लोकतंत्र की ताकत संघर्ष में नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और परस्पर सम्मान में निहित है: अमित शाह
नयी दिल्ली.। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि लोकतंत्र की ताकत संघर्ष में नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और आपसी सम्मान में निहित है। तुषार मेहता की दो पुस्तकों ''द बेंच, द बार एंड द बिजार'' और ''द लॉफुल एंड द ऑफुल'' के विमोचन के अवसर पर शाह ने कहा कि लेखक ना केवल भारत के सॉलिसिटर जनरल और एक जानकार वकील हैं, बल्कि उनके मित्र भी हैं। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत करने में संविधान और न्यायपालिका का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गृहमंत्री ने कहा, ''1947 से संसद और विधानसभाओं द्वारा लाये गए बदलाव बिना किसी संघर्ष के स्वीकार किए गए हैं, जो दर्शाता है कि हमारे देश में लोकतंत्र कितना मजबूत है। इसे हासिल करने में अदालतों और संविधान की बड़ी भूमिका है।'' उन्होंने कहा कि देशभर के लोगों को विश्वास है कि किसी भी अन्याय की स्थिति में संविधान उनकी रक्षा के लिए मौजूद है। उन्होंने कहा, ''यदि अधिकारों पर हमला होता है, तो न्याय के द्वार खुले हैं और यदि कहीं भी किसी कमजोर व्यक्ति की आवाज दबाई जाती है, तो अदालतें निश्चित रूप से उन आवाजों को सुनेंगी।'' शाह ने कहा कि आम आदमी का विश्वास, समाज का सुचारू संचालन और किसी राष्ट्र के चरित्र का प्रमाण एक मजबूत न्याय व्यवस्था में निहित है, विश्वास बनाए रखने में निहित है, जिसमें "एक समाज के रूप में हम काफी हद तक सफल रहे हैं।'' उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी खामियां हों, कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक ठोस, समयबद्ध कार्ययोजना के माध्यम से उन्हें दूर करना होगा। गृहमंत्री ने कहा, ''हमारे लोकतंत्र की सुंदरता यह है कि संविधान ने संस्थाओं का निर्माण टकराव के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को संतुलित करने के लिए किया है। कार्यपालिका निर्णय लेती है और न्यायपालिका न्यायिक समीक्षा करती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संवाद, मर्यादा और संतुलन को अत्यंत सूक्ष्मता से बनाए रखने की भावना से संविधान लिखा है।" उन्होंने कहा कि 76 वर्षों में शायद ही किसी अन्य देश ने ऐसे मूल्यों को संरक्षित करते हुए प्रगति की हो। उन्होंने कहा, ''यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि यहां, कुल मिलाकर, सभी संवैधानिक मर्यादाएं बरकरार हैं और हमने उन्हें परंपराओं के माध्यम से भी आगे बढ़ाया है।" शाह ने कहा, ''लोकतंत्र की शक्ति टकराव से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और आपसी सम्मान से आती है। जब मैं पारस्परिक सम्मान की बात करता हूं, तो हमारे संविधान ने कई जगहों पर इस भावना को स्वीकार किया है, जिसे हम सभी ने देखा भी है।" उन्होंने कहा कि इस भावना को और आगे ले जाना चाहिए, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की उस अच्छी प्रथा को मजबूती और बढ़ावा देना चाहिए जो 76 वर्षों में विकसित हुई है, और इसके लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए।





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