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 संत का सत्संग करते रहने से जीवन में परिवर्तन आ जाता है, यह परिवर्तन क्यों होता है? क्या यह सबके साथ होता है?
जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 275

साधक का प्रश्न ::: महाराज जी! संत के साथ रहने पर क्या परिवर्तन आता है और क्यों आता है? वाल्मीकि लुटेरा था और संत के साथ रहने से ब्रम्हर्षि हो गये। ऐसी कौन सी खास बात होती है जो संत के साथ रहने से जीवन में इतना परिवर्तन आ जाता है?

जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिया गया उत्तर ::: खास बात क्या होती है? वो तो किसी आदमी को ठण्ड लग रही है, वो आग के पास जायेगा तो ठण्ड दूर होगी, लेकिन उसमें कुछ शर्तें हैं - संत एक चुम्बक है। चुम्बक पत्थर होता है न, और संसार के लोग यानी संसारियों का मन लोहा है। जैसे एक चुम्बक रख दो और चारों ओर लोहे की सुइयाँ खड़ी कर दो, तो जो सुई क्लीन लोहे की होगी, वो फौरन आ कर चिपक जायेगी, जिसमें थोड़ी मिलावट होगी वो धीरे-धीरे मिल जायेगी, जिसमें और मिलावट होगी, वो और धीरे-धीरे आयेगी, और जिसमें बहुत अधिक मिलावट होगी वो अपनी जगह हिलेगी, चलेगी नहीं और जो नकली होगी, लोहे की होगी ही नहीं, उस पर कोई असर नहीं होगा।

ऐसे ही भगवान जब अवतार लेते हैं या संत महात्मा जब किसी को मिलते हैं तो उसके अन्तःकरण की शुद्धि जितनी लिमिट की होती है, उसी हिसाब से वो अपने आप खिंच जाता है। एक सैकेण्ड में कम्प्लीट सरेण्डर हो सकता है, अगर अन्तःकरण शुद्ध मिल जाय, और अगर गड़बड़ है कुछ, तो जितनी गड़बड़ है उतनी ही देर में वो संत से खिंचेगा।

इसलिये कहते हैं एक घर में माँ है, बाप है, बेटा है, स्त्री है, पति है, दस आदमी हैं। एक संत का सत्संग सबको मिला। लेकिन सबका खिंचना अलग-अलग ढंग से है। किसी का फिफ्टी परसेन्ट, किसी का ट्वेन्टी परसेन्ट, किसी का नाइंटी परसेन्ट। तो जिसका हृदय जितना साफ है, शुद्ध है, उसी हिसाब से वो खिंच जाता है और जिसका हृदय बहुत गन्दा है वो गाली देता है संत को, भगवान को; खिंचने की कौन कहे। 

पापवंत कर सहज सुभाऊ..

भगवान कहते हैं - भई! जो जितनी मात्रा का पापी होगा, पाप का अन्तःकरण होगा, उतनी ही देर में खिंचेगा;

यावत्पापैस्तु मलिनं हृदयं तावदेव हि।
न शास्त्रे सत्यता बुद्धि: सद्बुद्धि: सद्गुरौ तथा।।

जितना अधिक मन मलिन होगा, अन्तःकरण गन्दा होगा, पापयुक्त होगा, उतना ही वह भगवान और संत पर विश्वास ही न करेगा। देखकर हँस देगा, वो जायेगा ही नहीं।

हमारे इण्डिया में पण्डित नेहरु थे प्राइम मिनिस्टर। वो कहते थे कि भगवान की बात सुनना गलत है, अगर सुन लिया और कहीं उधर चले गये तो हमारी पॉलिटिक्स बिगड़ जायेगी। इतना पाप का अन्तःकरण कि उसको भगवान की बात सुनने में एतराज है। वो पापात्मा जितना अधिक होगा, उतना वो दूर जायेगा भगवान से, संत से। और जितना अन्तःकरण शुद्ध होगा, उतनी ही जल्दी वो खिंच जायेगा।

वो तो ऐसा है जैसे गुड़ है, गुड़ से प्यार करने वाली जो मक्खियाँ हैं वो गुड़ कहीं पर रख दो, अपने आप आ जायेंगी। कोई मुरदा सड़क पर पड़ा है तो कौवे, गीध ये सब अपने आप आ जायेंगे। अपने आप खिंच जाते हैं वो।

जिस चित्तवृत्ति का व्यक्ति होगा, उस चित्तवृत्ति में खिंच जायेगा। शराबी से शराबी मिलेगा, बड़ी दोस्ती हो जायेगी, पण्डित से पण्डित मिलेगा, दोस्ती हो जायेगी। इसलिये संत से खिंच जाना, ये शुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं, वही खिंचते हैं, सब नहीं खिंचते।

बाप हिरण्यकशिपु गाली दे रहा है भगवान को, और उसका बेटा प्रह्लाद भगवान का भक्त है पूर्ण। ये सबके अपने-अपने संस्कार होते हैं। सबका अपना-अपना हृदय पाप-पुण्य से युक्त होता है, उसी हिसाब से उसका आकर्षण होता है।

एहि सर आवत अति कठिनाई,
रामकृपा  बिनु  आई  न  जाई..

बड़ी भगवत्कृपा हो तो सत्संग में कोई जाय।

०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज
०० सन्दर्भ ::: 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक, भाग - 3, प्रश्न संख्या 43
०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन।

+++ ध्यानाकर्षण/नोट ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्रगटित सम्पूर्ण साहित्यों की जानकारी/अध्ययन करने, साहित्य PDF में प्राप्त करने अथवा उनके श्रीमुखारविन्द से निःसृत सनातन वैदिक सिद्धान्त का श्रवण करने के लिये निम्न स्त्रोत पर जायें -
(1) www.jkpliterature.org.in (website)
(2) JKBT Application (App for 'E-Books')
(3) Sanatan Vedik Dharm - Jagadguru Kripalu Parishat (App)
(4) Kripalu Nidhi (App)
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