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 वर्ष 2020 में मानव तस्करी के करीब 1,714 मामले दर्ज किये गये

नयी दिल्ली।  सरकार की मानव तस्करी रोधी इकाइयों ने 2020 में मानव तस्करी के करीब 1,714 मामले दर्ज किये हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है। एनसीआरबी के अनुसार मानव तस्करी के इन मामलों में वेश्यावृत्ति के लिए यौन शोषण करना, जबरन श्रम करना और घरेलू दास रखना शामिल हैं। आंकड़ों से यह भी प्रदर्शित हुआ है कि मानव तस्करी के मामलों में दोषसिद्धि की दर 10.6 प्रतिशत है।
महाराष्ट्र और तेलंगाना में सर्वाधिक संख्या में मामले दर्ज किये गये, इनमें से प्रत्येक राज्य में 184 मामले दर्ज किये गये। वहीं, आंध्र प्रदेश में 171, केरल में 166, झारखंड में 140 और राजस्थान में 128 मामले दर्ज किये गये। मानव तस्करी के मामलों में दोषसिद्धि सात राज्यों में शून्य दर्ज की गई, जबकि इस तरह के मामलों में सर्वाधिक दोषसिद्धि तमिलनाडु में (66 प्रतिशत) दर्ज की गई। इसके बाद दिल्ली (40 प्रतिशत) का स्थान है। एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसने देश भर में मानव तस्करी रोधी इकाइयों (एएचटीयू)से मानव तस्करी के मामलों पर आंकड़े एकत्र किये। राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में एएचटीयू द्वारा 1714 मानव तस्करी के मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में 2,278 और 2019 में 2,260 मामले दर्ज किये गये।
इसमें कहा गया है कि 2020 में देश भर में 4,709 पीड़ितों की तस्करी की गई, जिनमें 18 वर्ष से कम आयु के 2,222 पीड़ित शामिल हैं। तस्करी में सर्वाधिक 1466 मामले वेश्यावृत्ति के लिए यौन उत्पीड़न के दर्ज किए गए। इसके बाद जबरन श्रम के 1452 मामले और घरेलू दासता के 846 मामले दर्ज किए गए। राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार फिलहाल 696 एएचटीयू काम कर रहे हैं और 20 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने सभी जिलों में एएचटीयू की स्थापना के अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया है।
तस्करी के खिलाफ कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठन संजोग के संस्थापक सदस्य रूप सेन ने कहा कि देश 23 मार्च से लॉकडाउन में चला गया और इस दौरान रेल और बस समेत परिवहन की अधिकांश प्रणाली बंद रही साथ ही अंतराज्यीय यात्रा को लेकर निगरानी भी बेहद कड़ी रही। उन्होंने कहा कि यह सवाल पूछा जा सकता है कि तस्करी के आंकड़े ज्यादा क्यों हैं।
उन्होंने कहा, "... यहां तक कि यौन कर्मियों ने धंधे में कमी की बात कही और ईंट भट्ठे पूरी तरह बंद थे इसलिए तर्क यह कि इस अवधि में तस्करी वाले श्रम की कोई मांग नहीं होती।

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