मदनोत्सव
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
मदनोत्सव का असर हर शै पर दिखाई दे रहा था । पथ खूबसूरत पुष्पों से सुसज्जित थे । टेसू के फूलों से आसमान दूर तक रंगे हुए दिखाई दे रहे थे । भौंरे मधुरस का पान करने के लिए फूलों के चक्कर काट रहे थे...प्रकृति के इस खुशनुमा वातावरण के साथ प्रत्येक जीव खुशी मना रहा था । मन का उत्साह छलका जाता था ..शीतल , मंद पवन देह में सिहरन उत्पन्न कर रही थी ।थका-हारा सूरज घर जाने की तैयारी में था , साँझ लाज की अबीर से ढकी नवयौवना सी सुन्दर लग रही थी । इस प्रेममयी वातावरण में भी राधा कृष्ण की उपेक्षा से दुःखी होकर मुँह फुलाए उपवन में बैठी थी और कृष्ण सब कुछ भूल गोप-मित्रों के साथ व्यस्त थे । गोपियाँ राधा को बुलाने आई थी पर राधा कहाँ मानने वाली थी...एकांत में ही बैठी रही... जिसने नाराज किया उसे तो कोई फर्क नहीं पड़ा । हरसिंगार के फूल झरने लगे थे मानो किसी के लिए सेज तैयार कर रहे हों । मधुमालती के फूलों से सुगन्धित शाम मादक हो रही थी... आखिर कृष्ण को राधा की कमी महसूस होने लगी और उन्होंने अपनी बाँसुरी होठों पर लगा ली व छेड़ दी मधुर तान । प्रेम की धुन पर सब नृत्य करने लगे...लताएँ , पुष्प , शाखें , जीव - जंतु , चर , अचर सब प्रेम की लय पर झूम उठे ।
राधा कब तक रोके रखती अपने - आप को..दौड़ पड़ी कृष्ण की राधे - राधे पुकारती धुन की ओर....वृंदावन में प्रेम - रास चरम पर पहुँच गया था । आनन्द की मानो बारिश सी होने लगी चहुँ ओर...ऋतुराज वसन्त ने आकर रुख ही बदल दिया था संसार का...चाँद अपनी किरणों के द्वारा धरा को प्रेम , उत्साह , खुशी से सींच रहा था ।










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