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  और नूतन अनारकली नहीं बन पाईं.....
पुण्यतिथि पर विशेष
आलेख-मंजूषा शर्मा
अंग्रेजी कवि लार्ड बायरन ने कहा था - ईश्वर जिन्हें प्यार करता है, वे जवानी में मर जाते हैं। नूतन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। नूतन अभी सक्रिय ही थीं, कि ऊपर से बुलावा आ गया।  वे बॉलीवुड में हर तरह की भूमिकाएं निभा रही थीं। फिल्मकार और अभिनेता विजय आनंद उन्हें सबसे अच्छी अभिनेत्री मानते थे।  वे उन अभिनेत्रियों में थीं, जिन्हें अभिनय जन्मजात मिला हुआ था।
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वर्ष 1956 में नूतन स्टार बनीं और उसी वर्ष उन्हें फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार फिल्म सीमा (1956) के लिए मिला।  उसके बाद पांच बार उन्होंने यह पुरस्कार जीता। बिमल राय की सुजाता और बंदिनी, सुब्बा राव की मिलन और राजखोसला की फिल्म मैं तुलसी तेरे आंगन की, के साथ ही फिल्म मेरी जंग में शानदार काम के लिए विशेष प्रशस्ति पत्र मिला। 
युवा दिलीप कुमार की नायिका न बन पाने का अफसोस
नूतन की युवा दिलीप कुमार की नायिका न बन पाने का अफसोस हमेशा रहा।  उनकी मौसी नलिनी जयवंत फिल्म शिकस्त में दिलीप कुमार की नायिका थीं।  नूतन फिल्म शिवा में उनकी नायिका बनने जा रही थी, पर रमेश सहगल की इन दो फिल्मों से केवल शिकस्त बन पाई और नूतन की इच्छा अधूरी रह गई।  हालांकि इस फिल्म के लिए दो गीत लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड भी किए जा चुके थे। बाद में फिर नूतन को कोई भी फिल्म दिलीप साहब के साथ नहीं मिली, जबकि वे उस दौर की लोकप्रिय और सफल नायिका थीं। जब सुभाष घई की फिल्म कर्मा में उन्हें दिलीप कुमार की पत्नी का रोल निभाने का मौका मिला, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसके बाद दोनों ने फिल्म कानून अपना अपना में भी साथ काम किया। 
अनारकली न बन पाईं  नूतन 
बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि मधुबाला ने अनारकली की जिस भूमिका से लोगों के दिलों में जो अमिट जगह बनाई , उसकी हकदार पहले नूतन ही थीं। के. आसिफ जब मुगल-ए-आजम फिल्म की योजना बना रहे थे, तब उन्होंने अनारकली की भूमिका के लिए नूतन का ही चयन किया था,  लेकिन आखिरकार यह रोल मधुबाला को मिला और मधुबाला ने इस भूमिका के साथ पूरा न्याय किया।  इसमें कोई शक नहीं कि मधुबाला बेहद खूबसूरत थीं। पर इसका ये मतलब नहीं है कि फिल्म में मोहे पनघट पर नंद लाल ,.. गीत गाती नूतन भी कहीं से बुरी लगती।  यह भूूमिका तो नूतन को मात्र 15 साल की उम्र में मिली थी।  दरअसल अगर नूतन ने अनारकली (मुगल-ए-आजम फिल्म का उस समय यही नाम था) की भूमिका 1951 में निभाई होती, तो वे पांच वर्षों के अंदर गीतों पर बेहतरीन अभिनय करने वाली यह अभिनेत्री  रुपहले परदे की अनारकली, लैला और हीर बन जाने का कीर्तिमान स्थापित कर लेती।  पर नूतन ने जवानी में अनारकली की उस भूमिका को हाथ से जाने दिया। 
फिल्मकार के. आसिफ ने सबसे पहले 1944 में नरगिस को अनारकली की भूमिका के लिए चुना था। तब नौशाद नहीं , अनिल बिश्वास इसके संगीतकार थे। पर यह फिल्म बीच में ही अटक गई , क्योंकि उसके लेखक शिराज अली हकीम पाकिस्तान में जाकर बस गए थे। 1951 में जब के. आसिफ ने फिर से अनारकली बनाने का विचार किया  तो अनिल बिश्वास की जगह नौशाद और नरगिस की जगह नूतन को चुना।  नूतन के लिए यह शानदार मौका था , क्योंंिक अगर नूतन ने यह भूमिका स्वीकार कर ली होती तो उनकी तुलना  बीना राय से की जाती। बीना राय एस. मुखर्जी की फिल्म अनारकली में अनारकली  की भूूमिका निभा रही थीं। उस समय एक ही साथ तीन फिल्में अनारकली के नाम से शुरू हो रही थीं। के.आसिफ की अनारकली , मीनाकुमारी-कमाल अमरोही की अनारकली और बीना राय -एस. मुखर्जी की अनारकली।   पर शायद नूतन में अभी वह आत्मविश्वास नहीं आया था जो अमिय चक्रवर्ती की फिल्म सीमा के साथ स्टार बनने के बाद आया। इसलिए उन्होंने जोर दिया कि वे इस भूमिका के लिए ठीक नहीं रहेंगी और चाहा कि यह भूमिका फिर से नरगिस को ही मिले।  जब तक कमाल अमरोही अनारकली पर अपना पहला सेट लगाते, तब तक एस. मुखर्जी ने अपने प्रसिद्ध फिल्मस्तान बैनर के तले बीना राय को अनारकली के रूप में परदे पर पेश कर दिया। 
