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हम अब विश्वगुरु नहीं हैं; संस्कृत को बढ़ावा देने की आवश्यकता: मुरली मनोहर जोशी

नयी दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार और 'क्वांटम कंप्यूटिंग' में भी इसके उपयोग की वकालत करते हुए सोमवार को कहा कि भारत अब विश्वगुरु नहीं है और इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। जोशी ने यहां एक कार्यक्रम के दौरान संवाददाताओं से बात करते हुए संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने की भी जोरदार वकालत की और कहा कि भीम राव आंबेडकर सहित कई लोगों ने अतीत में इसके लिए प्रयास किए थे, लेकिन प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिली।
वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर संवाददाताओं से बात कर रहे थे। भारत के विश्वगुरु के रूप में उभरने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाने के दौरान संस्कृत के संवर्धन में देश की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, ''यह धारणा कि हम विश्वगुरु हैं... मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना ​​है कि वर्तमान में हमें इस शब्द का प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए। हम वर्तमान में विश्वगुरु नहीं हैं। हमें विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए।'' भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ''सचमुच, एक समय हम विश्वगुरु थे। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि हम वर्तमान में (विश्वगुरु) नहीं हैं।'' जोशी ने कहा कि इस दृष्टिकोण से, संस्कृत आज बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संस्कृत भाषा को और अधिक बढ़ावा देने और 'क्वांटम कंप्यूटिंग' सहित आधुनिक वैज्ञानिक कार्यों में इसके उपयोग की वकालत करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा, ''संस्कृत केवल भारत की ही नहीं, बल्कि विश्व की विरासत है। यह सबसे प्राचीन भाषा है। यह ज्ञान और विज्ञान की भाषा है। यह आध्यात्मिकता की भाषा है। यह प्रौद्योगिकी की भाषा भी है। संस्कृत भारत का प्राण है।'' भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ''यहां तक कि नासा के विशेषज्ञों ने भी बार-बार इस बात की पुष्टि की है कि वास्तव में संस्कृत ही कंप्यूटिंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाषा है। जिसे वर्तमान में क्वांटम कंप्यूटिंग कहा जाता है, उसमें संस्कृत का विशेष महत्व होगा।'' उन्होंने कहा, ''मेरा मानना ​​है कि यदि हम संस्कृत को जल्द से जल्द कंप्यूटिंग की भाषा बना दें तो यह भारत की ओर से एक अभूतपूर्व योगदान होगा।'' संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने का समर्थन करते हुए जोशी ने कहा कि जब अधिकांश कार्य इस प्राचीन भाषा में किया जाएगा, तो यह देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। उन्होंने कहा, ''संविधान के निर्माण के समय, डॉ. आंबेडकर ने भी संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने का प्रयास किया था। कई व्यक्तियों ने इस संबंध में प्रस्ताव रखे थे। हालांकि, ये प्रस्ताव पारित नहीं हो सके।'' उन्होंने कहा, ''मेरा यह कहना है कि उस समय भी बहुत से लोग चाहते थे कि कि संस्कृत भारत की राजभाषा हो।

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