ओडिशा जा रहे हैं तो इतिहास और संस्कृति को उकेरती ये जुड़वा गुफाएं आपको रोमांचित कर सकती हैं.....
आलेख- प्रशांत शर्मा
कुछ समय पहले ओडिशा जाने का मौका मिला। पुरी की यह मेरी पहली यात्रा थी। यहां महाप्रभु जगन्नाथ के अद्भुत दर्शन ने मन को आनंदित कर दिया। काफी समय से इच्छा थी वहां जाने की, पर कोई ना कोर्ई अडंगा आ ही जाता था, कहते हैं ना भगवान का जब तक बुलावा नहीं आए, उनके दर्शन नहीं हो पाते।
ओडिशा में वैसे तो बहुत से दर्शनीय और पर्यटन स्थल हैं, लेकिन यदि आपकी इतिहास के पन्नों में झांकने में रुचि है, तो भुवनेश्वर के पास स्थित उदयगिरि और खंडगिरि की दो पहाडिय़ां आपको रोमांचित कर सकती हैं। इन गुफाओं को देखने के बाद इसके बारे में और जानने की जिज्ञासा हो गई। ये गुफाएं ओडीशा क्षेत्र में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाती हैं।
इसके इतिहास को जानने की जिज्ञासा ने पुराने रिकार्ड खंगालने पर मजबूर कर दिया। मिले आंकड़ों के अनुसार हाथीगुम्फा शिलालेख में इन गुफाओं का वर्णन कुमारी पर्वत के रूप में आता है। पहले कटक या कट्टाका गुफाओं के नाम से जानी जाने वाली उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की खोज 19वीं शताब्दी में युवा ब्रिटिश अधिकारी एंड्रयू स्टर्लिंग ने की थी। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इन गुफाओं की गणना कराई और इन वस्तुओं के आधार पर इनके अलग-अलग नाम रखे।
ऐसा कहा जाता है कि जैन भिक्षु घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे। बारिश के मौसम में उनके निवास के लिए ही प्राचीन ओडिशा यानी कलिंग के नरेश खारावेला ने (209-170 ईसा पूर्व के बीच) इसका निर्माण कराया था। वे जैन धर्म को मानने वाले थे। इतिहास गवाह है कि अशोक सम्राट ने नरेश खारावेला को युद्ध में हरा दिया था। कलिंग विजय के बाद जब अशोक का शासन हुआ और राजा खारावेला की सभी संपत्तियों पर उनका अधिकार हो गया, तो धीरे-धीरे जैन धर्म के स्थान पर बौद्ध धर्म का प्रभाव बढऩे लगा।
ये दोनों गुफाएं लगभग दो सौ मीटर के अंतर पर हैं और एक दूसरे के सामने हैं। उदयगिरि में गुफाओं की संख्या है 18 और खंडगिरि में 15। गुफाओं के निर्माण के दौरान इस बात का ख्याल रखा गया है कि सूर्य की रौशनी प्रत्येक कक्ष के दरवाजे तक पहुंचे और यहां पर उजाला रहे। वहीं चांदनी रात में भी गुफाओं के अंदर तक रौशनी देखी जा सकती है। प्रत्येक गुफा में एक छोटे नहर के माध्यम से जल का स्रोत आता था; प्रत्येक गुफा में संचार के लिए छेद थे, दीपक जलाने के लिए जगह थी और फर्श थोड़ा झुका हुआ था ताकि वह सिरहाने का काम कर सके। इनमें से कई गुफाओं में एक ऊपरी कक्ष था, जहाँ माना जाता है कि भिक्षु गहन ध्यान में लीन होते थे।
उदयगिरि गुफाओं की बात करें तो सीढ़ीनुमा पत्थरों पर चलते-चलते 18 गुफाओं के दर्शन हो जाते हैं। सभी गुफाएं एक दूसरे से काफी अलग हैं और सबका अपना अलग महत्व और नाम है। गुफा संख्या 1, रानीगुम्फा यानी रानी की गुफा है जो दो मंजिला है। यह गुफा ध्वनि संतुलन की विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है और समझा जाता है कि इसका प्रयोग मंत्रोच्चार के लिए और नाट्य प्रदर्शनों के लिए किया जाता है। यहां पर रथ पर सवार सूर्य देवता की भी मूर्ति है। नीचे वाली मंजिल के दायें भाग में एक कक्ष है जिसके तीन प्रवेश स्थल हैं और खंभों वाला बरामदा है। प्रवेश स्थल पर दो संतरियों की मूर्तियों सहित इसमें कुछ सुंदर वास्तुकला के दृश्य हैं।
