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सुराजी योजना: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती आयी


लेख: शशिरत्न पाराशर
महासमुंद। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बावजूद यहां के मूल निवासी एवं रहवासियों को विकास का वो लाभ नहीं मिल सका, जिनके वे असली हकदार थे। गिरता हुआ भू-जल स्तर, खेतीं में लागत की बढ़ोत्तरी, मवेशी के लिए चारा संकट, आदि ने स्थिति को और भयावह बना दिया। साल 2018 के अन्त माह में नई सरकार के गठन के बाद से यह छत्तीसगढ़ में विकास की ब्यार बही तो महासमुन्द भी इससे अछूता नहीं रहा। राज्य शासन की सुराजी योजना नरवा, गरूवा, घुरवा अउ बाड़ी छत्तीसगढ़ की नई पहचान बनी। नरवा (नाला), गरवा (पशु एवं गोठान), घुरवा (उर्वरक) एवं बाड़ी (बगीचा) इनका संरक्षण आवश्यक है। इस योजना के माध्यम से भू-जल रिचार्ज, सिंचाई और ऑर्गेनिक खेती में मदद, किसान को दोहरी फसल लेने में आसानी हुई। पशुओं को उचित देखभाल सुनिश्चित हो सकी। परंपरागत किचन गार्डन एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती आयी है तथा पोषण स्तर में भी सुधार देखा गया है। अब हम पुरातन संस्कृति और सरोकारों को सहेज कर रखने के काम की ओर भी लौट रहंे हैं।
       छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजना नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी के अंतर्गत महासमुंद जिले की बात करें तो यहाँ पहले चरण में 65 गौठान निर्माण की अनुमति दी गई थी। जिनकी संख्या बढ़ कर 558 हो गई है। इनमें पंजीकृत पशुपालक 10463 है। इनमें माह सितम्बर तक 28713 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन हुई। वहीं 27908 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री की गई। इससे स्व-सहायता समूह को 88.86 लाख रुपए की राशि प्राप्त हुई। गरूवा कार्यक्रम के तहत महासमुंद जिले की ग्राम पंचायत में गौठान बननें से मवेशियों को आश्रय मिला है और अब सड़को पर मवेशियों का विचरण कम हुआ है। गौठान में ग्रामीणों द्वारा चारे के दाने के साथ-साथ मवेशियों के उचित प्रबंधन, देखरेख के लिए ग्राम स्तर पर गौठान प्रबंधन समिति का चयन किया गया है, जिनके द्वारा गौठान का संचालन प्रारंभ कर दिया गया है। जिसमें पशु अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन कर गोबर से आधुनिक खाद तैयार करने, गौ-मूत्र से कीटनाशक तैयार करने एवं गौठान स्थल पर विभिन्न प्रकार के आर्थिक गतिविधि संचालित है। ग्राम गौठान प्रबंधन समिति के सदस्यों द्वारा गौठान का संचालन करने से अब मवेशी एक जगह सुव्यवस्थित रूप से एकत्र रहते हैं। मवेशियों से फसल सुरक्षित होने से किसान भी निश्चिंत हैं साथ ही दुर्घटनाओं में भी कमी आयी है।
यह योजना पूरे प्रदेश भर में लागू है। बाड़ी लगाने के लिए मनरेगा से सहायता दी जा रही है तो वहीं स्व-सहायता समूहों की महिला एवं समाज कल्याण के ओर से मदद दी जा रही है। ग्रामीण खुद ही आगे बढ़कर मदद कर रहे हैं। गांवों में आवारा मवेशी की समस्या कम हो रही है, इसलिए किसान दूसरी एवं तीसरी फसल लगाने को लेकर भी उत्साहित और ललायित है। इस योजना कार्य से गांव के महिला स्व-सहायता समूहों और युवाओं को जोड़ा जा रहा है। इस योजना से पशुओं से फसल बचाने के लिए खेतों को घेरने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किसानों को जैविक खाद उपलब्ध हो रहा है तो वहीं कृषि लागत भी कम हुई ह। लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलें। प्रदेश में पहले चरण में दो हजार गौठानों के निर्माण की स्वीकृति दी गई है। वर्तमान में इनकी संख्या में बढ़ोतरी की गई।
गौठानों में पशु अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन कर गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद के साथ ही विभिन्न प्रकार के आर्थिक गतिविधियां संचालित है। ग्राम गौठान प्रबंधन समिति के सदस्यों द्वारा गौठान का संचालन करने से अब मवेशियों से फसल सुरक्षित होने से किसान भी निश्चिंत है। साथ ही दुर्घटनाओं में भी कमी आयी है। माह सितम्बर तक मवेशियों के चराई हेतु जिले में कुल 1115 एकड़ में 296 चारागाह के लिए राशि स्वीकृत की गयी है। इनमें 112 पूर्ण, वही 88 प्रगतिरत् है, शेष अप्रारम्भ है। जिले के 139 गौठानों में पशुओं के पौष्टिक हरे चारे के लिए 6,32,400 नेपियर रूट की व्यवस्था की गयी है। जो चयनित गौठानों में उपलब्ध जमीन उपलब्धता के आधार पर कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा 22 गौठानों में 1,36,000 नेपियर रूट चारा उत्पादन की व्यवस्था की गयी है।
 इसके अलावा स्वयं की व्यवस्था से 7 गौठानों में 46,400 नेपियर रूट लगाया गया। तो वही पशुधन विभाग द्वारा 110 गौठानों में 4,50,000 नेपियर रूट चारा उत्पादन की व्यवस्था की गयी है। इसके साथ ही मनरेगा अंतर्गत 122 नवीन चारागाह रकबा 256 एकड़ स्वीकृत किया गया है। जिसमें 13 लाख नेपियर रूट लगाने की कार्ययोजना है। ताकि मवेशियों को पूरे वर्ष हरे चारे की उपलब्धता हो सके। यह योजना पूरें प्रदेश में लागू है। बाड़ी लगाने के लिए मनरेगा से सहायता दी जा रही है। तो वही स्व-सहायता समूहों को महिला एवं समाज कल्याण की ओर से मदद दी जा रही है। ग्रामीण खुद ही आगे बढ़कर मदद कर रहें हैं। गांवों में आवारा मवेशियों की समस्या कम हो गयी है। इसलिए किसान दूसरी एवं तीसरी फसल लगाने को लेकर उत्साहित और ललाइत है। योजना के तहत गरूवा के आस-पास के ग्रामों के किसानों द्वारा गौठानों के लिये स्वेच्छा से पैरा दान भी किया जा रहा है। लाए गए पैरा से भरे ट्रेक्टर गौठानों की आते देखें जा सकतेे है। किसानों के इस कार्य की सराहना की जा रही है। बाड़ी योजना में किसानों के घरों की बाड़ी में सब्जियों और मौसमी फलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पौष्टिक आहार उपलब्ध हो रहा है। वहीं शाला-आश्रमों, आंगनबाड़ी केंद्रो की खाली पड़ी जमीन पर किचन गार्डन बच्चों द्वारा तैयार कर हरी सब्जी-भाजी का उपयोग कियागया। वर्तमान में देशव्यापी लॉकडाउन के चलते अभी ये संस्थाएं बंद है।

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