थर्मामीटर से पहले कैसे पता चलता था बुखार? जानें शरीर का तापमान मापने का रोचक इतिहास
आजकल घर में किसी का भी बुखार चेक करना है, तो तुरंत थर्मामीटर उठा लिया जाता है और फिर कुछ मिनटों में ही डिजिटल स्क्रीन पर तापमान दिख भी जाता है। क्या आपने सोचा है कि थर्मामीटर से पहले बुखार की शरीर का तापमान सदियों से बीमारी को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेत रहा है। हिप्पोक्रेट्स के समय, करीब 400 ईसा पूर्व, हाथ से शरीर का तापमान महसूस करके बुखार पहचानने की बात मिलती है। हालांकि उस समय तापमान को संख्या में मापने का कोई साधन नहीं था। समय के साथ वैज्ञानिकों ने तापमान में बदलाव को समझना शुरू किया और यहीं से थर्मामीटर बनने की लंबी कहानी शुरू हुई।
थर्मामीटर से पहले क्या था?
Understanding Fever and Body Temperature में प्रकाशित हिस्ट्री ऑफ थर्मामीटर में बताया गया है कि तापमान में बदलाव को समझने की शुरुआती कोशिशों में हवा के फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया। लगभग 220 ईसा पूर्व फिलो ऑफ बायजेनथियम ने तापमान के साथ हवा के फैलने-सिकुड़ने पर ध्यान दिया था। बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि पानी, दूसरे तरल पदार्थ और धातुएं भी तापमान बदलने पर अलग तरह से काम करती हैं।16वीं और 17वीं शताब्दी में कुछ ऐसे डिवाइस बनाए गए, जिन्हें थर्मोस्कोप कहा गया। इनमें कांच की नली में हवा और तरल पदार्थ का इस्तेमाल होता था। तापमान बदलने पर तरल का स्तर ऊपर-नीचे होता था। इसके बाद,1610 के आसपास गैलिलियो गैलिली (Galileo Galilei) ने पानी की जगह शराब का इस्तेमाल करने वाले थर्मोस्कोप पर काम किया। हालांकि, इसे थर्मामीटर कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, क्योंकि इसमें तापमान की संख्या का स्केल नहीं था।
तापमान मापने के लिए पानी के जमने और उबलने को बनाया आधार
लगभग 1612 में सेनटोरियो ने थर्मोस्कोप पर काम करने की कोशिश की और मानव शरीर का तापमान मापने के कई प्रयोग किए। उन्होंने ऐसा उपकरण बनाया जिसमें एक बल्ब को मुंह में रखा जाता था। शरीर की गर्मी से हवा फैलती थी और इसके कारण तरल के स्तर में बदलाव आता था।इसके बाद 1654 में Ferdinand II de' Medici ने ऐसा डिवाइस बनाया, जो बंद था और उसमें शराब का इस्तेमाल किया गया था। इसमें खास बात यह थी कि इसमें तरल के फैलने और सिकुड़ने के आधार पर तापमान मापा जाता था। हालांकि, यह भी ज्यादा सफल नहीं हो पाया।इसके बाद वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी समस्या थी कि अलग-अलग थर्मामीटरों पर अलग-अलग स्केल होता था, जिसकी वजह से तापमान का सही स्तर नहीं निकल पा रहा था। इस समस्या का समाधान 1665 में क्रिस्टियान ह्यूजेंस ने दिया, जो बर्फ के पिघलने और पानी के उबलने के तापमान को मानक बनाना था।
Fahrenheit और Celsius स्केल कैसे आए?
1724 में जर्मन डिवाइस बनाने वाले गैब्रियल फारेनहाइट ने अपने नाम से Fahrenheit स्केल बनाया। उनके थर्मामीटर काफी बेहतर थे, जिसे बाद में पानी के जमने के तापमान को 32°F और उबलने के तापमान को 212°F माना गया। इसके बाद इसी दिशा में कई थर्मामीटर बने और Anders Celsius ने पानी के जमने और उबलने के बिंदुओं का इस्तेमाल करके तापमान मापने के पैमाने पर काम किया। आज Celsius स्केल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसके बाद केल्विन स्केल भी बनाया गया।
Wunderlich ने बुखार की जांच कैसे शुरू की?
साल 1868 में कार्ल रेंनहोल्ड वुंडरलिच (Carl Reinhold Wunderlich) ने करीब 25,000 मरीजों के शरीर के तापमान की लगभग 100,000 रीडिंग का विशेलषण किया। इसमें कई मरीजों का तापमान दिन में चार से छह बार तक रिकॉर्ड किया गया था। इस बड़े डेटा से वुंडरलिच ने यह दिखाने की कोशिश की कि बीमारी के दौरान शरीर के तापमान में खास तरह के बदलाव देखे जा सकते हैं।हालांकि आज की रिसर्च यह भी बताती है कि शरीर का सामान्य तापमान हर व्यक्ति में बिल्कुल एक जैसा नहीं होता। उम्र, तापमान मापने की जगह और दिन के समय जैसे कारक शरीर के तापमान को प्रभावित कर सकते हैं। PubMed में प्रकाशित रिव्यू में 36 रिसर्च और 7,636 स्वस्थ लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्चर्स ने पाया कि सामान्य शरीर का तापमान मापने की जगह और रोगी की उम्र इसे प्रभावित कर सकती है।
एलबट ने बनाया छोटा क्लिनिकल थर्मामीटर
19वीं शताब्दी तक थर्मामीटर काफी बड़े और धीमे थे। कई डिवाइस तो तापमान मापने में 20 मिनट से ज्यादा समय ले लेते थे। इस वजह से डॉक्टर्स को काफी परेशानी होती थी। इस वजह से सर थॉमस क्लिफोर्ड एलबट ने एक छोटा-सा थर्मामीटर बनाया, जो करीब 15 सेंटीमीटर का था और उससे लगभग 5 मिनट में तापमान मापा जा सकता है। सबसे खास बात यह थी कि तापमान की रीडिंग कुछ समय तक बनी रहती थी, जिससे डॉक्टर को उसे आसानी से पढ़ने में मदद मिलती थी। यही वह दौर था जब थर्मामीटर धीरे-धीरे डॉक्टरों के मेडिकल बॉक्स का हिस्सा बनने लगे।
समय के साथ थर्मामीटर में बदलाव
आज थर्मामीटर में कई बदलाव हो चुके हैं। जहां पहले पारे वाले थर्मामीटर हुआ करते थे, अब डिजिटल थर्मामीटर आ चुके हैं। साल 1964 में Theodore Benzinger ने कान के अंदर के तापमान को मापने का थर्मामीटर बनाया। अब कई थर्मामीटर ऐसे हैं, जो शरीर की सतह से निकलने वाली गर्मी को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं।
निष्कर्ष
आज थर्मामीटर हर घर में मिल जाते हैं, लेकिन इसे यहां तक पहुंचने में कई सदियों का सफर लगा है। शुरुआत में हाथ से बुखार मापा जाता था, जो बाद में थर्मोस्कोप और फिर छोटा-सा थर्मामीटर बना और आज यह डिजिटल और इन्फ्रारेड तकनीक तक पहुंच चुका है।

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