केन्द्रीय भाग में चार कक्ष हैं। यहां पर नरेश के विजय अभियान और उनकी यात्रा को दर्शाया गया है। यहां पर रक्षकों के कक्ष हैं जिन्हें पहाड़ी से गिरते झरनें, फलों से लदे वृक्षों, वन्य जीवों, बानरों और कमल-ताल में अठखेलिया करते हाथियों की मूर्तियों से सजाया गया है। ऊपर की मंजिल में छह कक्ष हैं।
गुफा संख्या दो बाजाघर गुम्फा कहलाती है, जहां सामने दो विशाल स्तंभ हैं और अंदर एक और स्तंभ है। गुफा संख्या तीन को छोटा हाथी गुम्फा कहते हैं। गुफाएं संख्या पांच, छह, सात और आठ जय-विजय गुम्फा, पनासा गुम्फा, ठकुरानी गुम्फा और पातालपुरी गुम्फा के नाम से प्रसिद्ध है। पांचवीं और सातवीं गुम्फाएं दो मंजिला हैं। इनमें चित्रकारी और पक्षियों आदि के चित्र हैं। गुफा संख्या नौ, मंचापुरी और स्वर्गपुरी गुफाएं हैं, वे भी दो मंजिला हैं । गुफा संख्या दस गणेश गुम्फा है। जम्बेश्वर गुम्फा की संख्या 11 है। गुफा संख्या 12, कम ऊँचाई वाली और दो दरवाजों वाली व्याघ्र गुम्फा है। गुफा संख्या 13 सर्प गुम्फा है, जो बहतु ही छोटी है। अन्य गुफाओं में गुफा संख्या 14- हाथी गुम्फा, गुफा संख्या 15-धनागार गुम्फा, गुफा संख्या 16- हरिदास गुम्फा, गुफा संख्या 17, जगम्मठ गुम्फा और गुफा संख्या 18- रोसई गुम्फा है।
वहीं खंडगिरि में गुफा संख्या 1 और 2 को तातोवा गुम्फा कहा जाता है। दोनों गुफाओं के प्रवेश द्वार पर दो द्वारपालों की आकृतियाँ, साथ ही दो शेरों और दो बैलों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। गुफा संख्या 3 से 6 को अनंत गुम्फा, तेंतुली गुम्फा, खंडगिरि गुम्फा और ध्यान गुम्फा के नाम से जाना जाता है। गुफा संख्या 7 को नवमुनि गुम्फा कहा जाता है, जिसमें शासन देवियों और जैन धर्म के नौ तीर्थंकरों की अद्भुत मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि ये मूर्तियां 11वीं शताब्दी में कलिंग में सोमवंशी राजवंश के शासनकाल के दौरान बनाई गई थीं। गुफा संख्या 8, जिसकी कोठरियों की दीवारों पर 25 जैन तीर्थंकरों के चित्र अंकित हैं, को भारभुजी गुम्फा कहा जाता है। तृसूला गुम्फा, अम्भिका गुम्फा और ललतेंदु केशरी गुम्फा को क्रमश: 9, 10 और 11 गुफाओं के रूप में क्रमांकित किया गया है। गुफा संख्या 12, 13 और 15 को कोई नाम नहीं दिया गया है।
इन गुफाओं के कक्ष तक पहुंचते-पहुंचते और इन्हें करीब से जानते -जानते कब पूरा दिन गुजर गया, पता ही नहीं चला। लेकिन इसे और जानने की उत्सुकता पूरे दिन भर बनी रही। उत्कृष्ट शिल्प कौशल और प्राचीन इतिहास को दर्शाने वाले ब्राह्मी भाषा में अंकित शिलालेखों से परिपूर्ण यह स्थान इतिहास प्रेमियों के लिए एक खजाना है। यदि आप उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यहां पर्याप्त समय लेकर जाइये। इसके हर कोने का अपना इतिहास है, असीम सुकून और शांति है।










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