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 लगवाएं टीका, बदलिए जीवन जीने का सलीका....
 कमलज्योति-सहायक जनसंपर्क अधिकारी
 टीका का नाम आते ही एक विश्वास का भाव पैदा होने लगता है। यह टीका भले ही उस मासूम के चेहरे के किसी हिस्से में लगने वाला काजल का टीका हो या फिर किसी संक्रामक बीमारी से बचने के लिए हो।       परम्परानुसार चली आ रही धारणा आज भी प्रचलन में है कि मां अपने मासूम बच्चों को किसी के नजर से बचाने टीका लगाती है। बहरहाल यह धारणाओं और परम्पराओं पर आधारित है, इसलिए इसे लगाने के बाद सौ फीसदी विश्वास कायम हो, डर-भय समाप्त हो जाए यह शायद ही संभव है। यदि ऐसा होता तो निश्चित ही कोई बच्चों को संक्रामक बीमारी से बचाने के लिए अस्पताल में टीकाकरण नहीं कराता। आप पाएंगे कि जागरूकता के साथ ही बच्चों में टीकाकरण का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। टीकाकरण बचपन में होने वाली कई जानलेवा बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावशाली एवं सुरक्षित तरीका है। टीकाकरण बच्चे के रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाता है और उन्हें विभिन्न जीवाणु तथा विषाणुओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
     निःसंदेह टीका या वैक्सीन वैज्ञानिकों, चिकित्सकों द्वारा जांची और परखी गयी वह खोज है, जो हमें संक्रामक बीमारी से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। वर्तमान में हम सभी को मालूम है कि कोविड-19 को एक संक्रामक रोग घोषित किया गया है। चिकित्सा वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है कि को-वैक्सीन और कोविशील्ड का टीका लोगों को लगाया जा रहा है। यह वैक्सीन कोरोना के संक्रमण से बचने में प्रभावी हो रही हैं। इसलिए कोरोना की रोकथाम के लिए टीकाकरण का अभियान हर जगह जोर-शोर से जारी है। 
       बहरहाल टीकाकरण जारी है और वैक्सीन का जो उत्पादन तथा उपलब्धता है, उससे संभावना है कि शतप्रतिशत टीकाकरण का कार्य लंबे समय तक जारी रहेगा। कोरोना की पहली लहर के बाद दूसरी लहर और इस लहर में हमें अपनों से लेकर आसपास के वे लोग जो कोरोना की जंग हार गए तथा ऐसे लोग जो कोरोना से लड़ते हुए जंग जीत गए, इन दोनों से मिली सीख को हमें जीवन में उतार लेना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि तीसरी लहर जब आए तो हम उससे कैसे अपने आपको और अपने परिवार को इससे बचा सकें। हम में से बहुत लोगों की धारणा है कि एक बार टीका लगने के बाद हम कोरोना से आसानी से लड़ सकते हैं, टीका लगने के बाद कोरोना का वायरस हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस संबंध में अनेक चिकित्सा विशेषज्ञों की राय, अपील, पढ़ने, जानने समझने के बाद वर्तमान परिपेक्ष्य में इतना तो कहा जा सकता है कि टीका हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। हमें बीमारी से लड़ने में सहायता करता है। कोरोना संक्रमितों के सम्पर्क में आने के बाद हम संक्रमित होते भी हैं तो हमारी स्थिति उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी बिना वैक्सीन वाले संक्रमितों की होती है। 