कॅरिअर की शुरूआत में ही पीछे  जाने से नूतन को नुकसान तो हुआ। लेकिन बाद में वे फिल्म लैला मजनूं में शम्मी कपूर के साथ लैला बनकर आई। फ्लिमकार के. आसिफ के उच्च स्तर से सीधे उतरकर उन्हें एन. अरोड़ा के स्तर तक आना पड़ा। 
बीना राय को -ये जिंदगी उसी की है, जैसा खूबसूरत गीत देने वाले  एस. मुखर्जी ने नूतन की प्रतिभा को महसूस किया और अनारकली के हीरो प्रदीप कुमार के साथ फिल्म हीर में लिया। पर लैला मजनूं और हीर , दोनों ही असफल फिल्में साबित हुईं। इस तरह नूतन के हाथ से परदे पर अमर होनेे के दो मौके फिसल गए।  इससे यही साबित होता है कि नूतन को सजा  सजाया सौभाग्य नहीं मिलना था। उन्हें मेहनत और कड़ी मेहनत करके ही खुद को श्रेष्ठï अभिनेत्री के रूप में साबित करना था। अनिल बिश्वास ने हीर में नूतन के लिए अनेक खूबसूरत रचनाएं रची।  पर फिल्म द्वितीय विश्व  युद्ध के दस साल प्रदर्शित हुई और अनिल बिश्वास के कॅरिअर की शुरूआत भी इसी के साथ हुई। 
फिल्म सीमा में बलराज साहनी के गीत -पंख हैं कोमल , आंख हैं धुंधली , जाना है सागर पार (मन्ना डे) गीत में नूतन ने किस कदर गहरे भाव दिए हैं। यह गीत संगीतकार शंकर ने राग दरबारी में तैयार किया था। 
सुजाता का रोमांटिक गीत
नूतन  के अभिनय के विस्तार को 1956 में आई फिल्म सुजाता में भी देखा जा सकता है। इस फिल्म में सुनील दत्त फोन पर अपना प्रेम - जताते हैं और दूसरी तरफ नूतन की खामोश प्रतिक्रियां हैं। 
इस फिल्म में शुरू में बिमल राय को एक साधारण से अभिनेता सुनील दत्त पर फोन पर  गाए रोमांटिक गीत को फिल्माने का खयाल बिल्कुल पसंद नहींं आया। जबकि एस. डी. बर्मन परेशान हो गए थे। वे उम्र में बड़े थे और उन्होंने बिमल राय को लगभग डांटते हुए कहा था- कैसे निर्देशक हो तुम। तुम में इतना आत्मविश्वास नहीं है कि अपने हीरो से एक कोमल गीत  को फोन पर गाते हुए नहीं दिखा सकते।  क्या तुम प्यार समझते हो? तुम नहीं जानते, क्योंकि तुमने कभी प्यार नहीं किया है। तुम जीवन के सुंदर अनुभव से वंचित हो। तुम कल्पना नहीं कर सकते कि कोई लड़का किसी लड़की को फोन पर प्रेम गीत सुनाए।  शेक्सपियर ने कहा था - प्यार आंखों से नहीं दिखता।  पर शेक्सपियर की यह बात तुम नहीं समझ सकते हो। 
बर्मन दा  ने मजरूह के इस गीत को इतना सुंदर तैयार किया कि यह गीत तलत महमूद के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से माना जाता है।  वैसे दादा चाहते थे कि यह गीत रफी साहब गाए, लेकिन बिमल राय ने साफ कह दिया कि फोन वाला गीत वे फिल्म में तभी रखेंगे, जब उसे सुनील दत्त के लिए तलत गाएंगे। बर्मन दादा तब भी रफी को ही चाहते थे, पर उनकी जिद टल गई और बर्मन दादा अंत तक तलत के प्रति अनिश्चय की भावना लिए रहे।  यहां तक उन्होंने रिकॉर्डिंग के समय भी कह दिया कि तलत मेरे इस गीत को बरबाद मत करना। 
तलत ने यह गीत दिल लगाकर गाया और गीत लोगों के दिलों में बस गया। आज भी जब फोन पर गीत फिल्माए जाते हैं, तो लोगों के दिलों में सुनील दत्त पर और नूतन पर फिल्माए इस गीत की ही याद ताजा हो जाती है। सचिन दा को इस गीत को फिल्माने की ज्यादा चिंता नहीं थी, क्योंकि वे जानते थे कि इसमें वह अभिनेत्री है, जिसे  भावपूर्ण भूमिकाएं करने के लिए कभी ग्लिसरीन की जरूरत नहीं पड़ी। 
 नूतन के सूक्ष्म अभिनय ने जादू किया और इसी फिल्म मेेंं नूतन ने काली घटा छाए , मेरा जिया तरसाए गाने में भी कितना सुंदर अभिनय किया है। हो सकता है कि इस गीत के लिए बिमल दा को अपनी प्रिय गायिका लता की कमी महसूस हुई हो, लेकिन आशा भोंसले ने भी अपनी आवाज का वो जादू दिखाया कि लोगों ने इसे केवल आशा का ही गीत माना। नूतन के अभिनय ने जो इसे सजीव बना दिया था। 
 
 
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