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रंग ही नहीं इस होली संगत भी बदलें... और मूल्यवान बनें

-डॉ. नीरज गजेंद्र
सब्जी तौलते समय तराजू पर एक मक्खी बैठ जाए तो एक पैसे का भी अंतर मुश्किल से पड़ता है। वही मक्खी यदि सोना तौलते समय बैठ जाए तो हजारों रुपए का अंतर बन जाता है। मक्खी वही, वजन वही, तौलने का पैमाना भी वही लेकिन संदर्भ और मूल्य बदल जाता है। जीवन भी ठीक ऐसा ही तराजू है। हम कहां बैठे हैं, किसके साथ बैठते हैं, किन विचारों के बीच बैठते हैं, हमारा मूल्य उसी आधार पर तय होने लगता है। यह बात धर्म, अध्यात्म और आधुनिकता तीनों कसौटियों पर परखी जाए तो और स्पष्ट दिखाई देती है। 
भारतीय चिंतन में सत्संग का विशेष महत्व बताया गया। रामायण में श्रीराम का वनवास श्रेष्ठ संगति की कथा का श्रेष्ठ उदाहरण है। निषादराज, शबरी, हनुमान  इन सबके साथ जुड़कर धर्म का आदर्श और उज्ज्वल हुआ। दूसरी ओर रावण जैसा विद्वान भी कुसंगति और अहंकार के कारण पतन की ओर बढ़ा। धर्म यह नहीं कहता कि मनुष्य जन्म से महान या तुच्छ बनता है। धर्म कहता है कि संगत से स्वभाव ढलता है, स्वभाव से कर्म बनते हैं, कर्म से भाग्य। होली का पर्व भी इसी सच्चाई की याद दिलाता है। होलिका दहन की कथा में प्रहलाद की भक्ति और सत्य के साथ संगति ने उसे अग्नि में भी सुरक्षित रखा। अर्थात जब जीवन का तराजू हमें परखे, तब यह देखा जाएगा कि हम किसके साथ खड़े हैं। 
वास्तव में अध्यात्म भीतर की यात्रा सिखाता है। मन ही असली तराजू है। जिस विचार के साथ हम बैठते हैं, वही हमारे भीतर का मूल्य तय करता है। यदि मन नकारात्मक लोगों, ईर्ष्या, तुलना और शिकायतों के साथ बैठता है, तो आत्मा का मूल्य धीरे-धीरे घटने लगता है। लेकिन जब मन सकारात्मकता, ध्यान, सेवा और सृजन के साथ बैठता है, तब वही व्यक्ति भीतर से सोना बन जाता है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं से कहा था कि अपने आसपास ऐसे लोगों को रखो जो तुम्हें ऊंचा उठाएं। आज हम जिन पुस्तकों को पढ़ते हैं, जिन वीडियो को देखते हैं, जिन पोस्टों को साझा करते हैं, वे सब हमारी संगति का हिस्सा बन चुके हैं। यदि हमारी डिजिटल संगति विषाक्त हो, तो मन का तराजू भी दूषित हो जाएगा। इसलिए अध्यात्म हमें सजग रहने की शिक्षा देता है। 
आधुनिक युग में नेटवर्किंग और ब्रांड वैल्यू की चर्चा होती है। कॉर्पोरेट दुनिया में यह स्वीकार किया गया सिद्धांत है कि व्यक्ति की पहचान उसके सर्कल से बनती है। एक स्टार्टअप यदि श्रेष्ठ मेंटर्स और दूरदर्शी साथियों के साथ जुड़ता है, तो उसका मूल्यांकन अचानक कई गुना बढ़ जाता है। यही सिद्धांत व्यक्तिगत जीवन में भी लागू होता है। आज की पीढ़ी सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या से मूल्य मापती है। परंतु असली मूल्य फॉलोअर्स से नहीं, फॉलो करने योग्य आदर्शों से बनता है। यदि युवा ऐसे लोगों के साथ बैठते हैं जो मेहनत, अनुशासन और नैतिकता का सम्मान करते हैं, तो उनका भविष्य स्वर्णिम बन सकता है। आधुनिकता यह नहीं सिखाती कि परंपरा छोड़ दो। आधुनिकता यह सिखाती है कि चयन बुद्धिमानी से करो।
 होली रंगों का उत्सव है। रंग मिलते हैं तो नया रंग बनता है। यदि हम अच्छे रंगों के साथ मिलेंगे तो जीवन में उजास बढ़ेगा। इस रंगोत्सव पर नई पीढ़ी के लिए संदेश स्पष्ट रहे कि अपनी संगति को सजगता से चुनो। अपने मित्रों को देखकर अपने भविष्य का अनुमान लगाओ। अपने विचारों की गुणवत्ता पर ध्यान दो। ऐसे लोगों के साथ बैठो जो तुम्हें प्रेरित करें, न कि भटकाएं। मक्खी का वजन छोटा रहा, पर संदर्भ बड़ा है। हम स्वयं को हल्का न समझें। हम कहां बैठते हैं, यह तय करेगा कि हमारा मूल्य सब्जी या सोने  में किसके जितना आंका जाएगा। इस होली पर रंग न बदलें, संगत भी बदलें। चेहरे पर ही गुलाल न लगाएं, मन में भी सद्भाव और विवेक का रंग भी भरें। रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं। 

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