       कहने का अर्थ यहीं है कि वैक्सीन लगने के बाद आप संक्रमित न हो इसकी कोई ठोस गारंटी नहीं है। ऐसे में हमें टीका लगवाने के साथ अपने जीवन जीने का सलीका बदलने की आवश्यकता है। यह जीवन जीने का सलीका हमारे घर के भीतर खान-पान, योगा-व्यायाम और मास्क लगाकर चलने तक ही सीमित नहीं है। दरअसल हम में से बहुत लोग भूल जाते हैं कि घर से बाहर निकलते ही सड़क पर चलते हुए हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। भले ही मुहं में मास्क पहने हुए होते हैं, लेकिन गुटखा और तंबाकू, पान इत्यादि चबाते होते हैं और जब मर्जी पड़ी, बिना आगे-पीछे देखे कही भी थूक देते हैं। जब छींक या खांसी आती है तो मास्क हटाकर छींकते-खांसते हैं। हमें हमारे पीछे चलने वालों की जरा भी परवाह नहीं होती। हम तब भी लापरवाह होते हैं, जब किसी दुकान में कोई सामान लेना हो, हमें किसी बीमारी की डर से ज्यादा जल्दी सामान लेने की होड़ होती है और इस जल्दबाजी में हम सोशल-फिजिकल डिस्टेसिंग का पालन नहीं करते। हम में से बहुतों को बेवजह घूमने-फिरने का शौक भी है। घर से बाहर जरूरी काम का बहाना बनाकर सड़क पर, किसी चौराहों पर, गुमटी-ठेलों पर अनावश्यक खड़े हो जाते हैं, घूमते-फिरते होते हैं और इस तरह भीड़ बढ़ाकर हम अपने साथ घर परिवार को भी संकट में डालने का काम करते रहते हैं। कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा गंदगी और लापरवाही पर टिका हुआ है। स्वयं की स्वच्छता के प्रति हमारी कमी ही हमेें संक्रमित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बीमार होने के बाद हम हजार रुपए से लेकर कई लाख रुपए तक अपनी जान बचाने के लिए अस्पताल और दवाई में खर्च कर देते हैं। हम अनावश्यक चीजे खाना बंद करते हैं। फल खाते हैं। जूस पीते हैं। मल्टी विटामिन लेते हैं। हम यह जानते भी है कि स्वच्छ रहकर भी बहुत से बीमारी से बचा जा सकता है, इसके बावजूद क्या हम अपना गंदा हाथ बार-बार धोने के लिए 10 से 20 रुपए का साबुन अपने साथ नहीं रख सकते? क्या मास्क और रोज पहनने वाले कपड़े घर जाते ही साफ नहीं कर सकते? 
      कोरोना की पहली लहर खत्म होने के बाद शायद हम उतने सतर्क और सावधान नहीं हुए, पहली लहर में हमने सीखा था कि मास्क पहनना है। हाथ लगातार धोना है। खान-पान पर ध्यान देना है। काढ़ा पीना है। गले साफ रखने के लिए गरारा करना है। बाजार या बाहर से कोई सामान लाए तो उसे कुछ देर घर के बाहर रखना है और अच्छी तरह से धोकर ही उपयोग करना है। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करना है। लेकिन दुर्भाग्यवश पहली लहर का असर कम होने के साथ हम सभी के भीतर से कोरोना का भय मिटता चला गया और हमारी लापरवाही जारी रही। इस दौरान शासन-प्रशासन की सख्ती की वजह से मुंह पर केवल दिखावटी मास्क ही हमारे बचाव के लिए रह गए थे। इसलिए दूसरी लहर सभी के लिए चुनौतियों के साथ पीड़ादायक रही। कोरोना की पहली लहर ने जहां हमें बहुत कुछ सिखाने का काम किया है वहीं दूसरी लहर ने हमें अपनी गल्तियों और लापरवाही का अहसास कराते हुए फिर से कठिन चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार किया है। शासन-प्रशासन भले ही लॉकडाउन के माध्यम से कोरोना को नियंत्रित कर रही है, लेकिन हम सभी को चाहिए की हम अपनी आदतों को बदले और शासन-प्रशासन से इत्तर अपनी जिम्मेदारी भी समझे। हमारा जीवन जीने का जो तरीका है वह बेपरवाह और दूसरों को खतरे में डालने वाला न हो। ताकि लॉकडाउन की नौबत ही न आए। यदि हम कोरोना की पहली लहर में बनी आदतों और दूसरी लहर में हुई गल्तियों से सीख लेकर जीवन का सलीका बदल लेंगे और टीका लगवायेंगे तो निश्चित ही कोरोना की आने वाली तीसरी लहर हमारा ज्यादा कुछ नुकसान नहीं कर पाएगी। हम स्वस्थ भी रहेंगे और आने वाले कल को भी देख पाएंगे क्योंकि ‘जान है तो जहान है...

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