महिलाओं के सक्षम होने का मतलब यह नहीं कि उन पर हर जिम्मेदारी डाल दी जाए: मोहन भागवत
नयी दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि महिलाएं सक्षम हैं, उन पर हर जिम्मेदारी नहीं डाल दी जानी चाहिए। भागवत ने साथ ही कहा कि परिवार को एक टीम की तरह कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार में जिम्मेदारियों का बंटवारा होना चाहिए और यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं की आकांक्षाएं कहीं खो न जाएं। शुक्रवार को यहां विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 'युगानुकूल मातृत्व' विषय पर व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर सत्र को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि घर की जिम्मेदारियों में पुरुषों की भागीदारी भी बढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जहां महिलाओं को समान सम्मान और सहयोग मिले। उन्होंने कहा, ''जैसा कि मैंने पहले भी कहा, सभी 18 जिम्मेदारियां केवल महिला पर नहीं डाली जानी चाहिए। आज के समय में काम का बंटवारा होना चाहिए। यदि पूरा परिवार एक टीम की तरह काम करे, तो यह पूरी तरह संभव है।'' भागवत ने कहा कि शांति और संतोष तभी मिलता है, जब व्यक्ति वह कर सके जो वह वास्तव में करना चाहता है। परिवार को आपसी सहमति से अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा, ''परिवार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इन सभी जिम्मेदारियों के बीच महिला की अपनी आकांक्षाएं और इच्छाएं दम न तोड़ दें। परिवार को स्वयं से पूछना चाहिए कि वह उसे ऐसे कौन-से अवसर दे सकता है, जिनसे वह अपने सपनों को पूरा कर सके।'' उन्होंने कहा कि इस विषय पर पुरुषों और महिलाओं दोनों में जागरुकता आवश्यक है और बदलाव की शुरुआत परिवार से ही होनी चाहिए। आरएसएस सरसंघचालक ने कहा, '' आपसे बेहतर कौन जानता है कि कड़वी दवा भी प्रेम से कैसे दी जाती है। शुरुआत वहीं से कीजिए। धीरे-धीरे वातावरण बदलने लगता है।'' पुरुषों की भूमिका पर भागवत ने कहा कि महिला सशक्तीकरण के लिए पुरुषों में भी जागरुकता लाना उतना ही जरूरी है। उन्होंने उपस्थित पुरुषों से अपील करते हुए कहा, ''मैं यहां मौजूद सभी पुरुषों से भी आग्रह करता हूं कि इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। शुरुआत स्वयं से करें। अपने घर में सही माहौल बनाएं। इसके बिना बदलाव संभव नहीं होगा।'' भागवत ने कहा कि पहले के समय में परिवार आपसी सलाह-मशविरा से चलते थे। महिलाएं परिवार की वित्तीय व्यवस्था और महत्वपूर्ण निर्णयों में प्रमुख भूमिका निभाती थीं। उन्होंने कहा कि साझेदारी की उसी भावना को फिर से जीवित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ''हमें वही वातावरण दोबारा बनाना होगा। आज 'मैं' और 'मेरा' की भावना यानी व्यक्तिवाद अत्यधिक बढ़ गया है। हमें अपने अहंकार को नियंत्रित करना फिर से सीखना होगा और यह केवल संवाद के माध्यम से ही संभव है।'' महिलाओं की सुरक्षा पर भागवत ने कहा कि महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। उन्होंने कहा, '' समाज को स्वयं महिलाओं के लिए खतरा नहीं बनना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि महिलाएं अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हैं, लेकिन वे समाज से सुरक्षित वातावरण की अपेक्षा करती हैं। राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका पर भागवत ने कहा, ''महिलाएं हमारे समाज का आधा हिस्सा हैं। जब तक समाज का यह आधा हिस्सा अपनी पूरी क्षमता से योगदान नहीं देगा, तब तक विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता।





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