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क्रैश कोर्स के जरिये धर्मनिरपेक्षता का पाठ नहीं पढ़ाया जा सकता : जावेद अख्तर

 जयपुर. गीतकार एवं लेखक जावेद अख्तर ने बृहस्पतिवार को यहां 19वें जयपुर साहित्योत्सव (जेएलएफ) के उद्घाटन के अवसर पर कहा कि धर्मनिरपेक्षता का पाठ क्रैश कोर्स के जरिये नहीं पढ़ाया जा सकता, यह ‘जीवन जीने की शैली' है, जो स्वाभाविक रूप से आती है। जावेद अख्तर ने यहां कहा कि हालिया समय में धर्मनिरपेक्षता ‘चार अक्षरों वाला शब्द' बनकर रह गयी है, लेकिन धर्मनिरपेक्ष मूल्य औपचारिक दिशानिर्देशों या सैद्धांतिक पाठों के जरिये जड़ें नहीं जमा सकते। उन्होंने कहा, ‘‘धर्मनिरपेक्षता जीवन जीने का एक तरीका होना चाहिए, क्योंकि आपके आसपास सभी इस तरीके से जी रहे हैं और उसी से यह अपने आप आपके भीतर समाहित हो जाती है। यदि एक दिन आपको भाषण दिया जाए और आप उसे सुनने के बाद उसके क, ख, ग, घ बिंदुओं को रट लें तो यह फर्जी है, यह कृत्रिम है। यह ज्यादा लंबा नहीं चलेगा।'' अख्तर ने कहा, ‘‘लेकिन यदि यह आपके जीवन जीने का तरीका है- वैसा तरीका जो आपने अपने बुजुर्गों को जीते हुए देखा है, उन लोगों को देखा है, जिनका आप सम्मान करते हैं- तो यह स्वाभाविक रूप से आपके भीतर आ जाता है।'' उन्होंने ‘जावेद अख्तर : प्वाइंट्स आफ व्यू' सत्र में दर्शकों की भारी भीड़ के बीच ये बातें कही।

 
स्वभाव से नास्तिक अख्तर ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहा कि उनका पालन-पोषण ऐसे घर में हुआ जहां धर्म बिरले ही रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश करता था। उन्होंने अपने घर में केवल अपने नाना नानी को पूजा करते देखा था। उन्होंने अपनी नानी का एक किस्सा सुनाया जो अशिक्षित महिला थीं, लेकिन उनमें गजब की संवेदनशीलता थी। जावेद अख्तर ने कहा कि काश! ‘आजकल के नेताओं में उसका दसवां हिस्सा भी संवेदनशीलता होती। बचपन में एक बार उनके नाना ने उनपर दबाव डाला कि यदि वह मजहबी आयतों को याद कर लेंगे तो वह उन्हें पचास पैसे देंगे जो कि उस जमाने में किसी खजाने से कम नहीं था। इस पर उनकी नानी ने गुस्से से मामले में दखल देते हुए कहा कि किसी को भी किसी दूसरे पर धर्म को जबरन थोपने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘वह दिन मेरी मजहबी तालीम का आखिरी दिन था। हां, उस समय तो मैं नानी के रवैये से खुश नहीं हुआ, क्योंकि पचास पैसे हाथ से जाते रहे। लेकिन आज पलटकर देखता हूं तो उस औरत के बारे में सोचता हूं, जिसे अपना नाम तक लिखना नहीं आता था, लेकिन उसकी संवेदनशीलता गजब की थी। काश! हमारे आज के नेताओं में इसका दसवां हिस्सा ही होता।'' जावेद अख्तर ने इस सोच पर भी चुटकी ली कि आज की युवा पीढ़ी में खासतौर पर कमियां हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी शिकायतें बहुत पुराने समय से चली आ रही हैं: “वर्तमान कभी भी स्वर्ण युग नहीं होता।” उन्होंने कहा, ‘‘आप बेशक गूगल खंगाल लें। यहां तक कि अरस्तु भी युवा पीढ़ी से खुश नहीं थे। ईसा के 360 या 350 साल पहले ये लिखा गया था कि युवा पीढ़ी में कोई एकाग्रता नहीं है। उन्हें कोई तमीज नहीं है। वे पूरी तरह से बर्बाद हैं। ये शिकायत हमेशा से रही है।'' जावेद अख्तर ने बीते समय और वर्तमान के बीच तुलना के संबंध में कहा, ‘‘आज फिल्म इंडस्ट्री में चीजें पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गई हैं... मुझे याद है जब मैं असिस्टेंट डायरेक्टर था और पहली बार फिल्म इंडस्ट्री में आया था, तो असिस्टेंट डायरेक्टर का पद बहुत बेइज़्ज़ती वाला होता था। हमारा काम क्या था? मैडम के जूते जल्दी से लाओ। हीरो का कोट कहां है? जैकेट कहां है? हम ये सब करते थे। हम कहते थे, 'मैं असिस्टेंट डायरेक्टर हूं।'' उन्होंने कहा, ‘‘‘लेकिन, आजकल के ‘असिस्टेंट', फिल्मी सितारों को उनके नाम से बुलाते हैं। जब मैं उन्हें देखता हूं तो डर जाता हूं। असिस्टेंट डायरेक्टर हीरो को उसके नाम से बुला रहा है, हमने कभी सोचा भी नहीं था।'' पांच दिन के इस साहित्योत्सव में 350 से ज़्यादा मशहूर लेखक और विद्वान शामिल हो रहे हैं, जिनमें बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक, शतरंज के महान खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद, ब्रिटिश एक्टर और लेखक स्टीफन फ्राई और पूर्व नौकरशाह एवं लेखक गोपाल कृष्ण गांधी, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अनुराधा रॉय, जानी-मानी फिल्म आलोचक भावना सोमाया और मशहूर लेखक मनु जोसेफ, रुचिर जोशी, और के.आर. मीरा शामिल हैं। साहित्योत्सव 19 जनवरी को खत्म होगा।

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