवाजी’ जयघोष के साथ शिवाजी प्रतिमा को निर्धारित प्लेटफार्म पर चढ़ाकर पीछे की ओर खिसका कर तय स्थान पर स्थापित किया गया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले वहां पूरी जीवटता के साथ खड़े रहे और ईंट देने में मदद करने के साथ हौसला आफजाई करते रहे।
 

Related Post

Leave A Comment

Don’t worry ! Your email address will not be published. Required fields are marked (*).

Chhattisgarh Aaj

Chhattisgarh Aaj News

Today News

Today News Hindi

Latest News India

Today Breaking News Headlines News
the news in hindi
Latest News, Breaking News Today
breaking news in india today live, latest news today, india news, breaking news in india today in english