बदले-बदले सुर गीतों के
गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
बदले-बदले सुर गीतों के,
लेकिन बोल पुराने हैं।
गाँव वही जाना पहचाना,
लोग हुए अनजाने हैं ।।
नहीं कटोरी सब्जी की अब,
आती-जाती खिड़की से।
नहीं पड़ोसी चाचा-मामा,
भय न किसी की झिड़की से।
सीमित होते गए दायरे,
दोस्त हुए बेगाने हैं।।
सूनी हैं बाड़ी अमराई,
नहीं मिले सब्जी ताजी।
त्योहारों की रौनक फीकी,
नहीं ताश की है बाजी।
हँसी-खुशी सुख मेल-जोल के,
मेले नहीं ठिकाने हैं।।
दास बने सब सुख-सुविधा के,
नहीं काम कर से होता।
नहीं स्नेह सहयोग समन्वय,
गाँव उपेक्षित हो रोता।
सूने-सूने घर के आँगन,
भरे हुए मयखाने हैं।।










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