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 सड़क सुरक्षा में ‘मेक इन इंडिया' मॉडल को ‘ग्लोबल साउथ' देशों में अपनाए जाने की बड़ी संभावना: तिवारी

 दावोस.  भारत के एक सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ ने परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में सड़क पर वाहनों से होने वाले हादसों में मौत या चोट लगने की आशंका कई गुना अधिक होने का जिक्र करते हुए कहा है कि सुरक्षित आवागमन ‘विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करने की कुंजी साबित होगा। सेवलाइफ फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ पीयूष तिवारी ने इस बात पर भी जोर दिया कि सड़क सुरक्षा कानूनों और नीतियों में सांस्कृतिक सहानुभूति (कल्चरल एम्पैथी) को शामिल करना बेहद जरूरी है, ताकि नियम जमीनी हकीकत के अनुरूप हों और प्रभावी ढंग से लागू किए जा सकें। उन्होंने कहा कि सड़क हादसों से निपटने के लिए भारत के अनुभव और नवाचारों पर आधारित ‘मेक इन इंडिया' मॉडल को ‘ग्लोबल साउथ' के देशों में अपनाए जाने की बड़ी संभावना है, जहां समान सामाजिक और यातायात संबंधी चुनौतियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में भी अच्छे कानून मौजूद हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे दूसरे देशों में उसी तरह कारगर साबित हों, क्योंकि किसी भी नियम की सफलता में सांस्कृतिक सहानुभूति (कल्चरल एम्पैथी) एक अहम घटक होती है। यहां विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक के दौरान ‘पीटीआई' से बातचीत में तिवारी ने कहा कि सड़क सुरक्षा को विमर्श का बड़ा हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आवागमन हमें स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी अधिकारों तक पहुंच देता है, जो ‘विकसित भारत 2047' मिशन के प्रमुख विकास संकेतकों का अहम हिस्सा हैं। तिवारी ने 2007 में सड़क दुर्घटना में अपने परिवार के एक सदस्य को खोने के बाद सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू किया और भारत के ‘राहवीर' (गुड समैरिटन) कानून बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, ‘‘हमने सबसे पहले राहवीर कानून पर ध्यान केंद्रित किया और फिर जमीनी स्तर पर सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू करने पर ध्यान दिया।'' तिवारी ने कहा ‘‘और इस बार दावोस में हम वास्तव में यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि सुरक्षित सड़कों का एक मॉडल पश्चिम से नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ से आ रहा है।'' उन्होंने समझाया, ‘‘यह वह मॉडल है जो दर्शाता है कि हमारे देशों में वास्तविक परिस्थितियां क्या हैं और सबसे अधिक प्रभावित लोगों के लिए समाधान कैसे तैयार किए जाने चाहिए।'' उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में भी ‘गुड समैरिटन' कानून हैं, उदाहरण के लिए फ्रांस में, जहां अगर आप किसी की मदद नहीं करते हैं तो इसके लिए दंड का प्रावधान है। लेकिन भारत में चुनौती यह नहीं थी कि जुर्माना होना चाहिए, चुनौती यह थी कि मदद करने पर परेशान किया जाता था। तिवारी ने कहा, ‘‘आप जानते हैं कि लोग कानूनी झंझटों में फंस जाते हैं। तिवारी ने कहा कि वह ऐसे समाधान तलाशना चाहते थे जो जमीनी स्तर पर कारगर हों। भारत में विभिन्न राजमार्गों पर उनका काम, जिनमें मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, नागपुर जैसे विभिन्न जिले, उत्तर प्रदेश में उन्नाव और अब देश भर के 100 अन्य जिले शामिल हैं, यह प्रदर्शित कर रहा है कि जब आप अति-स्थानीय स्तर पर काम करते हैं तो यह बेहतर परिणाम देता है। सड़क सुरक्षा के आर्थिक महत्व के बारे में उन्होंने विश्व बैंक के आंकड़ों का हवाला दिया कि भारत को हर साल सड़क दुर्घटनाओं के कारण अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3-5 प्रतिशत तक का नुकसान होता है। उन्होंने कहा, "हम लगभग 100 अरब अमेरिकी डॉलर के आर्थिक नुकसान की बात कर रहे हैं जिसे सड़कों को सुरक्षित बनाकर रोका जा सकता है।" 

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