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  आइये जानें भगवान श्रीकृष्ण का कौन-सा नाम सुनकर पतितजनों के मन में अपने उद्धार की आशा बढ़ने लगती है?
जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 310

★ भूमिका - आज के अंक में प्रकाशित दोहा तथा उसकी व्याख्या जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा विरचित ग्रन्थ 'भक्ति-शतक' से उद्धृत है। इस ग्रन्थ में आचार्यश्री ने 100-दोहों की रचना की है, जिनमें 'भक्ति' तत्व के सभी गूढ़ रहस्यों को बड़ी सरलता से प्रकट किया है। पुनः उनके भावार्थ तथा व्याख्या के द्वारा विषय को और अधिक स्पष्ट किया है, जिसका पठन और मनन करने पर निश्चय ही आत्मिक लाभ प्राप्त होता है। आइये उसी ग्रन्थ के 90-वें दोहे पर विचार करें, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के 'अधम-उधारन' नाम/स्वरूप की चर्चा है, जिसे सुनकर पतितजनों के मन में अपने उद्धार की आशा जगती है...

अधम उधारन नाम सुनि, उर आशा बढ़ि जात।
भक्ति वश्य सुनि नाम पै, मन महँ अति डरपात।।90।।

भावार्थ - हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा पतित पावन नाम सुनकर मन में साहस होता है, क्योंकि मैं पतित हूँ, मेरा भी काम बन जायगा। किंतु जब भक्त वत्सल, भक्तिवश्य आदि नाम सुनता हूँ तो निराशा छा जाती है। डर लगने लगता है।

व्याख्या - भगवान् श्रीकृष्ण के अनन्त स्वरूप हैं। अनन्त लीलायें हैं। अतः तदनुसार अनन्त नाम भी हैं। जैसे एक स्वरूप है ब्रह्म। वह अकर्ता है। एक स्वरूप है परमात्मा। वह न्याय करता है। सबके कर्मों का फल देता है। इस स्वरूप से भी किसी का काम नहीं बनता। क्योंकि प्रत्येक जीव के अनन्त जन्म हो चुके, अतः अनन्त पाप पुण्य भी हो चुके। यदि कोई भगवत्प्राप्ति भी कर ले और भविष्य के कर्मबन्धन से अवकाश भी प्राप्त कर ले तो न्याय के अनुसार पिछले अनन्त संचित कर्मों को तो भोगना ही चाहिये। और वे कर्म अनन्त हैं, अतः अनन्तकाल तक भोगकर भी अनन्त ही शेष रहेंगे। अर्थात् अनन्त होने के कारण भूतकाल के कर्मभोगों का कभी अन्त ही न होगा। तो फिर ऐसी भगवत्प्राप्ति या मुक्ति का प्रयोजन ही निरर्थक हो जायगा। अब तीसरे स्वरूप पर विचार करना है। यह है श्रीकृष्ण भगवान् का स्वरूप। इसी से काम बनेगा। इस स्वरूप ने नियम बनाया है कि यदि कोई जीव मेरी शरण में आ जायगा तो उसके पिछले सब पाप पुण्य समाप्त कर दूंगा। यथा गीता;

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
(गीता 18-66)

इतना ही नहीं वरन् भविष्य का ठेका भी लेने की प्रतिज्ञा है। यथा;

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(गीता 9-22)

येतु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
(गीता 12-6)

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।।
(गीता 12-7)

 इस प्रकार भूतकाल भी बन गया एवं भविष्य काल भी बन गया। वर्तमान तो बना ही है। और यह माया-निवृत्ति एवं आनन्द प्राप्ति सदा को मिल जाती है। 

सदा पश्यन्ति सूरयः।
(सुबालोपनिषद् , छठवाँ मंत्र , मुक्तोपनिषद् )

शरणागति भी 2 प्रकार के लोगों की होती है। प्रथम - पतितों की शरणागति। द्वितीय - भक्तों की शरणागति। इन दोनों में पतितों की शरणागति से ही आशा होती है क्योंकि भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी पतित होते हैं। भक्ति प्राप्त होने पर तो भक्तवत्सल नाम उन भक्तों के ही काम का है। अतः पतित साधक तो भक्त वत्सल नाम से भयभीत ही होता है।

०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज
०० सन्दर्भ ::: 'भक्ति शतक' ग्रन्थ, दोहा संख्या 310
०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन।

+++ ध्यानाकर्षण/नोट ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्रगटित सम्पूर्ण साहित्यों की जानकारी/अध्ययन करने, साहित्य PDF में प्राप्त करने अथवा उनके श्रीमुखारविन्द से निःसृत सनातन वैदिक सिद्धान्त का श्रवण करने के लिये निम्न स्त्रोत पर जायें -
(1) www.jkpliterature.org.in (website)
(2) JKBT Application (App for 'E-Books')
(3) Sanatan Vedik Dharm - Jagadguru Kripalu Parishat (App)
(4) Kripalu Nidhi (App)
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