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  मथुरापुरी में कभी थे 12 वन और 24 उपवन
 मथुरा उत्तरप्रदेश राज्य का एक जिला और प्रमुख ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है। जानकारी के अनुसार हिन्दका मण्डल 20 योजनों तक विस्तृत था और इसमें मथुरा पुरी बीच में स्थित थी। वराह पुराण एवं नारदीय पुराण (उत्तरार्ध, अध्याय 79-80) ने मथुरा एवं इसके आसपास के तीर्थों का उल्लेख किया है। वराह पुराण एवं नारदीय पुराण ने मथुरा के पास के 12 वनों की चर्चा की है, जैसे कि- मधुवन, तालवन, कुमुदवन, काम्यवन, बहुलावन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लौहजंघवन, बिल्व, भांडीरवन एवं वृन्दावन। 24 उपवन भी थे जिन्हें पुराणों ने नहीं, प्रत्युत पश्चात्कालीन ग्रन्थों ने वर्णित किया है।
 वृन्दावन यमुना के किनारे मथुरा के उत्तर-पश्चिम में था और विस्तार में पांच योजन था। यही कृष्ण की लीला-भूमि थी। पद्म पुराण ने इसे पृथ्वी पर वैकुण्ठ माना है। मत्स्य पुराण ने राधा को वृन्दावन में देवी दाक्षायणी माना है। कालिदास के काल में यह प्रसिद्ध था। रघुवंश में नीप कुल के एवं शूरसेन के राजा सुषेण का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वृन्दावन कुबेर की वाटिका चित्ररथ से किसी प्रकार सुन्दरता में कम नहीं है। इसके उपरान्त गोवर्धन की महत्ता है, जिसे कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर इन्द्र द्वारा भेजी गयी वर्षा से गोप-गोपियों एवं उनके पशुओं को बचाने के लिए उठाया था। 
 वराहपुराण  में आया है कि गोवर्धन, मथुरा से पश्चिम लगभग दो योजन हैं। यह कुछ सीमा तक ठीक है, क्योंकि आजकल वृन्दावन से यह 18 मील है। कूर्म पुराण का कथन है कि प्राचीन राजा पृथु ने यहां तप किया था। हरिवंश एवं पुराणों की चर्चाएं कभी-कभी  एक-दूसरे के विरोध में पड़ जाती हैं। हरिवंश  में तालवन गोवर्धन से उत्तर यमुना पर कहा गया है, किन्तु वास्तव में यह गोवर्धन से दक्षिण-पूर्व में है। कालिदास   ने गोवर्धन की गुफ़ाओं (या गुहाओं कन्दराओं) का उल्लेख किया है। गोकुल ब्रज या महावन है जहां कृष्ण बचपन में नन्द-गोप द्वारा पालित-पोषित हुए थे। कंस के भय से नन्द-गोप गोकुल से वृन्दावन चले आये थे। चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन आए थे। 16वीं शताब्दी में वृन्दावन के गोस्वामियों, विशेषत: सनातन, रूप एवं जीव के ग्रन्थों के कारण वृन्दावन चैतन्य-भक्ति-सम्प्रदाय का केन्द्र था। चैतन्य के समकालीन वल्लभाचार्य एक दूसरे से वृन्दावन में मिले थे।  मथुरा के प्राचीन मन्दिरों को औरंगजेब ने बनारस के मन्दिरों की तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।  
 सभापर्व  में ऐसा उल्लेख आया है कि जरासंघ ने गिरिव्रज (मगध की प्राचीन राजधानी, राजगिर) से अपनी गदा फेंकी और वह 99 योजन की दूरी पर कृष्ण के समक्ष मथुरा में गिरी, जहां वह गिरी वह स्थान  गदावसान  के नाम से विश्रुत हुआ। वह नाम कहीं और नहीं मिलता।
 ग्राउस ने मथुरा नामक पुस्तक में वृन्दावन के मन्दिरों एवं  गोवर्धन, बरसाना, राधा के जन्म-स्थान एवं नन्दगांव का उल्लेेख किया है। मथुरा एवं उसके आसपास के तीर्थ-स्थलों का डब्लू. एस. कैने कृत  चित्रमय भारत  में भी वर्णन है। 

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